महाकुंभ 2025 ने भारत को चौथी अर्थव्यवस्था बनाया

भारत का सनातन अर्थशास्त्र चरित्र और इसकी उत्सवधर्मिता केवल आस्था ही नहीं, आर्थिक शक्ति भी है और महाकुंभ 2025 ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि भारत की सनातन परंपराएं केवल संस्कृति नहीं, आर्थिक विकास की मूक ताकत हैं। अगर देश उत्सव आधारित आर्थिक योजना बनाकर उन्हें और व्यापक बनाता है तो भारत जल्द ही विकसित राष्ट्र बन सकता है।

भारत ने एक ऐतिहासिक छलांग लगाते हुए जापान को पीछे छोड़कर विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा प्राप्त किया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत की जीडीपी अब 4.19 ट्रिलियन तक पहुँच चुकी है। यह उपलब्धि कई वर्षों की नीति, प्रयास और विशेषत महाकुंभ 2025 जैसे असाधारण आयोजनों का परिणाम है। भारत को चौथी अर्थव्यवस्था तक पहुंचाने में कुंभ ने मारा है निर्णायक छक्का।

भारत और जापान के बीच चौथे स्थान की होड़ पिछले दो वर्षों से जारी थी। लेकिन वर्ष 2025 में प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ ने वह आर्थिक छक्का मारा जिसने भारत को जापान से ऊपर कर दिया। इस आयोजन में अनुमानित 4 लाख करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष और परोक्ष व्यय हुआ जिसने हर सेक्टर खुदरा, परिवहन, हॉस्पिटैलिटी, स्वास्थ्य, डिजिटल सेवाओं, एमएसएमई, एफएमसीजी आदि में खपत और मांग को तेज कर दिया।

इसने भारतीय अर्थव्यवस्था में उसी तरह ऊर्जा भरी जैसे युद्धकाल में किसी देश की अर्थव्यवस्था को युद्धकालीन उत्पादन उठाता है। परिणामस्वरूप, वित्त वर्ष 2024-25 की जीडीपी अपेक्षा से लगभग 1 प्रतिशत अधिक रही और आईएमएफ को अपने अनुमान संशोधित करने पड़े। अगर यह आयोजन न हुआ होता तो शायद भारत कुछ अंकों से पीछे रह जाता और हम अभी भी पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होते।

कुंभ 2025 ने अर्थव्यवस्था में तात्कालिक माँग का इंजेक्शन भर मंदी की आशंका से भारत को दूर रखा। करोड़ों श्रद्धालुओं के आने-जाने, रहने, खाने, खरीदारी, चिकित्सा और डिजिटल लेन-देन से अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर एक जबरदस्त मांग-आधारित बूस्ट मिला। अस्थायी नहीं, संरचनात्मक विकास हुआ। कुंभ की तैयारियों के अंतर्गत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जो इंफ्रास्ट्रक्चर विकास (सड़कों, पुलों, डिजिटल कनेक्टिविटी, गंगा सफाई, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स) किया गया, वह आयोजन के बाद भी देश को लाभ देता रहेगा।

सनातन संस्कृति और सुशासन से आर्थिक उत्कर्ष

सनातन अर्थशास्त्र की बेहतर समझ और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व ने इस सूत्र की नब्ज पकड़ी और आस्था और अर्थव्यवस्था का संगम कराया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस दूरदृष्टि, सुशासन और व्यवस्थापन के साथ महाकुंभ का आयोजन कराया, उसने भारत ही नहीं, विश्व को दिखाया कि धार्मिक आस्था और आर्थिक उन्नति एक साथ कैसे चल सकते हैं। दुनिया ने सनातन अर्थशास्त्र के रूप में सनातन संस्कृति की अर्थशास्त्राय शक्ति को देखा। कुंभ जैसे आयोजन भारत की उत्सवधर्मी संस्कृति का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

ऐसे आयोजन उपभोग आधारित माँग उत्पन्न करते हैं और अर्थव्यवस्था को सतत गति में बनाए रखते हैं। भारत की चोटी की इस चढ़ाई में महाकुंभ के साथ साथ मुख्य और तीन स्तंभ हैं. पहला स्तम्भ भारत सरकार की नीति और नेतृत्व। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, यूपीआई, जीएसटी, इंफ्रास्ट्रक्चर पुश (पीएम गतिशक्ति, भारतमाला, सागरमाला, उड़ान योजना) ने भारत की उत्पादकता और व्यापार में नई जान फूंकी।

अब भारत में बेचने के लिए निर्यात नहीं करना था उसे भारत में ही बनाना था जिससे आयात बिल और विदेशी मुद्रा खर्च में बचत तो हुई ही घरेलू उत्पादन बढ़ गया। इंफ्रास्ट्रक्चर पुश ने वैसा ही काम किया जैसे शरीर को खड़ा करने के लिए एक ढांचे की और रक्त को पहुंचाने के लिए रक्त धमनियां करती हैं। जैसे अगर यह दोनों रहेंगे तो ही शरीर रहेगा वैसा ही देश को खड़ा करने के लिए बुनियादी ढांचे और रक्त धमनी रूपी सप्लाई चेन की जरुरत होती है।

