शांति का मूल है उदारता

अयं निज परो वेति गणना लघु चेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम।।

‘महोपनिषेद’ के इस श्लोक का अर्थ है कि यह मेरा है, यह उसका है, ऐसी सोच छोटे मन वालों की होती है। उदार हृदय वालों के लिए पूरी धरती ही परिवार होता है। यह श्लोक हमें ‘मेरा’ और ‘दूसरों’ के भेदों पर चिंतन करने के लिए प्रेरित करता है। इसका पहला भाग बताता है कि जो लोग संकीर्ण सोच रखते हैं या अस्तित्व की सीमित समझ रखते हैं। वे अक्सर मानवता को हम बनाम वे में विभाजित करते हैं। यह मानसिकता विभाजन और संघर्ष को बढ़ावा देती है।

यही कारण है कि आज चारों ओर विभाजन और युद्ध की अनुचित एवं विनाशकारी स्थितियाँ बनी हुई हैं। इस श्लोक का उत्तरार्ध उदारचरित लोगों के परिवर्तनकारी दृष्टिकोण को सामने लाता है। ये व्यक्ति सभी प्राणियों के परस्पर संबंध से अवगत होते हैं और संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखते हैं, जो वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा को दर्शाता है।

यह विचार भौगोलिक, सांस्कृतिक या सामाजिक सीमाओं से परे है और इस बात पर बल देता है कि सच्ची बुद्धिमत्ता मानवता की एकता को पहचानने और सभी के लिए अपनेपन की भावना को पोषित करने में निहित है। यह न केवल व्यक्तिगत जीवन में बल्कि सामुदायिक और वैश्विक संदर्भों में भी प्रासंगिक मुद्दों को संबोधित करता है।

संकीर्ण सोच छोड़कर प्रेम, दया और मानवता का मार्ग अपनाने का संदेश

व्यापक सोच और सार्वभौमिक बंधुत्व की भावना से ही विश्व में सद्भाव और शांति को बढ़ावा मिलता है। लोगों को संकीर्ण दृष्टिकोण से ऊपर उठकर समावेशी विकास की दिशा में कार्य करना चाहिए। इस दृष्टिकोण को सामूहिक रूप से अपनाने से एक सामंजस्यपूर्ण और एकीकृत समाज का निर्माण हो सकता है। समाज में प्रेम और दया-भाव सर्वोपरि होना चाहिए। हम सभी एक ही मानव-परिवार का हिस्सा हैं।

जहाँ तेरा-मेरा की भावना प्रबल होती है, वहाँ नैतिकता का पतन निश्चित है और यही मानव समाज के विनाश का मार्ग है।
सर्वे भवन्तु सुखिन सनातन धर्म का आधार है, क्योंकि इसमें मानवता को ही प्राथमिकता दी जाती है। आज की परिस्थितियों में हम यदि छोटे-छोटे पैमाने पर भी इस भावना को अपनाते हैं तो हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ अथवा मुश्किलें कम होंगी।

पवन गुरू

आज लोगों ने चारों ओर हाहाकार मचा रखा है। ऐसे में हमें गुरुओं के शरणागत बनकर ही सुख के पल प्राप्त हो सकते है। सच्चे गुरू के मार्गदर्शन में हम सत्य, दया, करूणा व सद्भाव का पथिक बनकर अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। जीओ और जीने दो की धारणा से ही विश्व में शांति का विस्तार हो सकता है।

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