ईरान का संकट और भारत की दुविधा
अट्ठाईस फरवरी, 2026 की रात ने विश्व इतिहास को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिसकी आशंका तो लंबे समय से जताई जा रही थी, लेकिन जिसका वास्तविक प्रभाव अकल्पनीय होने वाला है। अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के रणनीतिक ठिकानों पर किए गए संयुक्त हवाई हमलों ने न केवल पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन को तार-तार कर दिया है, बल्कि पूरी दुनिया को एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
तेहरान के आसमान में उठते धुएँ के गुबार और मिसाइलों की गूँज ने विश्व बिरादरी के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें खींच दी हैं। यह हमला महज दो देशों के बीच की सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि कूटनीति की विफलता और नए वैश्विक संकट का बिगुल है। भारत के नज़रिये से देखें तो यह स्थिति किसी दोहरी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। नई दिल्ली के आर्थिक और सामरिक हित इस क्षेत्र की स्थिरता से इतनी गहराई से जुड़े हैं कि वहाँ होने वाली छोटी सी हलचल भी भारतीय गलियारों में कंपन पैदा करती है। इस संकट का सबसे पहला और सीधा प्रहार भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ना तय है।
खाड़ी पर निर्भरता से बढ़ी भारत की चिंता
भारत अपनी कच्चा तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। हमले के तत्काल बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में आए उछाल ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने महँगाई और राजकोषीय घाटे का दोहरा खतरा पैदा कर दिया है। यदि यह संघर्ष और बढ़ता है और ईरान जवाब में हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित करने जैसा कोई आत्मघाती कदम उठाता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति ठप हो सकती है। ऐसी स्थिति में भारत जैसे उभरते बाजार के लिए अपनी विकास दर को बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।
आर्थिक पहलुओं से परे, मानवीय संवेदना और सुरक्षा का प्रश्न भी भारत के लिए बेहद अहम है। सयाने बता रहे हैं कि पश्चिम एशिया में वर्तमान में लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी निवास करते हैं। वे न केवल भारत के लिए विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत हैं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक शक्ति के प्रतिनिधि भी हैं। युद्ध की बढ़ती लपटों के बीच उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकालना भारत सरकार के लिए एक विशाल लॉजिस्टिक और कूटनीतिक कार्य होगा।
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चाबहार बंदरगाह में भारत का बड़ा निवेश
रणनीतिक रूप से भी भारत का बहुत कुछ दाँव पर लगा है। भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर में भारी निवेश किया है। ये परियोजनाएँ भारत को पाकिस्तान को बायपास कर मध्य एशिया और यूरोप तक पहुँचने का सीधा रास्ता देती हैं। ईरान में किसी भी प्रकार की लंबी अस्थिरता न केवल इन निवेशों को खतरे में डालेगी, बल्कि भारत के कनेक्टिविटी लक्ष्यों को भी वर्षों पीछे धकेल देगी।
इसके साथ ही, भारत के सामने सबसे बड़ी दुविधा संतुलन साधने की है। एक तरफ अमेरिका भारत का व्यापक रणनीतिक साझेदार है और इजराइल के साथ हमारे रक्षा संबंध नई ऊँचाइयों पर हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ हमारे सदियों पुराने सभ्यतागत रिश्ते और सामरिक हित जुड़े हैं। ऐसे में भारत को अब सक्रिय तटस्थता की अपनी नीति को और अधिक धार देनी होगी। नई दिल्ली को वैश्विक मंचों पर तत्काल प्रभाव से तनाव कम करने की पुरजोर वकालत करनी चाहिए। भारत अपनी विशिष्ट स्थिति का लाभ उठाते हुए एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर सकता है।
अंततः, 28 फरवरी की इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया अब और अधिक ध्रुवीकृत हो रही है। भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बरकरार रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए ठोस और आकस्मिक योजनाएँ तैयार रखनी होंगी। आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि नई वैश्विक व्यवस्था में भारत अपनी भूमिका कितनी कुशलता से निभा पाता है और इस भू-राजनीतिक पावात से अपने हितों को कितना सुरक्षित रख पाता है।
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