कालेश्वरम परियोजना राज्य पर बोझ : सरकार

हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय में कालेश्वरम परियोजना पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बताया कि कैग रिपोर्ट से पता चला है कि कालेश्वरम परियोजना पर किया गया खर्च उससे होने वाली इनकम के हिसाब से नहीं था और यह एक कास्ट एफेक्टिव प्रॉजेक्ट नहीं था। सरकार ने यह भी कहा कि परियोजना की 64 प्रतिशत लागत ऋण के जरिए जुटाई गई, जिससे राज्य सरकार पर वित्तीय बोझ पड़ा है।

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अपरेश कुमार सिंह, जस्टिस जी.एम. मोहियुद्दीन की खण्डपीठ ने गुरुवार को पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव, पूर्व सिंचाई मंत्री हरीश राव, आईएएस अधिकारी स्मिता सबरवाल और पूर्व आईएएस अधिकारी एस.के. जोशी की याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें 14 मार्च, 2024 को जारी सरकारी आदेश संख्या 6 को चुनौती दी गई थी, जिसमें मेडीगड्डा, अन्नारम और सुंदिल्ला बैरेज के निर्माण और प्रबंधन में गड़बड़ियों की जाँच के लिए जस्टिस पी.सी. घोष आयोग को नियुक्त किया गया था।

कालेश्वरम परियोजना की लागत में 1.47 लाख करोड़ तक वृद्धि

सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से महाधिवक्ता ए. सुदर्शन रेड्डी ने कहा कि 81.911 हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना में 1.47 लाख करोड़ रुपये तक की बढ़ोत्तरी हुई है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 के दौरान परियोजना की लागत 86,788 करोड़ रुपये थी, जिसमें कालेश्वरम प्रॉजेक्ट लिमिटेड ने बजट की परवाह किए बिना ऋण के जरिए 55,807 करोड़ रुपये खर्च किए। इससे स्पष्ट हो रहा है कि इस परियोजना की लागत से खर्च 64 प्रतिशत ज्यादा है। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा परियोजना पर खर्च किए गए हर रुपये पर 52 पैसे का रिटर्न मिलता है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता जानते हैं कि आयोग की जाँच कैसे होती है, उन्होंने कहा कि पहले जो सिंगल मेंबर कमिशन बनाना था, उसके गठन का मामला उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक गया था।

इसीलिए याचिकाकर्ता को 8बी और सी नोटिस के बारे में भी पता है। आयोग के द्वारा जाँच पूरी करने और रिपोर्ट देने के बाद विधानसभा में इस पर चर्चा भी हुई थी। उन्होंने कहा कि बाद में रिपोर्ट में अनियमितताएँ होने पर सरकार ने सरकारी आदेश संख्या 104 जारी कर सीबीआई को इनकी जाँच करने को कहा।

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आईएएस स्मिता सबरवाल पर नियम उल्लंघन का आरोप

सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री रघुराम ने दलील देते हुए कहा कि आईएएस अधिकारी स्मिता सबरवाल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री की सहायता करने के लिए व्यावसायिक नियमों का उल्लंघन किया। उन्होंने कहा कि उनके आने से पहले 95 लोगों से पूछताछ की गई थी और आयोग ने कुल 119 लोगों से पूछताछ की। उन्होंने कहा कि मेडीगड्डा, अन्नारम और सुंदिल्ला बैरेज के निर्माण की अनुमति देने के लिए उनके द्वारा जारी सरकारी आदेश को मंत्रिमंडल के समक्ष नहीं रखा गया था।

सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. निरंजन रेड्डी ने कहा कि न्यायमूर्ति घोष आयोग ने न केवल पूर्व आईएएस अधिकारी शैलेन्द्र कुमार जोशी से बल्कि कालेश्वरम परियोजना के संबंध में उस समय के सभी अधिकारियों से पूछताछ की। उन्होंने कहा कि परियोजना के काम से जुड़े 11 अधिकारियों से पूछताछ की गई, जिनमें एसई, ईई और हाई पॉवर कमेटी के सदस्यों से भी पूछताछ की गई। उन्होंने कहा कि विशेषज्ञ समिति के यह कहने के बावजूद कि मेडीगड्डा में कोई बैरेज नहीं होना चाहिए, उस समय के मुख्यमंत्री ने यह फैसला लिया।

कैग रिपोर्ट से भी पता चलता है कि परियोजना पर खर्च की तुलना में राजस्व कम था। उन्होंने कहा कि राज्य पर लगभग 8 से 9 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है, जिसमें से एक लाख करोड़ रुपये अकेले इस परियोजना पर लिया गया कर्ज है। उन्होंने कहा कि जब जाँच के लिए कमिशन बनाया गया था, तब किसी ने उस पर सवाल नहीं उठाया और रिपोर्ट आने के बाद उन्होंने सरकारी आदेश संख्या 6 को चुनौती दी। दलील सुनने के पशचात खण्डपीठ ने याचिकाकर्ताओं के जवाब के लिए सुनवाई 19 मार्च तक स्थगित कर दी।

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