क्या अंधी सुरंग में फंस गया है भारत का मिडिल क्लास…?
(वास्तव में भारत में जो मिडिल क्लास का एक बड़ा तबका बताया और दिखाया जाता है, वह वैसा नहीं है, जैसा उसके बारे में सोचा और समझा जाता है। भारत के वास्तविक 13 से 14 करोड़ सम्पन्न मिडिल क्लास के अलावा जो 30 करोड़ अन्य मिडिल क्लास लोग हैं , उसे ब्लूम वेंचर्स की रिपोर्ट में इमर्जिंग या आकांक्षी मिडिल क्लास कहा गया है, जो खर्च करने की इच्छा तो रखता है, लेकिन ऐसा करने से घबराता है, क्योंकि पिछले चार सालों में यानी कोरोना महामारी के बाद से लगातार उसकी आय या तो घटी है या स्थिर है, जिससे उसे अपने नीचे की तरफ जाने का खतरा सता रहा है।)
काफी लंबे अर्से से जो डर सता रहा था या दूसरे शब्दों में जिसकी आशंका उभर रही थी, अंतत वह आशंका हकीकत के रूप में सामने आ गई है। वेंचर कैपिटल फर्म ब्लूम वेंचर्स की एक ताजा रिपोर्ट ने भारत के राजनेताओं को भले परेशान किया हो, लेकिन दुनियाभर के निवेशकों, अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों के कान खड़े कर दिये हैं; क्योंकि इस रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में गरीबी जितनी दिखती है, उससे कहीं ज्यादा है।
दूसरे शब्दों में अपने यहां समृद्धि का जो अनुमान लगाया जा रहा है, विशेषकर मजबूत मिडिल क्लास को लेकर जो हमारी और दुनियाभर की धारणाएं हैं, वे गलत साबित हो रही हैं। हिंदुस्तान की मौजूदा आबादी करीब 1 अरब 42 करोड़ के आसपास है।
भारत का मिडिल क्लास: वास्तविकता और आकांक्षाओं का अंतर
लेकिन इतनी बड़ी आबादी में बमुश्किल 13 से 14 करोड़ मिडिल क्लास आबादी ही ऐसी है, जिसकी क्रयशक्ति दुनिया के दूसरे मिडिल क्लास उपभोक्ताओं के बराबर या उनसे बेहतर है, वर्ना तो हमारे यहां जो करीब 40 से 44 करोड़ मिडिल क्लास आबादी का अनुमान लगाया जा रहा है, वह बड़ा धोखा है। क्योंकि इनमें से 30 से 34 करोड़ ऐसे मिडिल क्लास लोग हैं जो फिलहाल महंगाई की हकीकत और अपनी क्रयशक्ति की वास्तविकता के बीच पिस रहे हैं।
अगर कहा जाए कि इनके साथ दुखद यह हो रहा है कि उन्हें माना तो सम्पन्न वर्ग का जा रहा है, लेकिन ये खुद अपनी हकीकत जानते हैं। वास्तव में भारत में जो मिडिल क्लास का एक बड़ा तबका बताया और दिखाया जाता है, वह वैसा नहीं है, जैसा उसके बारे में सोचा और समझा जाता है।
भारत के वास्तविक 13 से 14 करोड़ सम्पन्न मिडिल क्लास के अलावा जो 30 करोड़ अन्य मिडिल क्लास लोग हैं , उसे ब्लूम वेंचर्स की रिपोर्ट में इमर्जिंग या आकांक्षी मिडिल क्लास कहा गया है, जो खर्च करने की इच्छा तो रखता है, लेकिन ऐसा करने से घबराता है, क्योंकि पिछले चार सालों में यानी कोरोना महामारी के बाद से लगातार उसकी आय या तो घटी है या स्थिर है, जिससे उसे अपने नीचे की तरफ जाने का खतरा सता रहा है।
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भारत में अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई और उसके असर
अगर इस पूरे संदर्भ को व्यापक आर्थिक नजरिये से देखें तो कहा जा सकता है कि भारत में एक लंबे समय से अमीर और गरीब वर्ग के बीच जो खाईं धीरे-धीरे बढ़ रही थी, वह हाल के कुछ सालों में खासकर कोरोना के दौरान या उसके बाद से बहुत ज्यादा तेजी से बढ़ी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में शीर्ष 10 फीसदी आबादी के पास देश की कुल आय के करीब 57.7 फीसदी पर कब्जा है।
जबकि 1990 में इस 10 फीसदी आबादी के पास देश की कुल आय का करीब 34 फीसदी था यानी करीब 34 सालों में अमीरी और गरीबी के बीच फासला करीब 24 फीसदी बढ़ गया है। इसी तरह निचले 50 फीसदी लोगों की कुल आय तब जहां 22.2 फीसदी लोगों के पास हुआ करती थी, वहीं अब यह महज 15 फीसदी लोगों तक सिमटकर रह गयी है।
कहने का मतलब यह है कि ऊपर से भी और नीचे से भी देश में गरीबी और अमीरी के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है। यह कई वजहों से खतरनाक है। हालांकि इस संबंध में कोई ठोस अध्ययन सामने नहीं आया, लेकिन पिछले पांच महीनों से जिस तरह से देश का शेयर बाजार लगातार गिर रहा है, कहीं उस गिरावट के पीछे निवेशकों का यह डर तो नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था जितनी बड़ी और जितनी ठोस दिखायी जा रही है, वैसी है नहीं ?
