सृष्टि में एकमात्र मनुष्य ही विचारशील प्राणी है, लेकिन अज्ञानता के कारण हमारे विचार ही हमारे अहंकार को जन्म देते हैं। जब हमारा जन्म होता है तब हम अहंकारी नहीं होते हैं, लेकिन आयु बढ़ने के साथ हमारे भीतर कर्त्ता भाव बढ़ता जाता है, जिसके कारण अहंकार भी बढ़ता रहता है। अहंकार हमारे आध्यात्मिक विकास में बाधक तो होता ही है और हमारे दैनिक जीवन को भी कष्टकर बनाता है।
हमारे अहंकार के कारण सामने वाले के मन में हमारे लिए नकारात्मक तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो हमारे सौभाग्य को नष्ट करती हैं। अहंकार युक्त मनुष्य असुर और अहंकार हीन मनुष्य सुर की श्रेणी में आता है। सांसारिक सुख-समृद्धि, धन-दौलत, अनुभव, पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, सौंदर्य, बड़ा व्यापार, सौभाग्य आदि का अहंकार जाने-अनजाने में ही हो जाता है। अहंकार की सबसे खास बात यह है कि हमें इसकी उपस्थिति का कभी पता ही नहीं चलता है। सांसारिक वस्तुओं के अहंकार से भी अधिक नुकसानदायक है, आध्यात्मिक अहंकार, जो हमें जप-तप, यज्ञ, व्रत-उपवास, गुरुज्ञान, गुरु शरणागति या कृपा प्राप्त होने से हो सकता है।
सांसारिक नहीं, आध्यात्मिक अहंकार से भी रहें सावधान
इसलिए आध्यात्मिक मार्ग पर चलते समय इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए कि कहीं हम सांसारिक अहंकार छोड़कर आध्यात्मिक अहंकार में तो नहीं फंसते जा रहे हैं। जिस प्रकार खुले स्थान को दीवार टुकड़ों में बांट देती है, उसी प्रकार अहंकार हमें भीतर से टुकड़ों में बांटकर पूर्णता की अनुभूति नहीं होने देता है। दीवार की तरह अहंकार होने पर हमारा स्वभाव भी कठोर हो जाता है। हमें अधिक गुस्सा आता है। हमारे स्वभाव से विनम्रता विदा हो जाती है। अकड़ में ना तो हम झुकते हैं, ना ही क्षमा मांगते हैं और ना ही आभार प्रकट करते हैं।
सबसे पहले हमें दिल बड़ा करके यह स्वीकार करना होगा कि हमारे भीतर अहंकार है तभी हम उसकी दीवार को हटाने या गिरने या उसके पार जाने का प्रयास करेंगे। अपने भीतर के अहंकार के कारण हमें सामने वाले सभी अहंकारी दिखते हैं और ऐसा महसूस होता है कि हमारे भीतर अहंकार नहीं है। अहंकार की इस चाल को समझें। यदि आपको किसी के कुछ कहने से बुरा लगता है या दुःख होता है तो समझिए कि आपके भीतर अहंकार की दीवार है। यदि यह दीवार न होती तो आपको बुरा नहीं लगता, क्योंकि दीवार पर हाथ मारने से ही चोट लगती है, हवा में नहीं।
अहंकार नहीं, आभार का भाव अपनाइए
जब बार-बार आपको सामने वाले की गलती ही नजर आती है तो समझिए कि सृष्टि आपके उद्धार के लिए आपको संकेत दे रही है। सामने वाले का व्यवहार कैसा भी हो, आप उसका आभार प्रकट करते हुए, व्यवहार कीजिए तभी आपके अहंकार की दीवार गिरेगी। यहां ध्यान रखना होगा कि आपको सामने वाले को नहीं गिराना है, आपके भीतर की अहंकार की दीवार को गिराना है।
यह भी पढे़: शाप बना वरदान
अलग-अलग प्रकार के अहंकार से निपटने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाने की आवश्यकता नहीं है, केवल आप अपने दृष्टिकोण को सकारात्मक रखें, सभी को जैसे हैं, उसी रूप में खुशी से स्वीकार करें, सभी के गुणों की प्रशंसा करें, सजीव-निर्जीव सबके प्रति आभार प्रकट करें और समर्पित भाव से गुरु सत्संग-सान्निध्य का लाभ लेते रहें, तो धीरे-धीरे आपके भीतर के अहंकार की दीवार में दरार पड़ जाएगी और एक दिन वह गिर जाएगी। इस दीवार के गिरते ही आत्मा और परमात्मा की सारी दूरियां समाप्त हो जाती हैं। बस आपका व्यक्तित्व परमात्मा के अस्तित्व में समा जाएगा।
