होलाष्टक है विकार से शुद्धि की ओर प्रस्थान
होलाष्टक का काल भारतीय संस्कृति में केवल तिथियों का समूह नहीं है, बल्कि यह समय के उस सूक्ष्म अंतराल का प्रतीक है, जहाँ प्रकृति, ग्रह-नक्षत्र और मानवीय चेतना एक विशिष्ट रूपांतरण से गुजरते हैं। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होकर पूर्णिमा तक चलने वाले ये आठ दिन शुभ कार्यों के लिए वर्जित माने गए हैं। इसके आध्यात्मिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक धरातल को गहराई से देखें, तो यह वर्जना वास्तव में एक गहरी तैयारी और आंतरिक शुद्धि का निमंत्रण है।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, इन आठ दिनों में सौरमंडल के आठ प्रमुख ग्रह-चंद्रमा, सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु क्रमश अपनी उग्र अवस्था में होते हैं। ग्रहों की यह उग्रता सीधे तौर पर मानव मस्तिष्क और उसकी निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है। जब ब्रह्मांडीय ऊर्जाएं इतनी अस्थिर और प्रखर हों, तो किसी भी नए जीवन-प्रसंग जैसे- विवाह, गृह-प्रवेश या व्यापारिक प्रतिष्ठान की नींव रखना जोखिम भरा माना जाता है, क्योंकि अस्थिर नींव पर खड़ा भवन दीर्घजीवी नहीं होता।
आंतरिक विश्वास और समर्पण से नकारात्मकता पर विजय
अष्टमी तिथि को जब होलाष्टक का आरंभ होता है, तब चंद्रमा अपनी चंचलता के चरम पर होता है। चंद्रमा मन का कारक है। इसकी उग्रता व्यक्ति के भीतर भावनाओं का ज्वार पैदा करती है। यही कारण है कि होलाष्टक के शुरुआती दिनों में लोग अक्सर बिना किसी ठोस कारण के बेचैनी या मानसिक भारीपन महसूस करते हैं। जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, सूर्य, मंगल और शनि जैसे क्रूर ग्रहों का प्रभाव बढ़ता जाता है, जिससे अहंकार, क्रोध और आलस्य की प्रवृत्तियां उभरने लगती हैं।
पौराणिक संदर्भों में इस काल को प्रह्लाद की यातनाओं से जोड़कर देखा गया है। राक्षसराज हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र को भक्ति मार्ग से विचलित करने के लिए इन आठ दिनों में जो क्रूरतम प्रयास किए, वे मानवीय सीमाओं की परीक्षा थे। कभी प्रह्लाद को ऊँचे पर्वत से नीचे पेंका गया, कभी विषधर सर्पों के बीच छोड़ा गया और कभी मतवाले हाथियों के पैरों तले कुचलवाने का प्रयास हुआ। यह कथा हमें यह सिखाती है कि जब बाहरी परिस्थितियां अत्यंत प्रतिकूल हों और चारों ओर नकारात्मक शक्तियों का घेरा हो, तब केवल आंतरिक विश्वास और ईश्वर के प्रति अटूट समर्पण ही रक्षा-कवच का कार्य करता है।
परंपरा, स्वास्थ्य और आत्मशुद्धि का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
प्रह्लाद की वह भक्ति आज के संदर्भ में हमारे आत्मबल का प्रतीक है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो होलाष्टक का समय त्रतु-परिवर्तन का संधिकाल है। उत्तर भारत में शीत त्रतु विदा ले रही होती है और ग्रीष्म का आगमन होने लगता है। इस संक्रमण काल में वातावरण में नमी और तापमान का संतुलन बिगड़ता है, जिससे सूक्ष्म जीवाणु सक्रिय हो जाते हैं। हमारे पूर्वजों ने इस समय को अशौर्च या संयम का समय इसलिए घोषित किया ताकि लोग भीड़भाड़ वाले आयोजनों से बचें और अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दें। होलाष्टक के दौरान होलिका रोपण की परंपरा भी इसी वैज्ञानिक बोध का हिस्सा है।
गाँव के चौराहे पर लकड़ियाँ और सूखी टहनियाँ एकत्र करना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि परिवेश की स्वच्छता का अभियान है। होलिका-दहन के समय निकलने वाली अग्नि और उसमें डाली जाने वाली औषधियाँ जैसे- कपूर, गूगल और लोबान आदि वातावरण को विपांमित करने का कार्य करती हैं। इस प्रकार, जो हमें धार्मिक निषेध दिखाई देता है, उसके मूल में जन-स्वास्थ्य की गहरी चिंता छिपी हुई है। आधुनिक जीवनशैली में जहाँ तनाव और बर्नआउट एक महामारी का रूप ले चुके हैं, वहाँ होलाष्टक को एक कॉस्मिक डिटॉर्क्स या डिजिटल डिटॉक्स के रूप में अपनाया जाना चाहिए।
