नाम के विवाद को लेकर लुटा एचसीए का खजाना
हैदराबद, लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है, लेकिन सिर्फ एक नाम ने ही हैदराबाद क्रिकेट असोसिएशन (एचसीए) का खजाना खाली कर दिया। मामला शुरू हुआ नाम के साथ और खत्म हुआ खजाना खाली होने के साथ।
उप्पल स्थित क्रिकेट स्टेडियम बनने के बाद उसका नामकरण विशाखा करने के लिए विशाखा इंडस्ट्रीज ने 4 करोड़ दिए थे। दो वर्ष तक स्टेडियम का नाम विशाखा रहा, लेकिन दो साल बाद इसे बदलकर राजीव गांधी का नाम दे दिया गया। इसके खिलाफ विशाखा इंडस्ट्रीज कोर्ट चली गई। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद विशेष अदालत के ज़िला न्यायाधीश ने विशाखा इंडस्ट्रीस के पक्ष में फैसला सुनाया। फैसले के तहत एचसीए को लगभग 68,73,19,584 रुपये विशाखा इंडस्ट्रीस को देने के आदेश दिए गए।
इससे स्पष्ट हो रहा है कि विशाखा के मालिकों और एचसीए के अधिकारियों का सौहार्द समझ से परे है। जो व्यक्ति एचसीए को लूट रहा है, वह अपने निजी फायदे के लिए एचसीए के प्लेटफार्म का इस्तेमाल कैसे कर सकता है, क्लब के एक सचिव ने यह सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि भुगतान हो जाने के बाद विशाखा इंडस्ट्रीस की सदस्यता समाप्त कर देनी चाहिए और इसके मालिकों को किसी भी रूप में एचसीए का सदस्य बनने से प्रतिबंधित कर देना चाहिए, क्योंकि क्रिकेट के लिए आवंटित धन का दुरुपयोग किया जा रहा है।
बीसीसीआई क्रिकेट के विकास के लिए पैसा देती है, यह पैसा गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों के उन बच्चों की मदद के लिए इस्तेमाल होना चाहिए, जो क्रिकेट प्रशिक्षण और खेलने का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं। यह पैसा एक कॉर्पोरेट कंपनी को दिया जा रहा है। एचसीए जो पिछले कई वर्षों से खुद का पैसा जुटाने में विफल रहा और वह बीसीसीआई पर निर्भर रहते हुए उसके द्वारा जारी पैसा लुटाकर बर्बाद कर रहा है।
नाम बदलने के फैसले से बढ़ी राजनीतिक खींचतान
विवाद की शुरुआत 16 अक्तूबर, 2004 को एचसीए और विशाखा इंडस्ट्रीस के बीच किए गए समझौते से हुई, जिसके तहत विशाखा इंडस्ट्रीस को स्टेडियम का नाम करण करने का अधिकार और विज्ञापन व ब्रांडिंग के अधिकार प्राप्त हुए। वास्तविक राशि 6.5 करोड़ रुपये थी और विशाखा ने 4.32 करोड़ रुपये की अग्रिम राशि का भुगतान किया। वर्ष 2005 तक स्टेडियम का अधिकांश हिस्सा बनकर तैयार हो चुका था और यह भारत व दक्षिण अफ्रीका के बीच पहले एक दिवसीय मैच की मेजबानी के लिए तैयार था।
हालाँकि आंध्र-प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत वाई.एस. राजशेखर रेड्डी ने स्टेडियम का नाम बदलकर राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम (आरजीआईसी) रखने का निर्णय लिया। इससे एचसीए और विशाखा इंडस्ट्रीस के बीच पहला विवाद खड़ा हो गया, जिसमें काफी राजनीतिक खींचातानी शामिल थी। क्योंकि विशाखा पर स्टेडियम से अपना नाम हटाने के लिए दबाव डाला गया था। एचसीए ने कहा कि वह स्टेडियम के बजाय एक छोर का नाम विशाखा एन्ड रख सकता है और अनुबंध की अन्य शर्तें जारी रहेगी। रियायत के तौर पर एचसीए अनुबंध की बकाया राशि छोड़ने पर सहमत हो गई।
हाईकोर्ट ने विशाखा इंडस्ट्रीस के पक्ष में सुनाया फैसला
अगले कुछ वर्षों तक विशाखा इंडस्ट्रीस ने अनुबंध के अनुसार मिलने वाले सभी लाभों का आनंद उठाया। बताया गया कि विशाखा इंडस्ट्रीस को जाँच के दौरान कॉर्पोरेट बॉक्स, टिकट और मैदान के भीतर ब्रांडिंग अधिकार आदि दिए जाते थे। पहले आईपीएल के दौरान वर्ष 2008 के समय विशाखा ने उच्च न्यायालय की शरण ली, क्योंकि आईपीएल खेल रही डेक्कन चार्जर्स को आरजीआईसी स्टेडियम घरेलू मैदान के रूप में सौंपा गया और आईपीएल गवर्निंग काउंसिल एक साफ-सुथरा स्टेडियम चाहती थी, जिस पर किसी भी तरह के विज्ञापन का प्रतिबंध न हो।
गवर्निंग काउंसिल ने व्यावसायिक हितों से संबंधित शर्तों को मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि जब यह समझौता हुआ था, तब आईपीएल अस्तित्व में नहीं था। उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान 15 मार्च, 2016 को विशाखा के पक्ष में फैसला सुनाया और 25.92 करोड़ रुपये जारी करने के एचसीए को आदेश देते हुए एचसीए द्वारा इस मामले पर दायर वाणिज्यिक अपील को खारिज कर दिया। उस समय एचसीए में निधियों के अभाव के कारण इस मामले को टाला गया।
भुगतान न होने से 17.5 करोड़ बना 68.73 करोड़ का बकाया
अदालत के आदेश के बाद एचसीए के तत्कालीन अध्यक्ष अरशद अयूब के कार्यकाल के दौरान अनुबंध रद्द करने का फैसला कर 17.5 करोड़ रुपये देने की सहमति जताई गई, लेकिन दुर्भाग्यवश एचसीए विशाखा को इस राशि का भी भुगतान नहीं कर पाया, क्योंकि बीसीसीआई से एचसीए को मिलने वाली धनराशि रोक दी गई थी और एचसीए के पास भुगतान करने के लिए पर्याप्त निधियाँ उपलब्ध नहीं थी।
इस प्रकार इस मामले के लम्बे समय तक लम्बित रहने के कारण 25.92 करोड़ रुपये की राशि ब्याज समेत 68.73 करोड़ रुपये तक पहुँच गई। एचसीए के पूर्व सचिव टी. शेष नारायण ने बताया कि इस मामले की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि अरशद अयूब के बाद विशाखा इंडस्ट्रीस के मालिक डॉ. जी. विवेक एचसीए के अध्यक्ष बने, लेकिन उन्होंने इस मामले को सुलझाने का कोई विकल्प नहीं चुना। उस समय उन्होंने विवेक को स्पष्ट रूप से भुगतान करने के लिए कहा था, जिससे वे हितों के टकराव से भी मुक्त हो जाते थे। लेकिन उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान ऐसा करना नहीं चाहा और उस समय इस मामले पर एक शीर्ष परिषद की बैठक भी बुलाई गई थी, लेकिन विवेक ने यह कहते हुए खुद को बैठक से अलग कर लिया कि बैठक में शामिल होना उचित नहीं है। (सी. सुधाकर)
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