साहसी और निडर होती हैं केरलम की महिलाएँ !
केरलम के इडुक्की में एक चुनावी रैली के दौरान राहुल गांधी का यह कहना कि केरलम की महिलाएँ साहसी और निडर होती हैं, महज़ राजनीतिक प्रशंसा नहीं, बल्कि एक गहरे समाजशास्त्रीय यथार्थ की ओर संकेत करता है। यह कथन हमें इस प्रश्न पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है कि आखिर किन सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों से केरल की महिलाएँ भारतीय परिदृश्य में विशिष्ट दिखाई देती हैं।
सबसे पहले, केरलम की सामाजिक संरचना को समझना आवश्यक है। यहाँ शिक्षा का स्तर देश में सबसे ऊँचा है और महिला साक्षरता लगभग सार्वभौमिक है। शिक्षा केवल अक्षरज्ञान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह आत्मविश्वास, अधिकार-बोध और सामाजिक भागीदारी की चेतना को भी जन्म देती है। एक शिक्षित महिला अपने अधिकारों के प्रति सजग होती है, अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने में सक्षम होती है और निर्णय-प्रक्रिया में सािढय भागीदारी निभाती है। यही कारण है कि केरलम की महिलाएँ सार्वजनिक जीवन में अधिक मुखर और प्रभावशाली दिखाई देती हैं।
सामाजिक सुधार आंदोलनों ने बदली महिलाओं की स्थिति
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है केरलम का ऐतिहासिक सामाजिक सुधार आंदोलन। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में यहाँ अनेक सुधारकों (जैसे श्री नारायण गुरु) ने जाति, लिंग और सामाजिक असमानताओं के विरुद्ध संघर्ष किया। इन आंदोलनों ने महिलाओं की स्थिति में सुधार की दिशा में ठोस आधार तैयार किया। शिक्षा, संपत्ति के अधिकार और सामाजिक सम्मान जैसे मुद्दों पर हुए बदलावों ने महिलाओं को एक नई पहचान दी।
केरलम की विशिष्टता का एक और महत्वपूर्ण आयाम है वहाँ की मातृसत्तात्मक परंपराएँ – विशेषकर नायर समुदाय में प्रचलित मरुमक्कत्तायम व्यवस्था। सयाने बताते हैं कि इस व्यवस्था में वंश और संपत्ति का उत्तराधिकार मातृ पक्ष से चलता था। यद्यपि आज यह परंपरा काफी हद तक समाप्त हो चुकी है, फिर भी इसके सांस्कृतिक अवशेष आज भी महिलाओं की सामाजिक स्थिति को अपेक्षाकृत सशक्त बनाए रखते हैं। यह परंपरा महिलाओं को परिवार और समाज में एक केंद्रीय भूमिका प्रदान करती रही है, जो देश के अन्य हिस्सों में अपेक्षाकृत दुर्लभ है।
गौरतलब है कि स्वास्थ्य और मानव विकास के सूचकांकों में भी केरल अग्रणी रहा है। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ, कम मातृ मृत्यु दर और उच्च जीवन प्रत्याशा महिलाओं के समग्र सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब कोई समाज अपने नागरिकों – विशेषकर महिलाओं – के स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश करता है, तो वह अनिवार्य रूप से एक अधिक समतामूलक और प्रगतिशील समाज का निर्माण करता है।
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कुटुंबश्री समूहों ने बढ़ाई महिलाओं की आर्थिक ताकत
आर्थिक भागीदारी के संदर्भ में भी केरलम की महिलाएँ उल्लेखनीय हैं। कुटुंबश्री जैसे स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। ये समूह न केवल आय-सृजन के अवसर प्रदान करते हैं, बल्कि सामुदायिक नेतृत्व और सामाजिक एकजुटता को भी बढ़ावा देते हैं। इससे महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक हस्तक्षेप की ताकत विकसित होती है।
यहाँ यह भी कहना ज़रूरी है कि यह तस्वीर पूरी तरह आदर्श नहीं है। केरलम में भी घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा और लैंगिक असमानता जैसी समस्याएँ मौजूद हैं! उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य स्तर के बावजूद, महिला श्रमबल सहभागिता अपेक्षाकृत कम है! यह विरोधाभास बताता है कि केवल संरचनात्मक विकास पर्याप्त नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता में बदलाव भी ज़रूरी है।
फिर भी, जब राहुल गांधी केरलम की महिलाओं को साहसी और निडर कहते हैं, तो यह बयान एक व्यापक सामाजिक प्रक्रिया का सार प्रस्तुत करता है। यह साहस केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि एक ऐसे सामाजिक परिवेश का परिणाम है, जिसने महिलाओं को अवसर, शिक्षा और सम्मान प्रदान किया है। भारत के अन्य राज्यों के लिए यह एक प्रेरक मॉडल है कि महिला सशक्तिकरण केवल योजनाओं तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के हर स्तर पर व्यवहार में उतर आए।
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