ईरान ने संघर्षविराम पर अनिश्चितता के बीच कड़ी चेतावनी दी

काहिरा, तेहरान पर होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने और शांति समझौते को स्वीकार करने का दबाव डालने के लिए अमेरिकी नौसेना ने सोमवार से सभी ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों की नाकेबंदी करने की घोषणा की। जवाब में ईरान ने फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के सभी बंदरगाहों को निशाना बनाने की धमकी दी।
इससे दोनों पक्षों के बीच युद्ध विराम के विफल होने और लड़ाई फिर से छिड़ने की आशंका बढ़ गई, जिससे वैश्विक स्तर पर तेल-गैस की कीमतें और बढ़ सकती हैं। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच 28 फरवरी को हुए सशर्त युद्ध-विराम समझौते को स्थायी शांति में बदलने के लिए पिछले सप्ताहांत पाकिस्तान में हुई वार्ता बेनतीजा रही।
दोनों पक्षों केबीच बातचीत फिर से शुरू होगी या नहीं, इस संबंध में फिलहाल कोई जानकारी सामने नहीं आई है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका की ओर से निर्धारित समय सुबह 10 बजे (पूर्वी समयानुसार) ईरान के सभी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों से पोतों की आवाजाही अवरुद्ध की गई या सघषावराम नहीं।
समुद्री सुरक्षा की निगरानी करने वाली यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस एजेंसी ने नाविकों के लिए एक नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया है कि नाकेबंदी में ‘बंदरगाहों और ऊर्जा बुनियादी ढाँचे सहित पूरी ईरानी तटरेखा’ शामिल है। इसमें कहा गया है कि गैर-ईरानी ठिकानों से आने वाले या वहाँ जाने वाले जहाजों के लिए जलडमरूमध्य से गुजरने पर प्रतिबंध नहीं होने की खबरें हैं, लेकिन क्षेत्र में जहाजों को सैन्य उपस्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ब्रॉडकास्टिंग (आईआरआईबी) के मुताबिक, ‘फारस की खाड़ी और ओमान सागर में सुरक्षा या तो सभी के लिए होगी या किसी के लिए भी नहीं।’ ईरानी सेना ने कहा कि इस क्षेत्र का कोई भी बंदरगाह सुरक्षित नहीं रहेगा। इससे पहले, अमेरिका ने घोषणा की थी कि वह सोमवार को पूर्वी समयानुसार सुबह 10 बजे या ईरान के स्थानीय समयानुसार शाम साढ़े पांच बजे से ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी शुरू करेगा।
कुछ विश्लेषकों का कहना कि अमेरिका के लिए केवल बल प्रयोग के जरिये जहाजों की सामान्य आवाजाही बहाल 19 करना मुश्किल होगा और अभी यह स्पष्ट भी नहीं है कि नाकेबंदी कैसे काम करेगी या अमेरिकी बलों के लिए क्या खतरे हो सकते हैं।
यूएस सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने कहा कि यह नाकेबंदी ‘सभी देशों के उन पोतों के खिलाफ निष्पक्ष रूप से लागू की जाएगी’, जो ईरान के बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं या वहाँ से बाहर जा रहे हैं। सेंटकॉम ने कहा कि गैर-ईरानी बंदरगाहों के बीच यात्रा करने वाले जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी जाएगी। गौरतलब है कि विश्व के 20 फीसदी कच्चे तेल का परिवहन होर्मुन जलडमरूमध्य से होकर होता रहा है। ये घोषणाएँ से पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच शनिवार को हुई लंबी युद्धविराम 2 वार्ता के बिना किसी समझौते के समाप्त होने के बाद की गईं।
इससे पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध संबंधी विचारों को आ लेकर पोप लियो 14वें पर असाधारण रूप से निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें के नहीं लगता कि पोप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं या वह बहुत उदारवादी व्यक्तिर है तथा उन्हें कट्टर वामपंथियों को खुश करना बंद कर देना चाहिए। ट्रंप ने यह टिप्पणी ऐसे समय में की है, जब लियो ने सप्ताहांत में संकेत दिया था कि में सर्वशक्तिमान होने का भ्रम ईरान में अमेरिका-इजराइल युद्ध को हवा दे रहा है। पोप और राष्ट्रपति के विचारों में मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन किसी देश पोप का किसी अमेरिकी नेता की सीधे आलोचना करना असामान्य है और क इसके बाद दी गई ट्रंप की तीखी प्रतिक्रिया भी सामान्य नहीं है।
