जीएचएमसी ने फिर शुरू किया है ‘भिखारीमुक्त हैदराबाद’ का प्रयास
2008 की सामाजिक पड़ताल से नीतिगत बदलाव तक
सरकारी नीतियों, मानवीय प्रयासों और प्रशासनिक इच्छाशक्ति से आकार लेती पुनर्वास यात्रा
हैदराबाद, महानगर हैदराबाद की नगर पालिका जीएचएमसी के बारे में कभी कहा जाता था कि बल्दिया खाया पिया चल दिया। यह कहावत कई बार चरितार्थ होती हुई भी दिखती है और कभी-कभी अधिकारी इस छवि से बाहर निकलने की छटपटाहट करते दिखते हैं। नये जीएचएमसी आयुक्त आर.वी. कर्णन भी कुछ ऐसी ही छपटाहट में दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने फिर से हैदराबाद में भिखारियों के पुनर्वास के प्रयास शुरू कर दिये हैं। एक विशेष अभियान में 19 भिखारियों को आश्रयगृह भेजा गया है, जबकि शेष को परामर्श के बाद अपने परिवार में लौटने का सुझाव दिया गया है। निगम का दावा है कि यह अभियान जारी रहेगा।
जीएचएमसी ने बेग्गर फ्री हैदराबाद के लिए फिर से संगठित और संवेदनशील प्रयास प्रारंभ किए हैं। विशेषकर बशीरबाग, सचिवालय, नामपल्ली, बेगमबाजार और चारमीनार जैसे इलाकों में सक्रिय टीमें तैनात की गई हैं। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 24 जून से शुरू किये गये नए अभियान के तहत 221 भिखारियों की पहचान की गई और जिनमें से 19 को जीएचएमसी द्वारा संचालित आश्रय गृहों में भेजा गया है, जबकि शेष को परामर्श के बाद उनके परिवारों के पास भेज दिया गया।
दो दिन तक चले इस अभियान में जिन भिखारियों की पहचान की गयी थी, उनमें 173 पुरुष, 37 महिलाएं और 11 बच्चे इस शामिल हैं। अभियान के तहत प्रत्येक व्यक्ति की चिकित्सकीय जांच, मनोवैज्ञानिक परामर्श और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया अपनाई गई है। जीएचएमसी यूसीडी (शहरी सामुदायिक विभाग) के अनुसार यह प्रक्रिया नियमित रूप से जारी रहेगी और इसके लिए विशेष मोबाइल टीमें गठित की गई हैं।
तेलंगाना सरकार ने इस दिशा में डोंट गिव आल्म्स – गिव रिस्पेक्ट (भीख न दें – सम्मान दें) जैसी नागरिक जागरूकता योजनाएं भी चलाई हैं। जनता से अनुरोध किया गया है कि वे भीख न देकर हेल्पलाइन नंबर (040-21111111) पर सूचना दें ताकि पुनर्वास सही दिशा में आगे बढ़ सके।
सरकार की दीर्घकालिक योजना है कि भिखारियों को न केवल आश्रय दिया जाए, बल्कि उन्हें श्रम बाज़ार, स्वास्थ्य सुरक्षा, और शिक्षा-प्रशिक्षण से जोड़कर आत्मनिर्भर नागरिक बनाया जाए।
हैदराबाद को भिखारी-मुक्त बनाने की यह यात्रा कई वर्ष पहले शुरू हुई थी। 2008 की सामाजिक पड़ताल से लेकर 2025 की डिजिटल पुनर्व्यवस्था तक, यह प्रयास कई दौर से गुज़रा है। यदि इसे नीति-संगत, पारदर्शी और सहभागितामूलक रूप में आगे बढ़ाया जाए, तो यह संपूर्ण भारत के लिए शहरी पुनर्वास का आदर्श मॉडल बन सकता है, लेकिन अधिकारियों में इस अभियान में निरंतरता और गंभीरता का अभाव स्पष्ट रूप से देखा गया। कुछ दिन अभियान चलता है और फिर स्थिति यथावत बनी रहती है। भिखारी न केवल घर परिवारों से वापस आते हैं, बल्कि आश्रय गृहों में भी अधिक दिन तक नहीं टिक पाते।

भिखारी-मुक्त हैदराबाद की परिकल्पना एक प्रशासनिक संकल्प और सामाजिक चेतना के साथ शुरू हुई थी। ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम (जीएचएमसी), राज्य सरकार, स्वयंसेवी संस्थाओं और नागरिकों की भागीदारी इसमें यदाकदा रही है। वर्ष 2008 में प्रकाशित मुहम्मद रफीयुद्दीन की पुस्तक बेगर्स इन हैदराबाद में हैदराबाद के भिखारियों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, प्रवास की प्रवृत्ति, धार्मिक स्थलों की भूमिका और सरकारी विफलताओं को गहराई से प्रस्तुत किया गया था।
2008 में शुरू हुआ था अभियान
इस अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2008 में हैदराबाद में अनुमानित 10,466 से अधिक सक्रिय भिखारी दर्ज किये गये थे, जिनमें 40 प्रतिशत महिलाएँ थीं और लगभग 10 प्रतिशत बच्चे। सर्वाधिक भिखारी क्षेत्र चारमीनार, नामपल्ली, काचीगुड़ा स्टेशन, मक्का मस्जिद, एबिड्स और बेगमबाजार में पंजीकृत किए गए थे। यह पुस्तक आगे बताती है कि इनमें से अधिकांश भिखारी बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश से विस्थापित होकर आए थे।