मौन, ध्यान और नकारात्मकता से मुक्ति का समय
आज के दौर में हम सूचनाओं की निरंतर बमबारी के बीच जी रहे हैं, जहाँ सोशल मीडिया और तकनीक ने हमारे एकांत को समाप्त कर दिया है। होलाष्टक हमें ठहरने का संदेश देते हैं। यह समय आत्म निरीक्षण का है कि पिछले एक वर्ष में हमने कितनी ईर्ष्या, कितना द्वेष और कितना अहंकार अपने भीतर पाल लिया है। जैसे होलिका-दहन में सूखी लकड़ियाँ जलाई जाती हैं, वैसे ही इन आठ दिनों के संयम से हमें अपने भीतर की नकारात्मकता को भस्म करने की तैयारी करनी चाहिए। ध्यान और मौन इस काल के सबसे प्रभावी अस्त्र हैं।
जब हम मौन रहते हैं, तो हमारी ऊर्जा बाहर नष्ट होने के बजाय भीतर की ओर प्रवाहित होने लगती है, जिससे हमारे तंत्रिका तंत्र को विश्राम मिलता है। ज्योतिष शास्त्र की सलाह है कि होलाष्टक के दौरान विशेष रूप से मेष, वफश्चिक और सिंह जैसी उग्र स्वभाव वाली राशियों को अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। मंगल का प्रभाव व्यक्ति को अकारण विवादों में धकेल सकता है। यदि हम इस अवधि में महामृत्युंजय मंत्र का जाप या हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो वह केवल धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि ध्वनियों का एक ऐसा विज्ञान है, जो हमारे मस्तिष्क की तरंगों को शांत करता है।
होलाष्टक से जीवन में रंग भरने की साधना
दान की परंपरा भी इसीलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि दान देने से अहं का विसर्जन होता है। जब हम अपनी प्रिय वस्तु या धन किसी जरूरतमंद को देते हैं, तो हमारे भीतर का मैं छोटा होता है और ब्रह्मांडीय करुणा का संचार होता है। होलाष्टक में काले तिल, वस्त्र और गुड़ का दान विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। ये चीजें शरीर में ऊर्जा के स्तर को बनाए रखने और शनि-मंगल जैसे ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने में सहायक होती हैं।
इस साल का होलाष्टक विशेष इसलिए भी है, क्योंकि यह एक ऐसे समय में आया है, जब दुनिया स्थिरता की तलाश में है। तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में मानवीय संवेदनाएं कहीं पीछे छूटती जा रही हैं। ऐसे में होलाष्टक हमें पुन जड़ों से जोड़ने का कार्य करेगी। 4 मार्च को जब हम रंगों की होली खेलेंगे, तो वह केवल बाहरी रंग नहीं होंगे, बल्कि वे हमारे भीतर की प्रसन्नता और शुद्धता के रंग होंगे। एक शुद्ध मन ही उत्सव का सच्चा पात्र होता है। जिस प्रकार सोना आग में तपकर कुंदन बनता है, उसी प्रकार होलाष्टक की मर्यादित अग्नि में तपकर मनुष्य का व्यक्तित्व निखरता है।
आत्मशुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का आठ दिवसीय अवसर
अंतत होलाष्टक को केवल अशुभ मानकर डरने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय मनीषा में कुछ भी पूर्णत अशुभ नहीं होता है, हर निषेध के पीछे एक सृजनात्मक उद्देश्य होता है। यह काल हमें सिखाता है कि उत्सव मनाने से पहले आत्म-शुद्धि अनिवार्य है। यदि पात्र गंदा हो तो उसमें अमृत भी विष बन जाता है। अत इन आठ दिनों को अपनी आदतों को सुधारने, स्वास्थ्य के प्रति सचेत होने और अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को संचित करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए।
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जब हम इस दृष्टिकोण से होलाष्टक को जिएंगे, तो इस साल की होली हमारे जीवन में न केवल रंग लेकर आएगी, बल्कि एक नई चेतना और सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करेगी। यह यात्रा उग्रता से शांति की ओर, विकार से शुद्धि की ओर और प्रह्लाद जैसी अडिग आस्था की ओर एक सफल प्रस्थान होगी।
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