समय की माँग है संयुक्त परिवार प्रथा

भारत में संयुक्त परिवार की प्रथा वैदिक काल से चली आ रही है। वास्तव में लोग खेती और पशुपालन करते हुए, साथ मिलकर रहने लगे, इसी के साथ संयुक्त परिवार की नींव पड़ी। संयुक्त परिवार में लगभग तीन पीढ़ियां एक ही छत के नीचे मिलकर रहती हैं। सब साथ रहकर एक-दूसरे के सुख-दुःख साझा करते हैं। अपने कर्तव्य पूरे करते हैं और एक-दूसरे का अनुभव प्राप्त करते हैं। संयुक्त परिवार प्रथा एक प्रकार से हमें सुरक्षा कवच प्रदान करती है।
यह प्रथा हमारे ऋषि-मुनियों की दूरदृष्टि का प्रत्यक्ष प्रमाण है। आज भी यदाकदा ऐसे परिवार देखने को मिल जाते हैं। मानव सभ्यता के विकास के साथ संयुक्त परिवार प्रथा चलन में आई, लेकिन पाश्चात्य सभ्यता और बाजारवाद ने इस प्रथा पर कुठाराघात किया, जिससे एकल परिवार प्रचलन में आए। माना गया कि छोटा परिवार सुखी संसार। एकल परिवार ने वृद्धाश्रमों तथा बालघरों की आवश्यकता को जन्म दिया।
इस प्रथा में सब स्वतंत्र रूप से अपना-अपना जी-वन जीना चाहते हैं। इसमें बुजुर्गों को अपने से छोटों को नियंत्रण में रखने का अधिकार नहीं होता हैं तथा छोटे बुजुर्गों को पिछड़ा हुआ मानकर उनके अनुभवों को अनसुना और अनदेखा कर जाते हैं। एकल परिवार ने आपसी संबंधों के साथ-साथ हमारी संस्कृति और सभ्यता पर भी प्रहार किया है। एकल परिवारों ने बुजुर्गों की हंसी छीनी है, तो नन्हे बच्चों को दादा-दादी, बुआ, चाचा, ताऊ आदि के दुलार से दूर रखा है। एकल परिवार लोगों को सुरक्षित रखने में असमर्थ सिद्ध हुए हैं। इनमें वृद्धों, महिलाओं तथा बच्चों की स्थिति दयनीय बन गई है।
संयुक्त परिवार: सामाजिक विकृतियों का समाधान
कह सकते हैं कि एकल परिवार ने समाज में कई विकृतियों को जन्म दिया है। आज समय पुनः संयुक्त परिवार की माँग कर रहा है। इस संस्था में मानव को आर्थिक सहयोग मिलता है, भावनात्मक सुरक्षा का अह-सास होता है, बच्चों को बेहतर संस्कार मिलते हैं और बुजुर्गों की देखभाल भी होती है। संयुक्त परिवार में अकेलापन और आधुनिक जीवन का तनाव नहीं होता है। यह रिश्तों में मजबूती, जिम्मेदारियों का बंटवारा और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के लिए एक मजबूत आधार है, जो अकेलेपन और आधुनिक चुनौतियों के दौर में महत्वपूर्ण है।
आधुनिक जीवन की भागदौड़ और अकेलेपन के बीच, संयुक्त परिवार एक आरामदायक और सहायक वातावरण प्रदान करता है, जहाँ लोग अपने सुख-दुःख बांट सकते हैं, जिससे लोगों में तनाव कम होता है। बच्चे दादा-दादी, चाचा-चाची के प्यार और देख-रेख में पलते हैं, जिससे उन्हें अच्छे संस्कार, अनुशासन और सामाजिक समझ मिलती है। इस प्रथा में घर, बिजली, भोजन आदि के खर्च साझा होते हैं, जिससे किसी एक व्यक्ति पर आर्थिक बोझ नहीं पड़ता है और आपात स्थितियों के लिए बचत करना आसान होता है। बुजुर्गों को अकेलापन महसूस नहीं होता है।
सहयोग, सुरक्षा और संस्कारों की नींव
उनकी ज़रूरतों का ध्यान रखा जाता है, जिससे उनका बुढ़ापा सुखी और कष्ट रहित होता है। घर के काम, त्योहारों और मुश्किल समय (जैसे बीमारी या आपदा) में सभी सदस्य मिलकर काम करते हैं, जिससे काम आसान हो जाता है। परिवार के सदस्य हमेशा एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं, जिससे घर की सुरक्षा और अचानक आई मु- सीबतों से निपटने में मदद मिलती है। संयुक्त परिवार परंपराओं, मूल्यों और रीति-रिवाजों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सबसे अच्छा माध्यम है।

अकेलेपन और तनाव के इस दौर में संयुक्त परिवार सिर्फ एक सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक मानसिक सहारा और मजबूत सामाजिक सुरक्षा कवच है, जो हर पीढ़ी के लिए आवश्यक है। समय रहते हम सबको सचेत होकर संयुक्त परिवार की धारणा को पुनः स्वीकार कर लेना चाहिए। हमारे पुरखों ने हमें सहारा, संस्कार, सेहत और सुरक्षित वातावरण प्रदान किया है और हम अपनी भावी पीढ़ियों को असुरक्षित, प्रदूषित और अमानवीय भावों से परिपूर्ण समाज प्रदान करें, यह क्या उचित है? समय रहते भारतीय परंप-राओं को अपनाते हुए, भले ही कुछ बदलाव के साथ संयुक्त परिवारों का निर्माण करें, तो भावी पीढ़ी को भी सुरक्षित व हर्षित तथा उल्लासित वातावरण मिल सकता है।
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