वर्ष 2017 में जब जीएचएमसी के तत्कालीन महापौर बोंतु राममोहन ने इस दिशा में निर्णायक कार्य प्रारंभ किया था। तेलंगाना सरकार विशेष रूप से तत्कालीन नगर प्रशासन मंत्री के. टी. रामाराव के निर्देश पर भिखारी मुक्त हैदराबाद मिशन का औपचारिक शुभारंभ किया गया। इस प्रयास का ग्लोबल एंटरप्रेन्योरशिप समिट (जी.ई.एस.) 2017 के दौरान चलाये गये इस अभियान का मुख्य उद्देश्य था कि शहर को स्वच्छ, सुरक्षित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने योग्य बनाया जाए।
जेल विभाग की भी थी महत्वपूर्ण भूमिका
एक और प्रयास जेल विभाग के तत्कालीन महानिदेशक विनय कुमार सिंह ने भी किया था। उन्होंने ट्रैफिक पुलिस और जीएचएमसी के साथ मिलकर एक अभूतपूर्व अभियान चलाया, जिसके अंतर्गत पहले दो सप्ताहों में ही 800 से अधिक भिखारियों को सड़कों से हटाया गया। उनका संकल्प था कि भिखारियों को विविध प्रकार के कौशल सिखाकर आत्मनिर्भर बनाया जाए। इनमें से कई को चंचलगुड़ा और चेर्लापल्ली जेल परिसरों में स्थापित विशेष पुनर्वास केंद्रों में स्थानांतरित किया गया। इन्हें आश्रय, भोजन, वस्त्र, मनोरंजन और कुछ को प्राथमिक चिकित्सा सेवाएं भी दी गईं। यह मॉडल आरंभिक रूप से प्रभावी प्रतीत हुआ, लेकिन आलोचकों ने इसे जबरन हिरासत और अधिकारविहीन पुनर्वास करार दिया।
सामाजिक आलोचनाओं के बाद वर्ष 2018–19 में प्रशासन ने दृष्टिकोण में सुधार करते हुए सहानुभूति आधारित हस्तक्षेप को अपनाया गया। जीएचएमसी ने हेल्पएज इंडिया, गुड समैरिटन्स, सिक्योर फाउंडेशन जैसे स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग से भिखारियों की गहन पहचान, परामर्श और कौशल प्रशिक्षण की दिशा में कार्य आरंभ किया।
सरकार ने एमईपीएमए (शहरी क्षेत्रों में निर्धनता उन्मूलन मिशन) के माध्यम से पुनर्वास को स्वच्छता कार्य, स्ट्रीट वेंडिंग (फुटपाथ विक्रय) और आश्रय गृहों से जोड़ने का निर्णय लिया। महापौर बी. राममोहन और यूसीडी (शहरी सामुदायिक विकास विभाग) ने महिला भिखारियों और मानसिक रोगियों की अलग से पहचान कर उपचार एवं पुनर्वास की विशेष व्यवस्था की।
कोविड-19 महामारी के दौरान, जब पूरा शहर लॉकडाउन में था, तब भिखारी वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हुआ। रोजगार की कमी और प्रवासियों की वापसी से शहर में भिखारियों की संख्या और दृश्यता में अचानक वृद्धि हुई। इस दौरान, जीएचएमसी ने अस्थायी रैन बसेरों का संचालन किया। इन्हें स्वास्थ्य प्रोटोकॉल के अनुरूप सैनिटाइज़ किया गया, मास्क और भोजन वितरित किए गए। नगर प्रशासन द्वारा राशन कार्ड, वृद्धावस्था पेंशन, और आधार पंजीकरण के लिए शिविर भी लगाए गए।
डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली की मदद से भिखारियों का जीपीएस
इन वर्षों में डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली की मदद से भिखारियों की जीपीएस आधारित जानकारी सुरक्षित की गई है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए डिजिटल पहचान संख्या और परिवार से संबंधित जानकारी दर्ज करने का प्रयास किया गया। महिलाओं, बच्चों, और ट्रांसजेंडर भिखारियों के लिए विशेष योजना के तहत स्वरोजगार के अवसर और व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किए गए। हालांकि 2024 में चुनावी व्यस्तता और प्रशासनिक रुचि में गिरावट के चलते इन प्रयासों की गति धीमी पड़ी, तथा कई आश्रय गृहों का संचालन वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण बाधित हो गया। फिर वहीं खाया पिया चल दिया वाली स्थिति यथावत रही। अब फिर से प्रयास शुरू किये गये हैं तो पता नहीं भविष्य में इस अभियान का क्या होगा।
-चंदन कुमार चौरसिया
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