सदी के महान साहित्यकार : आचार्य महाप्रज्ञ (106 वाँ जन्मदिन)
कहा जाता है कि वह समाज व राष्ट्र समृद्ध होता है जिसमें सद् साहित्य की अनमोल धरोहर सुरक्षित हो और निरंतर गतिमान हो। बीसवीं व इक्कीसवीं सदी के भारत में अनेकानेक मूर्धन्य विद्वानों व साहित्यकारों का प्रादुर्भाव हुआ। उनकी साहित्य संपदा व बहुमूल्य विचारों से देश संपन्न व सुदृढ़ बना। विद्वानों, दार्शनिकों, चिंतकों व साहित्यकारों की लंबी श्रृंखला में एक नाम महात्मा महाप्रज्ञ का बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है, जिनकी 350 से भी ज्यादा प्रकाशित पुस्तकें ज्ञान पिपासुओं के हाथों में पहुंचीं, जो आज भी पठनशील व्यक्ति को नव आलोक व दिशा प्रदान कर रही है।
सन् 1920 में जीवन-यात्रा का आरंभ व 2009 में महाप्रयाण, लगभग 9 दशकों की जीवन-यात्रा में वो 10 वर्ष की लघुवय में जैनमुनि के रूप में दीक्षित हुए, आप स्कूली शिक्षा से वंचित ही रहे। तेरापंथ के अष्टम आचार्य कालूगणी से दीक्षित गुरु तथा नवम आचार्य मुनि तुलसी उनके शिक्षा गुरु बने। उनकी बाल-सुलभ चपलता को मुनि तुलसी के अनुशासन ने विनम्र, ग्रहणशील व गंभीर व तीक्ष्ण बुद्धि वाला शिष्य बना दिया।
प्रज्ञा की जागृति और बहुभाषी शिक्षा
अनुकूल वातावरण मिलते ही उनकी प्रज्ञा जागृत हुई। सैंकड़ों पद्यों को एक दिन में कंठस्थ करना उनकी उच्च स्तरीय एकाग्रता का परिचायक हैं। वो राजस्थानी, हिन्दी, संस्कृत व प्राकृत शिक्षा में निष्णात हो गए। इसके साथ ही उनकी गहन अध्ययन, अनुवाद व लेखन-यात्रा आरंभ हुई। आचार्य तुलसी के निर्देशन में उनकी पहली पुस्तक जीव-अजीव सन् 1945 में जनता के हाथों में पंहुची। यह पुस्तक जैन तत्व ज्ञान का प्रवेश-द्वार है। इसमें पच्चीस बोल के माध्यम से जीव निकाय व अजीव के अस्तित्व का विशद व गंभीर विवेचन मिलता है।
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कुछ ही समय में अणुव्रत रूपी संप्रदाय विहिन धर्म की लहर जनता में चल पड़ी व विद्वान व शिक्षाविदों की जिज्ञासाओं को समाहित करने हेतू अणुव्रत की दार्शनिक पृष्ठभूमि पुस्तक प्रकाशित हुई। इस प्रकार महाप्रज्ञ की साहित्य सृजन-यात्रा ने ऐसी गति पकड़ी कि उनकी लेखनी से धार्मिक, नैतिक, सामाजिक, सम-सामयिक विषयों के साथ दर्शन शास्त्र के गहन व गंभीर विषय भी अछूते नहीं रहे। वि. सं. 2028 में आचार्य तुलसी ने उनको महाप्रज्ञ के अलंकरण से प्रतिष्ठित किया।
महाप्रज्ञ के दर्शन, योग और मानसिक एकाग्रता के उपाय
तेरापंथ द्विशताब्दी के अवसर पर भिक्षु विचार दर्शन पुस्तक के माध्यम से भगवान महावीर के सिद्धांतों को आचार्य भिक्षु के आचार-विचार मान्यता, शुद्ध साध्य-शुद्ध साधन, लौकिक व लौकोत्तर धर्म व पुण्य-पाप आदि की दार्शनिक मीमांसा समाज के सामने प्रस्तुत हुई, श्रमण महावीर पुस्तक में जहां आत्मा की स्वतंत्रता, अभय की साधना व भेद विज्ञान का गहन अध्ययन कर सकते हैं तो उनकी जैन दर्शन मनन और मीमांसा में आचार मीमांसा, ज्ञान मीमांसा, प्रमाण मीमांसा जैसे गहन विवेचन के अलावा कर्मवाद, महावीर की मौलिक देन अनेकांत व स्यादवाद का सांगोपांग वर्णन किया गया। महाप्रज्ञ के अनेक साहित्य में मन, योग, ध्यान व विज्ञान का अद्भुत संगम मिलता है।
जैन योग, ऐसो पंच णमोकारो, नाणं, कैसे सोचें, किसने कहा मन चंचल है, एकला चलो रे, अपने घर में, मन के जीते जीत, मन का कायाकल्प, अमूर्त चिंतन, मैं मेरा मन मेरी शान्ति, मैं हूं अपने भाग्य का निर्माता आदि पुस्तकों के माध्यम से मन की चंचलता कम करने व एकाग्रता साधने के अमोघ उपाय सुझाए गए हैं।
महाप्रज्ञ और पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की साझा साहित्यिक पहल
महाप्रज्ञ जी ने आचार्य तुलसी के साथ जैन धर्म के अधिकांश आगमों का संपादन कर उनकी टीकाएं, टिप्पण व चूर्णी से साधकों के लिए पठनीय व सुगम्य बना दिया व जैन साहित्य की अमूल्य सेवा की है। आचार्य महाप्रज्ञ जी के संस्कृत काव्यों, पद्यों, अष्टकमों व गीतिकाओं की अनुपम रचनाएं भक्ति की प्रकाष्ठता को दर्शाती हैं।
महाप्रज्ञ की इस साहित्य यात्रा का एक सुरम्य दस्तावेज कहा जा सकता है उनका हमारे देश के महान व वैज्ञानिक पूर्व राष्ट्रपति महामहिम श्री अब्दुल कलाम के संयुक्त लेखनी से लिखित पुस्तक हैप्पी एन हार्मोनियस फैमली व स्वस्थ समाज स्वस्थ राष्ट्र पुस्तक का प्रकाशन! इस प्रकार महात्मा महाप्रज्ञ साहित्य-महासागर के अनमोल रत्न व साहित्य के असीम आकाश के देदीप्यमान नक्षत्र कहे जा सकते हैं।
– अंजू बैद
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