ईरानी कच्चे तेल की सात साल बाद वापसी
ईरानी कच्चा तेल लेकर आए दो बड़े टैंकर भारत के पूर्वी एवं पश्चिमी तट के बंदरगाहों पर पहुँच गए हैं, जो लगभग सात वर्ष में ऐसी पहली आपूर्ति है। जहाज-ट्रैकिंग विवरण से यह जानकारी मिली।
नेशनल ईरानियन टैंकर कंपनी द्वारा संचालित फेलिसिटी नामक एक बेहद बड़ा कच्चा तेल वाहक जहाज ने रविवार देर रात गुजरात तट के सिक्का के पास लंगर डाला। इसमें करीब 20 लाख बैरल कच्चा तेल है जिसे मार्च के मध्य में खार्ग द्वीप से लादा गया था। दूसरा टैंकर जया लगभग उसी समय ओडिशा तट के पारादीप के पास पहुँचा। यह भी करीब करीब समान मात्रा में कच्चा तेल लेकर आया है जिसे फरवरी के अंत में खार्ग द्वीप से लादा गया था।
यह तेल अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर सैन्य हमले करने और तेहरान की ओर से जवाबी कार्रवाई किए जाने से पहले लादा गया था। करीब सात वर्ष में भारतीय तटों पर पहुँचने वाली ये ईरानी कच्चे तेल की पहली खेप हैं जो पिछले महीने अमेरिका द्वारा जारी प्रतिबंध छूट के बाद संभव हो सकी हैं। एक महीने की इस छूट के तहत समुद्र में पहले से मौजूद ईरानी तेल की बिक्री की अनुमति दी गई थी, जिसका उद्देश्य वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान को कम करना और कीमतों को नियंत्रित करना था।
सप्ताहाँत में शांति वार्ता विफल होने के बाद हालांकि अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी की घोषणा की है ताकि तेहरान के तेल निर्यात राजस्व को सीमित किया जा सके। भारतीय तटों पर पहुँची इन खेपों के खरीदारों का औपचारिक खुलासा नहीं किया गया है। पारादीप बंदरगाह मुख्य रूप से इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन द्वारा संचालित है जिसने छूट के तहत कम से कम एक ईरानी खेप खरीदने की पुष्टि की है। वहीं, सिक्का क्षेत्र रिलायंस इंडस्ट्रीज और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के लिए एक प्रमुख कच्चा तेल हैंडलिंग केंद्र है जिनकी यहाँ बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं।
पिंग शुन नामक टैंकर करीब छह लाख बैरल ईरानी कच्चा तेल के साथ पिछले महीने के अंत में गुजरात के वाडिनार के लिए रवाना हुआ था, लेकिन भुगतान संबंधी समस्याओं के कारण इसे बीच रास्ते में चीन की ओर मोड़ दिया गया था। यदि यह वाडिनार पहुँच जाता, तो यह सात वर्ष में भारत पहुंचने वाली ईरानी तेल की पहली खेप होती।
भारत ऐतिहासिक रूप से ईरानी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार रहा है और रिफाइनरियों की अनुकूलता तथा सहायक व्यावसायिक शर्तों के कारण ईरान के हल्के और भारी दोनों प्रकार के तेल का आयात करता रहा है। वर्ष 2018 में प्रतिबंध सख्त होने के बाद मई 2019 से आयात बंद हो गया और इसकी जगह पश्चिम एशिया, अमेरिका तथा अन्य स्रोतों से आपूर्ति होने लगी। एक समय ईरानी तेल भारत के कुल आयात का 11.5 प्रतिशत हिस्सा था।
भारत ने 2018 में ईरान से प्रतिदिन 5.18 लाख बैरल तेल खरीदा था जो जनवरी से मई 2019 के ( बीच घटकर 2.68 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। इसके बाद से कोई आयात नहीं हुआ। भारतीय रिफाइनरियों मुख्य रूप से ईरान लाइट और ईरान हेवी श्रेणी का तेल खरीदती थीं। अमेरिका ने पिछले महीने समुद्र में ईरानी तेल की खरीद पर 30 दिन के लिए प्रतिबंधों में छूट दी थी, ताकि ईरान पर अमेरिका-इजराइल युद्ध के कारण बढ़ी तेल कीमतों को नियंत्रित किया जा सके।
यह छूट 19 अप्रैल को समाप्त हो रही है। अनुमान है कि समुद्र में लगभग 9.5 9.5 करोड़ बैरल ईरानी तेल मौजूद है जिसमें से करीब 5.1 करोड़ बैरल भारत को बेचा जा सकता है जबकि शेष चीन तथा पूर्व एशिया के खरीदारों के लिए अधिक उपयुक्त है।(भाषा)
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