न्यूज़ चैनलों पर हेट स्पीच का भौकाल
देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर हेट स्पीच पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि, सियासी दलों को अपने नेताओं पर लगाम लगानी चाहिए और मीडिया को भी ऐसे नफरती भाषणों को बार-बार दिखाने से बचना चाहिए। देश के बहुत से लोगों ने आजकल टीवी देखना लगभग बंद कर दिया है। इसका एक बड़ा कारण हमारे स्वनामधन्य न्यूज़ चैनल है। टीवी पर जैसे ही आप देश और दुनिया के ताज़ा हाल-चाल जानने के लिए न्यूज़ सुनना चाहेंगे तो आपका दिल और दिमाग झनझना उठेगा। एक-दूसरे को गाली का संबोधन तो जैसे आम हो गया है।
देश के नामी-गिरामी न्यूज़ चैनलों पर अभद्रता, गाली-गलौज और मार-पीट की घटनाएं अब आम हो गई है। न्यूज चैनल्स की डिबेट्स की भाषाई मर्यादाएं और गरिमा तार-तार हो रही है। ऐसा लगता है डिबेट्स में झूठ और नफरत का खुला खेल खेला जा रहा है। डिबेट्स और चैनलों का ये गिरता स्तर लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। प्रमुख पार्टियों के प्रवक्ता जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं वह निश्चय ही निंदनीय और शर्मनाक है।
देश में कुकुरमुत्तों की तरह न्यूज़ चैनलों की बाढ़ सी आ गई है। इन चैनलों पर प्रतिदिन देश में घटित मुख्य घटनाओं और नेताओं की बयानबाजी पर टीका-टिप्पणियों को देखा और सुना जा सकता है। राजनीतिक पार्टियों के चयनित प्रवक्ता और कथित विशेषज्ञ इन सियासी बहसों में अपनी-अपनी पार्टियों का पक्ष रखते हैं। न्यूज़ चैनलों पर इन दिनों जिस प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप और नफरती बोल सुने जा रहे हैं उससे लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ते देखा जा सकता है।
समाज में भाईचारे की जगह अब घृणा का वातावरण बढ़ा
बड़े-बड़े और धमाकेदार शीर्षकों वाली इन बहसों को सुनकर किसी मार-धाड़ वाली फिल्मों की यादें जाग्रत हो उठती है। एंकर भी इनके आगे असहाय नज़र आते है। कई बार छीना-झपटी, गाली-गलौज और मार-पीट की नौबत आ जाती है। सच तो यह है जबसे टीवी न्यूज चैनलों ने हमारी जिंदगी में दखल दिया है तब से हम एक-दूसरे के दोस्त कम दुश्मन अधिक बन रहे है। समाज में भाईचारे के स्थान पर घृणा का वातावरण ज्यादा व्याप्त हो रहा है।
बहुत से लोगों ने मारधाड़ वाली और डरावनी बहसों को न केवल देखना बंद कर दिया है अपितु टीवी देखने से ही तौबा कर लिया है। लोगों ने एक बार फिर इलेक्ट्रॉनिक के स्थान पर प्रिंट मीडिया की ओर लौटना शुरू कर दिया है। आज भी अखबार की साख और विश्वसनीयता अधिक प्रामाणिक समझी जा रही है। डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अपेक्षा आज भी प्रिंट मीडिया पर लोगों की विश्वसनीयता बरकरार है। आज भी लोग सुबह-सवेरे टीवी न्यूज़ नहीं अपितु अखबार पढ़ना पसंद करते है। प्रबुद्ध वर्ग का कहना है प्रिंट मीडिया आज भी अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन कर रहा है।
इस समय देश के न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया पर नफरत और घृणा के बादल मंडरा रहे है। देश में हर तीसरे महीने कहीं न कहीं चुनावी नगाड़े बजने शुरू हो जाते है। चुनावों के आते ही न्यूज़ चैनलों की बांछें खिल जाती है। चुनावों पर गर्मागरम बहस शुरू हो जाती है। राजनीतिक दलों के नुमाइंदे अपने-अपने पक्ष में दावे-प्रतिदावे शुरू करने लग जाते है। इसी के साथ आरोप और नफरत पैदा करने वाली दलीलें दी जाने लगती है कि कई बार देखने वालों का सिर तक शर्म से झुक जाता है।
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प्रिंट मीडिया को इलेक्ट्रॉनिक से अधिक भरोसेमंद
यही नहीं देश में दुर्भाग्य से कहीं कोई घटना- दुर्घटना घट जाती है तो न्यूज़ चैनलों पर बढ़-चढ़कर ऐसी-ऐसी बातों की झड़ी लग जाती है जिन पर विश्वास करना नामुमकिन हो जाता है। इसीलिए लोग इलेक्ट्रॉनिक के स्थान पर प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता को अधिक प्रमाणिक मानते हैं। इसी कारण लोगों ने टीवी चैनलों पर होने वाली नफरती बहस को देखना न केवल बंद कर दिया अपितु बहुत से लोगों ने तो टीवी देखने से ही तौबा कर ली है।
नफरत और घृणा के इस महासागर में सभी सियासी पार्टियां डुबकी लगा रही है। देश की सर्वोच्च अदालत कई बार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर नियामकीय नियंत्रण की कमी पर अफसोस ज़ाहिर कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने नेताओं के भाषण और टीवी चैनलों को नफरती भाषण फैलाने का जिम्मेदार ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच मामले में कई बार टेलीविजन चैनलों को जमकर फटकार लगाई।

गंगा जमुनी तहजीब से निकले भारतीय घृणा के इस तूफान में बह रहे हैं। हमारे नेताओं के भाषणों, वक्तव्यों और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर शुचिता के स्थान पर नफरत, झूठ, अपशब्द, तथ्यों में तोड़-मरोड़ और असंसदीय भाषा का प्रयोग धड़ल्ले से होता देखा जा सकता हैं। हमारे नेता अब आए दिन सामाजिक संस्कारों और मूल्यों को शर्मसार करते रहते हैं। स्वस्थ आलोचना से लोकतंत्र सशक्त, परंतु नफरत भरे बोल से कमजोर होता है, यह सर्वविदित है। आलोचना का जवाब दिया जा सकता है, मगर नफरत के आरोपों का नहीं।
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