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कर्नाटक हेट स्पीच कानून : ढाल या तलवार ?

अठारह दिसंबर, 2025 को कर्नाटक विधानसभा ने नफरती अभिव्यक्तियों पर लगाम लगाने के लिए एक नया कानून पास किया है – कर्नाटक हेट स्पीच तथा हेट क्राइम्स(निवारण) विधेयक, 2025। नाम सुनते ही सवाल उठता है कि, यह कानून अल्पसंख्यकों की रक्षा करने वाली ढाल बनेगा या अभिव्यक्ति की आजादी को चीरने वाली तलवार का नया ताला? राज्य सरकार का दावा ठीक हो सकता है कि इससे सामाजिक सद्भाव मजबूत होगा। लेकिन विपक्ष के इस डर को भी कैसे बेबुनियाद कहा जाए कि इसके दुरुपयोग की संभावनाएँ काफ़ी प्रबल हैं।

आसान भाषा में कहें तो, हेट स्पीच – वह बोलना या लिखना है जो किसी व्यक्ति, समूह या संगठन के खिलाफ चोट पहुँचाए, नफरत भड़काए या दुश्मनी पैदा करे। ऐसी अभिव्यक्ति के पीछे प्रायः धर्म, जाति, लिंग या क्षेत्र के पूर्वाग्रह सक्रिय होते हैं। यह कानून ऐसी हर अभिव्यक्ति पर लागू होगा – मौखिक, लिखित, वीडियो या सोशल मीडिया पर प्रचारित। हेट क्राइम में उकसावा या मदद देना भी जुड़ जाता है। पहली बार में कम से कम एक साल जेल और 50 हजार का जुर्माना।

सख्त सज़ा और पुलिस अधिकार: कानून का दंडात्मक पक्ष

दोबारा पकड़े गए तो दो साल से दस साल तक। ये अपराध ऐसे हैं कि पुलिस बिना वारंट गिरफ्तार कर सकेगी। जमानत भी आसान न होगी। मजिस्ट्रेट कंटेंट हटाने का आदेश दे सकेंगे। संगठनों को भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा। पीड़ितों को मुआवजा मिलेगा। कहना न होगा कि भारत में नफरत की आग प्रायः भड़कती ही रहती है। सोशल मीडिया पर अफवाहें, लिंचिंग की खबरें, दंगे!

सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में पुराने कानूनों (जैसे आईपीसी की धारा 153ए) को कमजोर बताया था। विधि आयोग ने 2017 में सख्त कदम की सलाह दी थी। यह कानून उसी दिशा में कदम है। इसमें सिर्फ सजा नहीं, रोकथाम पर जोर है। आज के डिजिटल जमाने में फेक न्यूज घृणा फैलाती है, तो सरकार का हस्तक्षेप जरूरी लगता ही है। संगठनों को जवाबदेह बनाना सामाजिक न्याय का अच्छा तरीका है। संविधान का अनुच्छेद 51क कहता है – हम सबका कर्तव्य है सद्भाव बनाए रखना। इस लिहाज से देखें तो, यह कानून सही और प्रासंगिक लगता है।

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व्यापक परिभाषा से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा

लेकिन, रुकिए। कमियों को भी तो नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता न। परिभाषा इतनी चौड़ी है कि नफरत पैदा करने वाली अभिव्यक्ति क्या है, तय कौन करेगा? कोई राजनैतिक बहस, किताब का हिस्सा या हास्य-व्यंग्य भी इसमें आसानी से फँस सकता है। छूट तो है – कला, विज्ञान के लिए। लेकिन वह भी धुँधली। राज्य में विपक्षी पार्टी भाजपा का यह आरोप बड़ी हद तक सही लगता है कि विधेयक को बिना पूरी चर्चा या कमेटी जाँच के जल्दबाजी में पास किया गया है। विपक्ष वॉकआउट कर गया और कानून बन गया! (आजकल यह रिवाज हो गया है, जो लोकतंत्र की सेहत के लिए कतई अच्छा नहीं – केंद्र में हो या राज्य में! लेकिन लोकतंत्र की सेहत की परवाह ही किसे है?) अगर इस कानून से अनुच्छेद 19 की आजादी पर डर का साया पड़ा तो हर किसी को पूछना होगा- चुप रहूँ या बोल दूँ?

ज़ाहिर है, यह ऐसा हथियार है जो ढाल भी है और तलवार भी। बेशक, इससे हेट क्राइम रुकेंगे। खासकर अल्पसंख्यक सुरक्षित महसूस करेंगे। लेकिन, प्रकारांतर से सेंसरशिप लागू हो जाएगी। अगर पुलिस पूर्वाग्रही हुई, तो नफरत कम होने के बजाय और भड़केगी! आख़िर में, एक ज़रूरी सवाल। क्या देखादेखी दूसरे राज्य या केंद्र सरकार भी ऐसे निवारक कानून बनाएँगी? कानून बनाने में कर्नाटक पहला है, लेकिन तमिलनाडु जैसे राज्य पहले से ही धार्मिक उत्सवों पर पाबंदी लगाते रहे हैं। यानी, असंभव नहीं कि कुछ अन्य राज्य भी इसे कॉपी करें! सयाने याद दिला रहे हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर, 2022 में केंद्र की ऐसी कोशिश नाकाम रही थी। अचरज नहीं होना चाहिए अगर वह प्रेत अब पुनः बोतल से बाहर निकलने को छटपटाए!

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