गोवा : लापरवाही की लपटों में स्वाहा जि़ंदगियाँ
आज जब हम गोवा की रंगीन रातों की बात करते हैं, तो मन में एक काली छाया मँडराने लगती है। 7 दिसंबर, 2025 की वह काली रात, जब अर्पोरा के बर्च बाय रोमियो लेन नाइटक्लब की चमकदार लाइटें अचानक आग की लपटों में बदल गईं!
एक लाइव परफॉर्मेंस के बीच, थिरकते युवाओं के बीच एक गैस सिलेंडर ब्लास्ट ने सब कुछ लील लिया। शायद किचन में लापरवाही से। ध्वनि अवशोषक फोम और प्लास्टिक से सजा क्लब का इंटीरियर अपनी ज्वलनशीलता के कारण आग में घी का काम कर गया।
हाइड्रोजन सायनाइड और फॉस्जीन जैसी जहरीली गैसें निकलीं, जो साँस रोक देती हैं। फायर अफसरों के मुताबिक, ज्यादातर मौतें जलने से नहीं, बल्कि दम घुटने से हुईं। छत भी ढह गई। रेस्क्यू टीमों को नदी के किनारे की मुश्किल जगह पर पहुँचने में देर हुई और सबसे दर्दनाक यह कि क्लब में सिर्फ एक ही एक्जिट था! भीड़ में अफरा-तफरी मच गई। लोग आपस में कुचलते चले गए। 25 लाशें! दर्जनों घायल! एक युवा आईटी इंजीनियर, जो मुंबई से छुट्टियां मनाने आया था; एक लोकल लड़की, जो पहली बार नाइटलाइफ़ का मजा ले रही थी। इनकी कहानियां हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हमारी फन की कीमत इतनी भारी होनी चाहिए?
फायर सेफ्टी के बिना चल रहा क्लब, हादसे के बाद मालिक फरार
लेकिन इस हादसे की सबसे मार्मिक परत यह है कि मरने वालों में 21 मजदूर थे। बाहर से आए माइग्रेंट वर्कर्स। झारखंड, उत्तराखंड और नेपाल से रोजी-रोटी की तलाश में आए श्रमजीवी। ये किचन स्टाफ थे, जो बेसमेंट में फँसे और जहरीली गैसों की चपेट में आ गए। उनकी कार्य स्थितियाँ? न्यूनतम वेतन पर 12-14 घंटे की शिफ्ट। बिना सेफ्टी ट्रेनिंग के तंग-घुटन भरी जगहों में काम। जिम्मेदारी किसकी? क्लब मालिकों की, जो सस्ते श्रम का फायदा उठाते रहे! सरकारी तंत्र की, जो लेबर कानूनों को लागू करने में सोया रहा! हमारी, जो इन अदृश्य नायकों को सिर्फ स्टाफ कहकर भूल जाते हैं! ये मजदूर गोवा की नाइटलाइफ़ को चला रहे थे, लेकिन उनकी ज़िंदगी की सुरक्षा? (कोई उत्तर नहीं!)
अब सवाल उठता है: यह हादसा क्यों हुआ? चरम लापरवाही की वजह से। क्लब के मालिक गोवा के नाइटलाइफ़ साम्राज्य के मालिक हैं। उन्हें फायर सेफ्टी क्लियरेंस की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई शायद। नो एक्जिट साइन, नो स्प्रिंकलर सिस्टम, नो इमरजेंसी लाइटिंग! सुना है हादसे के कुछ घंटों बाद ही वे लोग फुकेट भाग गए! इंडिगो फ्लाइट से थाईलैंड पहुँचे, जहाँ अब इंटरपोल का लुकआउट नोटिस जारी है।
यह भी पढ़ें… अमूर्त विरासत का अमर संगीत
मजदूरों की मौत और परिवारों के दर्द ने खोली सिस्टम की पोल
मालिकों की फरारी जाँच में लापरवाही नहीं है क्या? क्यों इतनी देरी? एयरपोर्ट अलर्ट क्यों नहीं? भ्रष्टाचार की जड़ें कहाँ हैं आख़िर? परमिट देने वाले अफसरों की मिलीभगत तो नहीं? सयाने बता रहे हैं कि ऐसे कई क्लब बिना एनओसी के चल रहे हैं। क्यों? क्योंकि टूरिज्म इंडस्ट्री पैसे कमाती है और नियमों की किताब धूल खाती रहती है! यह सिर्फ एक क्लब की बात नहीं। भारत के हर शहर में नाइटलाइफ़ बढ़ रही है। लेकिन सुरक्षा के बुनियादी इंतज़ाम पीछे छूट रहे हैं। याद कीजिए, 2023 का मुंबई का पब हादसा या 2017 का कमांडो क्लब! हर बार वही कहानी: हम सुधार करेंगे। कहाँ है सुधार?
इस हादसे से जुड़े मुद्दे गहरे हैं। एक, पर्यटन का अंधा पागलपन। गोवा हमारा पार्टी कैपिटल है, लेकिन क्या हम युवाओं और मज़दूरों को मौत के मुँह में धकेल रहे हैं? दो, सरकारी निगरानी की कमी। लोकल अथॉरिटी को क्लबों की चेकिंग करनी चाहिए। (लेकिन शायद भ्रष्टाचार रोक लेता है!) तीन, सामाजिक मुद्दा। हमारे माइग्रेंट भाई रात की चमक में खो जाते हैं। लेकिन क्या हम उन्हें सेफ्टी और सम्मान देते हैं? और चार, सबसे संवेदनशील मुद्दा। परिवारों का दर्द! वह माँ, जो बेटे की लाश को गले लगाए रो रही है। वह पिता, जो बेटी के सपनों को जलते देख रहा है। क्या कुछ सांत्वना राशि ही उनकी पीड़ा का मोल है?
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



