सोने से लदी संवेदनाएँ : एक तस्करी कथा
कभी-कभी लगता है कि देश में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। एक तरफ आईआईटी और आईआईएम से निकले युवा टेक्नोलॉजी और बिजनेस में देश का नाम रोशन कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हमारे बॉलीवुड और टॉलीवुड के कलाकार अभिनय के नए-नए आयाम गढ़ रहे हैं। क्राइम और तस्करी के क्षेत्र भी तो इस नव-उन्मेष-कारी चमत्कारी प्रतिभा के संस्पर्श से अछूते नहीं हैं!
ताज़ा उदाहरण हैं कन्नड़ की वे स्वनामधन्य अभिनेत्री, जिन्होंने यूट्यूब से सोना छिपाने के गुर सीखकर देश की सुरक्षा एजेंसियों के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी। अब तक आपने सुना होगा कि यूट्यूब से लोग कोडिंग, खाना बनाना, योगासन और पर्सनल फाइनेंस सीखते हैं। लेकिन इन महोदया ने इस धारणा को बदल दिया। अब यूट्यूब से तस्करी के गुर भी सीखे जा सकते हैं!
यूट्यूब यूनिवर्सिटी और तस्करी का नया पाठ्यक्रम
ज्ञान का कोई अंत नहीं है, बस इच्छाशक्ति होनी चाहिए। आधुनिक युग में गुरुकुल का रूप बदल गया है। अब ज्ञान सीधे यूट्यूब यूनिवर्सिटी से मिलता है। बस एक क्लिक और सारी जानकारी हाज़िर -सोने की तस्करी कैसे करें?, एयरपोर्ट सिक्योरिटी को कैसे चकमा दें?, और शायद पकड़े जाने पर अदालत में कैसे रोएँ? भी!
इसलिए, इस लोमहर्षक कांड के बाद सयाने शायद यूट्यूब को भारत में शिक्षा मंत्रालय के अधीन करने की सिफारिश करें। अब आईआईटी और आईआईएम की ज़रूरत ही क्या है, जब यूट्यूब यूनिवर्सिटी से हर विषय की मास्टरी मिल सकती है? हो सकता है, अब से फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में बेस्ट तस्कर कैटेगरी भी जोड़ दी जाए ताकि यह हुनर भी सही मंच पा सके!
और सुनिए। ख़बर है कि इन महोदया को एयरपोर्ट पर वीआईपी ट्रीटमेंट मिला। जैसे ही वे पहुँचीं, शायद अधिकारी उनकी अगवानी को दौड़ पड़े होंगे। न, न, इसमें अचरज की क्या बात? अपने देश में सेलेब्रिटीज को वैसे भी ज़्यादा तवज्जो देने का रिवाज है न! वह तो साइत ही बुरी थी, वरना स्वर्णमंडित अभिनेत्री के लिए तो प्रोटोकॉल के नाम पर रेड कार्पेट भी बिछ सकता था।
आप पूछ सकते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत यह सम्मान आम लोगों को कब मिल पाएगा। आम आदमी का क्या जी? उसे तो सिस्टम पैदाइशी चोर मानता है न! और देखिए। राज्य सरकार ने पहले तो इस मामले की जाँच के लिए सीआईडी को आदेश दिया, फिर अचानक जाँच वापस भी ले ली। अब पता नहीं कि जाँच हो रही है या नहीं हो रही है?
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सोने की तस्करी: सिस्टम, समाज और परंपराओं का ताना-बाना
लेकिन एक बात ज़रूर कि यह मामला शायद कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे अनेक माता-पिता अपने बच्चों से कहते हैं -बेटा, जो मन करे, करो; लेकिन हमारी मर्ज़ी से! जाने कितने मामलों में ऐसा होता है कि जाँच शुरू होती है और अचानक ऊपर से निर्देश आ जाता है कि ज़्यादा दौड़धूप न की जाए, मामला सुलझ रहा है। सिस्टम ऐसा ही है न कि ऊपर वाले की सुननी पड़ती है! नीचे वालों का क्या? और कौन नहीं जानता कि ऐसे बड़े खेल नीचे वालों के बस के कहाँ!
पूछा जा सकता है कि आखिर यह सब हो ही क्यों रहा है? क्यों भारत में सोने की तस्करी इतनी आम हो गई है? दरअसल, भारतीय समाज का सोने से गहरा नाता है। शादी-ब्याह में सोना न हो तो शादी अधूरी मानी जाती है। त्योहारों पर सोना खरीदना शुभ माना जाता है। भारतीय माताएँ बेटा, अच्छा करियर बनाओ ताकि ढेर सारा सोना खरीद सको जैसी सलाह बचपन से देती आई हैं।
अब जब सोना इतना ज़रूरी है, तो तस्कर इसे क्यों न लाएँ? हो सकता है, देश को फिर से सोने की चिड़िया बनाने के लिए ही वे इतना सब पराम कर रहे हों। वरना चिड़िया सी कोमल काया पर कोई 14 किलो सोना भला कैसे चिपका सकता है! कविवर बिहारीलाल आज होते तो सिर ही पीट लेते-
भूषण भार वहन करै, क्यों यह तन सुकुमार!
सीधे पाँव न परि सकैं, यौवन ही के भार!!
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