भगवान को जानना ज्ञान और प्राप्त करना विज्ञान : जयाकिशोरीजी
हैदराबाद, भगवान को जानना ज्ञान है और भगवान को प्राप्त कर लेना विज्ञान है। जिस प्रकार दूध में से घी निकालने के लिए मेहनत करनी पड़ती है वैसे ही हम सभी के भीतर ईश्वर का तत्व है जिसे बाहर लाने के लिए पहले अपने आप को तपाना पड़ता है। जब तक मन से अच्छी तरह मंथन नहीं होगा, तब तक भगवान की प्राप्ति नहीं होगी।




















उक्त उद्गार शमशाबाद स्थित एस.एस. कन्वेंशन में प्रभुदयाल पंच परिवार, टिबा बसईवाले द्वारा आयोजित श्रीराम कथा के द्वितीय दिवस कथा की महत्ता बताते हुए आध्यात्मिक प्रवक्ता जयाकिशोरीजी ने दिये। उन्होंने कहा कि शिवजी को श्रीरामजी की कथा बहुत अच्छी लगती है। जब समय मिलता, माता पार्वती को कथा सुनाते हैं, क्योंकि श्रीरामजी भोलेनाथ के भक्त हैं और भोलेनाथ के श्रीरामजी भक्त हैं।
रामकथा में कैकयी और मंथरा के पात्रों की भूमिका का वर्णन
भगवान श्रीरामजी के दर्शन के लिए महादेव कागभुशुंडी को लेकर अयोध्या गये और श्रीरामजी के दर्शन किये, क्योंकि भोलेनाथ जी सीधे तौर पर श्रीरामजी के दर्शन साधारण रूप से नहीं करना चाहते थे। इसलिए भेष बनाया। मनुष्य जन्म में भगवान के दर्शन का तो मजा अलग है। जयाकिशोरीजी ने आगे कहा कि रामकथा में ऐसे दो पात्र हैं जिन्हें सभी नफरत की दृष्टि से देखते हैं- कैकयी और मंथरा।
असल में दोनों का दोष नहीं था, सब देवताओं का किया धरा है। रामजी का जन्म हो गया। गुरु से शिक्षा ग्रहण की। अच्छे बालक बने। देवताओं को लगा उनका कार्य राजमहल में रहने लायक नहीं है। इसलिए सबसे पहले मां सरस्वती से मंथरा की बुद्धि फेरने कहा और फिर कैकयी माता से प्रार्थना की कि ऐसा करें कि श्रीरामजी को वनवास मिले। सब चाहते थे श्रीराम राजा बनें, पर कैकेयी माता चाहती थी कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बनें। जब तक राज्य में राजकुमार राम थे राजा राम बन सकते थे, पर वनवास में जाकर मर्यादा पुरुषोत्तम बने। सुश्री जयाकिशोरी ने कहा कि जीवन का संघर्ष हमें सुन्दर बनाता है। संघर्ष से मत भागो। रामजी कभी नहीं भागे। उनका संघर्षमय जीवन सकारात्मकता पर टिका है।
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राक्षस और विघ्न जीवन में आते हैं, लेकिन मंगल कार्य से निपटें
उससे वे कभी नहीं भागे। जीवन कितने ऐशोआराम में निकाल सकते थे पर उन्हें अचानक वनवास भेजा गया और वहां हर चीज खुद ही करनी पड़ी। वनवास के 14 वर्ष एक स्थान पर नहीं रहे। भगवान को मानने से भगवान का भला नहीं होता है, बल्कि हमारा भला होता है। जीवन में भगवान व्यक्ति के कई काम बनाते हैं पर मनुष्य स्वार्थी है। उसके पास हमेशा ही शिकायत की लंबी लिस्ट होती है।
भगवान से केवल शिकायत रही है पर जो मिला उसके लिए धन्यवाद नहीं किया। वही दिखते हैं जो हमें नहीं मिला पर जो मिला है उसकी कद्र करनी चाहिए। प्रेम हो चाहे चांद से, लेकिन वह दूर से ही अच्छा लगता है। पास आते ही उसमें दाग दिखने लगते हैं। प्रेम में भी यही है प्रेम जब तक दूर है अच्छा लगता है और जब मिलता है तो कमियां निकलने लगती हैं। हमेशा जो नहीं मिल रहा है, उस पर नजर रखें। इससे 80 प्रतिशत दुख खत्म हो जाएंगे।
सुश्री जयाकिशोरीजी ने कहा कि विश्वामित्रजी जब यज्ञ कर रहे थे, तो कई विघ्न आये। व्यक्ति भी जब अच्छा कार्य करने की कोशिश करें तो जीवन में राक्षस रूपी लोग आकर कार्य को खराब करेंगे। मंगल कार्य शांति से हो, ऐसा नहीं हो सकता है। जीवन में राक्षस कौन है इसका पता करना है तो मंगल कार्य करें। जो अड़ंगा लगाया, वही है राक्षस। विश्वामित्र ने यज्ञ आरंभ किया तो वन के दैत्य यज्ञ पूर्ण नहीं होने दे रहे थे। कोई भी कार्य प्रभु की कृपा के बगैर नहीं होता है। इसलिए विश्वामित्रजी राजा दशरथ के पास गये। ज्ञान भगवान की आत्मा है और भक्ति खुद परमात्मा है। ज्ञानी को अहंकार हो सकता है पर भक्त को अहंकार नहीं होता है। भक्ति का अहंकार हो रहा है तो भक्ति सच्ची नहीं है।
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