इंफ्रा, युवा शक्ति और विकास दर की त्रिमूर्ति

मोदी सरकार ने दोनों मोर्चो पर काम किया। पीएम गतिशक्ति ने देश की गति को शक्ति दी, एयरवेज, हाइवेज, वाटरवेज, कार्गो इंफ्रा में भारतमाला सागरमाला उड़ान योजना पर मोदी सरकार ने खूब काम किया, वहीं नितिन गडकरी ने अपने विज़न और अनुभव से बुनियादी ढांचे के निर्माण में एक बड़ी लकीर खींच कर इंफ्रा में क्रांति लाया। इन कामों से संसाधनों निवेश एवं अवसर का समान रूप से वितरण देश में संभव हो पाया।

दूसरा स्तंभ भारत की बड़ी आबादी जो अफ्रीकन देशों की तरह दायित्व ना होकर सम्पत्ति है। ऐसी आबादी रुपी संपत्ति दुनिया के किसी देश के पास नहीं है चीन को छोड़कर। आज भारत की युवा आबादी उत्पादन, उपभोग और नवाचार की धुरी बन चुकी है। आयुष्मान भारत, स्किल इंडिया और पीएम विश्वकर्मा जैसी योजनाओं ने इसे और सक्षम किया है। ऊपर से भारत की इस आबादी और इसमें रचे बने इकॉनमी का मूल चरित्र उत्सवधर्मी है और तमाम पर्व, त्यौहार, उत्सव शादी ब्याह के आयोजन इकॉनमी में एक उत्प्रेरक के रूप में काम करते हैं और देश को हमेशा ही मंदी की आशंका से बाहर निकाल देते हैं।

इन आयोजनों से बाजार में मांग हमेशा बनी रहती है और समाज और इकॉनमी ठहरती नहीं गतिशील रहती है। तीसरा स्तंभ है भारत की विकास दर। भारत की विकास दर अपने विकास के प्रतिद्वंदी देशों से कहीं आगे है। मुद्रा कोष आंकड़ों के अनुसार निकटतम प्रतिद्वंदी चीन ही काफी पीछे चार की विकास दर लिए हुआ है। तीसरी इकॉनमी वाले जर्मनी की विकास दर तो नगण्य है, अमेरिका की 1.8, जापान की 0.6 तो यूनाइटेड किंगडम की 1.1 है।

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स्वदेशी और नवाचार से बनेगी तीसरी अर्थव्यवस्था

ये दूर-दूर तक भारत को टक्कर देने की स्थिति में नहीं है। उपरोक्त आर्थिक ढांचे और उत्पादकीय आबादी और देश के सनातन अर्थशास्त्र चरित्र के साथ अगर विकास दर का गुणक मिल रहा है तो उस देश को ऊंची छलांग लगाने से कोई नहीं रोक सकता। भारत का अगला लक्ष्य अब तीसरे स्थान की ओर बढ़ना है। अब भारत से आगे केवल तीन देश हैं जर्मनी, चीन और अमेरिका।

जर्मनी को पार करना संभव है, क्योंकि वहाँ की जनसंख्या, खपत और विकास दर तीनों ही भारत से कम हैं लेकिन चीन और अमेरिका को पीछे छोड़ने के लिए दो रणनीतिक प्रयास आवश्यक हैं। इसके लिए स्वदेशी को राष्ट्रीय आंदोलन बनाना पड़ेगा। सरकार डब्ल्यूटीओ नियमों के कारण स्वदेशी को प्रोत्साहित नहीं कर सकती लेकिन यदि नागरिक स्वेच्छा से चीनी और अमेरिकी उत्पादों की जगह भारतीय उत्पाद अपनाएँ तो इसका जीडीपी पर जबरदस्त असर पड़ेगा।

-पंकज जायसवाल

दूसरा रणनीतिक प्रयास रिसर्च और पेटेंट पर ध्यान है। भारत को अपनी कंपनियों को नवाचार आधारित बनाना होगा ताकि वे ग्लोबल प्रीमियम चार्ज कर सकें। ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था ही भारत को अमेरिका के बराबर ला सकती है। इस विमर्श का निष्कर्ष यही है कि भारत का सनातन अर्थशास्त्र चरित्र और इसकी उत्सवधर्मिता केवल आस्था ही नहीं, आर्थिक शक्ति भी है और महाकुंभ 2025 ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि भारत की सनातन परंपराएं केवल संस्कृति नहीं, आर्थिक विकास की मूक ताकत हैं। अगर देश उत्सव आधारित आर्थिक योजना बनाकर उन्हें और व्यापक बनाता है तो भारत जल्द ही विकसित राष्ट्र बन सकता है।

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