गिफ्ट डीड पर ज़िलाधीश की दूसरी अपील पर सुनवाई अमान्य
हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिक कल्याण अधिनियम के तहत नियुक्त आयुक्त को अपीलीय प्राधिकरण के रूप में ज़िलाधीश द्वारा जारी आदेशों की समीक्षा करने का अधिकार नहीं है। उच्च न्यायालय ने ज़िलाधीश के आदेशों के विरुद्ध अपील की जाँच करने और तथ्यों के आधार पर इनकी पुन जाँच करने के आयुक्त के आदेशों को रद्द कर दिया है। इसी प्रकार तेलंगाना उच्च न्यायालय की खण्डपीठ ने न्यायालय के एकल न्यायाधीश द्वारा दिए गए उस फैसले को भी रद्द कर दिया है, जिसमें ज़िलाधीश द्वारा आयुक्त के आदेशों के अनुसार अपील की सुनवाई करते हुए गिफ्ट डीड को रद्द करने के आदेश को बरकरार रखा था।
सी. श्रीनिवास द्वारा पिछले वर्ष ज़िलाधीश द्वारा कोत्तापेट हैदराबाद स्थित घर पर उनके दादा द्वारा दिए गए गिफ्ट डीड को रद्द करने के आदेश को चुनौती देते हुए दायर याचिका को उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने पहले ही खारिज कर दिया था। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अपरेश कुमार सिंह और जस्टिस जी.एम. मोहियुद्दीन की खण्डपीठ ने एकल न्यायाधीश के फैसले को चुनौती देते हुए श्रीनिवास द्वारा दायर अपील याचिका की सुनवाई की और फैसला सुनाया।
सुनवाई के दौरान श्रीनिवास की ओर से अधिवक्ता ने दलील देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को उसके दादा श्री रामुलू ने वर्ष 2018 में कोत्तापेट स्थित एक मकान गिफ्ट डीड के रूप में दिया था। बाद में मकान को ढहाकर उस भूमि पर 4 करोड़ रुपये की लागत से एक नया मकान बनाने के बाद दादा श्री रामुलू ने उनकी देखभाल का ध्यान न रखने के कारण वर्ष 2022 में गिफ्ट डीड को रद्द करने के लिए आरडीओ में आवेदन किया था, जिसे अस्वीकार कर दिया गया।
आयुक्त के आदेशों को रद्द कर मामले को सिविल अदालत में निपटाने की सलाह
जब दादा श्री रामुलू ने इस पर ज़िलाधीश जो अपीलीय प्राधिकारी है, के समक्ष अपील की, तो अपील यह कहते हुए खारिज कर दी गई कि गिफ्ट डीड में उनके कल्याण का ध्यान रखने की कोई शर्त नहीं रखी गई थी और इस सिविल मामले को सिविल अदालत में हल किया जाना चाहिए। जब भी रामुलू ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत नियुक्त आयुक्त को अपील की, तो ज़िलाधीश को आवेदन पर पुनर्विचार करने और कार्रवाई करने का आदेश दिया गया और ज़िलाधीश ने 2025 के दौरान कार्रवाई करते हुए गिफ्ट डीड को रद्द करने का आदेश जारी किया। यह तर्क दिया गया कि कानून केवल आरडीओ के आदेशों के विरुद्ध ज़िलाधीश को अपील की अनुमति देता है और आयुक्त को दूसरी अपील की अनुमति नहीं है।
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सुनवाई के पश्चात खण्डपीठ ने याद दिलाया कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत आरडीओ प्राथमिक जाँच अधिकारी होता है और अपील न्यायाधीकरण केवल ज़िलाधीश होता है। इसके बाद आयुक्त को मामले में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं है। खण्डपीठ ने स्पष्ट किया कि आयुक्त द्वारा पिछले आदेशों की समीक्षा के लिए दिए गए आदेश कानून के विरुद्ध थे। खण्डपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ज़िलाधीश को दूसरी अपील की जाँच करने की अनुमति नहीं थी। पीठ ने इस दावे को खारिज कर दिया कि श्रीनिवास ने बिना सबूत के फर्जी दस्तावेज बनाए थे। पीठ ने बताया कि अपीलीय क्षेत्राधिकार के मुद्दे पर फैसला सुना रहे थे और उन्होंने दादा श्री रामुलू की संपत्ति पर अधिकारों के बारे में कोई राय व्यक्त नहीं की। खण्डपीठ ने सुझाव दिया कि मामले का निपटारा सिविल अदालत में किया जाए।
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