इस्लामाबाद वार्ता : विफलता और उसके बाद

इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई ताज़ा बातचीत का बेनतीजा रहना कोई साधारण घटना नहीं है। यह सिर्फ एक मीटिंग की विफलता नहीं, बल्कि बरसों से जमे अविश्वास, टकराते हितों और बदलते वैश्विक समीकरणों की झलक है। इस नाकामी ने पश्चिम एशिया ही नहीं, पूरी दुनिया की राजनीति में एक नई बेचैनी पैदा कर दी है।

असल समस्या दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी की है। अमेरिका अब भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को शक की निगाह से देखता है, जबकि ईरान चाहता है कि उस पर लगे सारे प्रतिबंध तुरंत हटाए जाएँ। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे। कोई पहले कदम बढ़ाने को तैयार नहीं। इस तरह कोई बातचीत होती है क्या? अमेरिका धीरे-धीरे राहत देने की बात करता रहा, लेकिन ईरान को तुरंत और पूरी राहत चाहिए थी।

दोनों की घरेलू राजनीति ने मसले को और उलझा दिया। अमेरिका में सरकार पर सख्त रुख अपनाने का दबाव है, वहीं ईरान में कट्टर सोच वाले लोग किसी भी तरह की नरमी को कमजोरी मानते हैं। ऐसे माहौल में लचीली कूटनीति की गुंजाइश कम हो जाती है। शायद दोनों ही वार्ता का केवल नाटक कर रहे थे – समझौते की इच्छा के बिना! नतीजा यह हुआ कि बातचीत औपचारिकता बनकर रह गई।

वार्ता विफलता के बाद अमेरिका-ईरान में बढ़ा तनाव

बातचीत टूटने के बाद दोनों देशों के तेवर और सख्त हो गए हैं। अमेरिका नए और कड़े प्रतिबंधों की बात कर रहा है, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को और आगे बढ़ाने के संकेत दे रहा है। यह टकराव की दिशा में बढ़ते कदम हैं, जो आगे चलकर खतरनाक रूप ले सकते हैं! इस पूरी स्थिति में इजराइल का रुख काफी अहम है। वह पहले से ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने लिए खतरा मानता रहा है।

वह तो शायद चाहता ही था कि बातचीत नाकाम हो जाए! अब उसका मनचाहा हो गया है, तो वह और आक्रामक हो सकता है! वह अमेरिका पर दबाव बढ़ा सकता है और जरूरत पड़ी तो खुद भी कोई कदम उठा सकता है। इससे इलाके में तनाव और बढ़ सकता है। दूसरी तरफ चीन ने चालाकीभरा रवैया अपनाया है। वह ईरान के साथ अपने आर्थिक रिश्ते बनाए रखना चाहता है; साथ ही दुनिया में स्थिरता भी।

चीन बातचीत दोबारा शुरू कराने की बात कर रहा है और खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश में है। यह उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका को भी दिखाता है। यूरोप के देश भी चाहते हैं कि कोई समझौता हो जाए, क्योंकि इससे न सिर्फ सुरक्षा का मसला जुड़ा है बल्कि तेल और गैस के बाजार पर भी असर पड़ता है। लेकिन वे इस लायक ही नहीं है कि अमेरिका या ईरान पर ज्यादा दबाव डाल सकें। रूस इस पूरे मामले को अपने नजरिये से देख रहा है।

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रूस-चीन की भूमिका से बदलता क्षेत्रीय संतुलन

वह अमेरिका के प्रभाव को कम करना चाहता है और ईरान के साथ अपने रिश्तों को मजबूत करने का मौका भी देखता है।अब सवाल यह है कि इस पूरे खेल में भारत कहाँ खड़ा है? क्या वह सिर्फ दर्शक है? जवाब थोड़ा पेचीदा है। भारत पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं है, लेकिन उसकी भूमिका फिलहाल सीमित है। एक तरफ उसके अमेरिका और इजराइल से अच्छे रिश्ते हैं, तो दूसरी तरफ ईरान से भी पुराने संबंध और रणनीतिक हित जुड़े हैं – जैसे चाबहार बंदरगाह।

भारत का इलाके में शांति और अपनी ऊर्जा जरूरतों को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक है। अगर पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतें बढ़ेंगी, जिसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इसलिए भारत खुलकर किसी एक पक्ष के साथ जाने के बजाय संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। अभी वह एक सक्रिय मध्यस्थ से ज्यादा एक सतर्क पर्यवेक्षक की भूमिका में है। कुल मिलाकर, इस्लामाबाद की यह नाकामी बताती है कि सिर्फ बैठकों से हल नहीं निकलता। जब तक सच्ची राजनीतिक इच्छा, आपसी भरोसा और मिलकर काम करने की भावना नहीं होगी, तब तक यह मसला उलझा ही रहेगा।

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