भारत में महंगी वस्तुओं की मांग बढ़ी, सस्ती घट रही
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि देश में उपभोक्ता सामानों की मांग घट रही है। जहां तक मांग का सवाल है तो उसमें एक विरोधाभास तो यह उभरकर आया है कि देश में महंगी और लग्जरी चीजों की मांग बढ़ रही है, जबकि कम और मझोले दर्जे की चीजों की मांग घट रही है।
इसको इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि हाल के सालों में देश के सभी बड़े महानगरों में न सिर्फ लग्जरी घरों की मांग बढ़ी है बल्कि इनकी पी में भी 12 से 15 फीसदी का इजाफा हुआ है। दूसरी तरफ भारत के सभी बड़े और मझोले शहरों में कम बजट वाले घरों की मांग पिछले 10 सालों में 15 से 22 फीसदी तक कम हुई है, बढ़ी तो है ही नहीं।
यही हाल लग्जरी कारों का भी है। लग्जरी कारें भी देश में आम कारों से ज्यादा (औसत के मामले में) बिक रही हैं। भारत के कुल बाजार में इस समय सस्ते घरों की हिस्सेदारी महज 18 फीसदी है, जबकि 2019-20 में यह करीब 40 फीसदी थी। ठीक यही बात दूसरे ब्रांडेड चीजों पर भी लागू हो रही है। बाजार में लगातार एक्सपीरियंस इकोनॉमी फल फूल रही है।
भारत की अर्थव्यवस्था: उपभोक्ता मांग और मंदी की स्थिति
ब्लूम वेंचर्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कोल्ड प्ले और एड सिरॉन जैसे अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के कंसर्ट पूरी तरह से सफल हो रहे हैं, चाहे इनमें हिस्सेदारी की टिकट कितने ही ऊंचे दामों की क्यों न हो। दूसरी तरफ लोकल उत्पादों या निचली और मध्यम दर्जे की उपभोक्ता चीजों की मांग घट रही है। मतलब साफ है कि पिछले पांच सालों में पहले से गरीब लोग तो और ज्यादा गरीब हुए ही हैं, जो लोग गरीब नहीं हैं, मध्यवर्ग के दायरे में आते हैं, लेकिन कभी भी इस दायरे से नीचे फिसल सकते हैं।
ऐसे लोग बहुत डरे हुए हैं और अपनी खरीदारी ही नहीं बल्कि अपनी ज़रूरतों को भी कम कर दिया है या आम भाषा में कहें तो मन मार लिया है और बाजार की तरफ घूमने जाने तक का नाम नहीं लेते। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था ठहर सी गई है। सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी बाजार से मंदी जाने का नाम नहीं ले रही या फिर यह कह सकते हैं कि बाजार इस कदर उठ नहीं रहा कि कैश इनफ्लो बढ़े और लोगों में खर्च करने की हिम्मत व बेफी आये।
यह खतरनाक स्थिति है। अगर पारिभाषिक शब्दों में कहें तो भारत की अर्थव्यवस्था ग्रोथ के मामले में ठहर सी गई है। यह अकारण नहीं है कि हाल के सालों में जिन कंपनियों ने खुद को मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं की ज़रूरतों के उत्पादों पर फोकस करने का मन बनाया, वो कंपनियां या तो खतरे के लाल निशान के पार पहुंच गई हैं या इतनी कमजोर खुद को महसूस कर रही हैं कि वे बाजार में अपनी गतिविधियों को चाहकर भी नहीं बढ़ा पा रहीं।
भारत की अर्थव्यवस्था: विपरीत स्थिति और समाधान
सवाल है यह स्थिति कितनी खतरनाक है और क्या सरकार और देश का आर्थिक तंत्र इस भयानक सच्चाई को समझ पा रहा है? समझ पा भी रहा है तो क्या इससे निपटने की कोई कोशिश कर रहा है? इस रिपोर्ट का अध्ययन करने और इस अध्ययन से निकले निष्कर्षों को कलमबद्ध करने वाले ने एक मीडिया संस्था से बातचीत करते हुए कहा है कि सरकार ने पिछले दिनों आम बजट में टैक्स छूट देकर जो करीब 12 अरब डॉलर की पूंजी को बाजार में खर्च करने के अलिखित उद्देश्य के तहत मुक्त किया है।
अगर वह पैसा बाजार में आता है, तब तो भारतीय अर्थव्यवस्था में जीडीपी के स्तर पर आधे से पौने फीसदी तक का इजाफा होगा वर्ना रिकॉर्ड फसल उत्पादन के बावजूद देश के उपभोक्ता बाजार में तेजी देखने को शायद ही मिले। क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि देश में उपभोक्ता चीजों की खपत उम्मीद से कहीं ज्यादा बढ़े और इस खपत के बढ़ने के पहले लोगों की आय में भी भरपूर इजाफा हो, तभी यह स्वस्थ चेन देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकती है और उसे बेखबर होकर आगे बढ़ने की, हिम्मत दे सकती है, वर्ना मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स द्वारा किये गये व्यापक अध्ययन से कहीं ज्यादा खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है।
लब्बोलुआब यह कि भारत की अर्थव्यवस्था जैसी दिखती है, वैसी है नहीं। पहले यह बात सिर्फ कुछ अर्थशास्त्रा ही कहा करते थे, जिनको आमतौर पर देश विरोधी मान लिया जाता था, पर अब यह बात बहुत से ऐसे अर्थशास्त्रा भी कह रहे हैं, जिनको देश विरोधी तो नहीं ही माना जा सकता। इसलिए जितना जल्दी हो सके इस विरोधाभास से छुटकारा पाना चाहिए।-(नरेंद्र शर्मा)
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