जावेद अख़्तर ने JLF 2026 में उर्दू की असली पहचान बताई
जयपुर, गुलाबी नगरी जयपुर में गुरुवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) 2026 का भव्य आगाज़ हुआ। पहले ही दिन साहित्य, भाषा, कविता और विचारों का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने श्रोताओं और पाठकों को गहरे संवाद में बांध लिया। होटल क्लार्क्स अमेर और जेएलएन मार्ग परिसर में शुरू हुए इस प्रतिष्ठित साहित्यिक महोत्सव में देश-दुनिया के नामचीन लेखक, कवि, कलाकार और बुद्धिजीवी जुटे। उद्घाटन दिवस पर जहां दिग्गज अभिनेत्री ज़ीनत अमान ने लेखक-इतिहासकार अमन नाथ की कविता संग्रह ‘ओल्डर, बोल्डर’ का विमोचन किया, वहीं भाषा और सांस्कृतिक पहचान पर भी बेहद विचारोत्तेजक सत्र आयोजित हुए।
उर्दू की सेक्युलर आत्मा और भाषा की असली पहचान
जयपुर साहित्य महोत्सव के एक प्रमुख सत्र में प्रसिद्ध लेखक और शायर जावेद अख़्तर ने भाषा, संस्कृति और पहचान के रिश्ते पर गहन विमर्श किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उर्दू को किसी एक धर्म से जोड़कर देखना न सिर्फ ऐतिहासिक भूल है, बल्कि सांस्कृतिक अन्याय भी है। उर्दू साहित्य ने सदियों से प्रेम, दर्शन, विद्रोह, पीड़ा और मानवता की अभिव्यक्ति की है, जो हर समाज और हर वर्ग से जुड़ी हुई है।

जावेद अख़्तर ने उर्दू की समावेशी प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह भाषा अरबी, देवनागरी और गुरुमुखी तीनों लिपियों में लिखी जाती है। यह तथ्य भारतीय भाषायी विविधता और सांझी संस्कृति की खूबसूरत मिसाल है। उनके अनुसार, उर्दू की आत्मा किसी एक पहचान में सीमित नहीं, बल्कि यह संवाद और साझी विरासत की भाषा है।
शब्द उधार लिए जा सकते हैं, व्याकरण ही भाषा की आत्मा
भाषा की संरचना को समझाते हुए जावेद अख़्तर ने एक सरल लेकिन प्रभावशाली उदाहरण दिया
“Yeh room spacious hai.”
उन्होंने कहा कि भले ही इस वाक्य में ‘room’ और ‘spacious’ अंग्रेज़ी के शब्द हैं, लेकिन कोई इसे अंग्रेज़ी नहीं कहेगा। क्योंकि भाषा की पहचान शब्दों से नहीं, उसके व्याकरण से होती है। ‘यह’ और ‘है’ जैसे शब्द इस वाक्य को हिंदी बनाते हैं। उनका स्पष्ट संदेश था कि शब्द भाषाओं के बीच आते-जाते रहते हैं, लेकिन व्याकरण ही भाषा की असली ताक़त और पहचान होता है।

उन्होंने यह भी बताया कि ‘बंदूक’ और ‘संदूक’ जैसे शब्द तुर्की मूल के हैं, जबकि ‘ऑटो-रिक्शा’ ग्रीक और जापानी शब्दों का मेल है, फिर भी ये भारतीय भाषाओं का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। यह दर्शाता है कि भाषाएं शुद्धता से नहीं, बल्कि संवाद और आपसी आदान-प्रदान से समृद्ध होती हैं।
सत्र के अंत में जावेद अख़्तर ने क्षेत्रीय और बोलचाल की भाषाओं के प्रति समाज के रवैये पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि स्थानीय बोलियों को कमतर समझना दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि यही भाषाएं आम लोगों के जीवन, संघर्ष और भावनाओं की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति करती हैं।
पहले दिन के इन सत्रों ने यह साफ कर दिया कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 केवल साहित्य का उत्सव नहीं, बल्कि भाषा, विचार और सांस्कृतिक समावेशिता पर गहरे संवाद का मंच है जहां भाषा दीवार नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने वाला पुल बनकर सामने आती है।
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