मणिपुर : एक कदम शांति की ओर

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मणिपुर में लोगों की स्वतंत्र और सुरक्षित आवाजाही बहाल करने के लिए स्पष्ट निर्देश दिए हैं। इससे सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि लंबे समय से चले आ रहे संकट के बीच से राज्य ऐसे अहम मोड़ पर आ गया है जहाँ से संभावित शांति की ओर जाने वाली एक राह निकल सकती है।

गौरतलब है कि 3 मई, 2023 को मैतेई और कुकी समुदायों के बीच छिड़े हिंसक संघर्ष के करीब-करीब 2 साल बाद, अवैध नाकेबंदी हटाने, निर्बाध परिवहन सुनिश्चित करने और आम नागरिकों की सुरक्षित आवाजाही की गारंटी देने की यह पहल केवल प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी सतही तौर पर देखें तो यह मणिपुर में सामान्य स्थिति बहाल करने की कोशिश का प्रतीक लग सकता है।

मणिपुर में स्थिरता की ओर केंद्र सरकार की पहल

ऐसी स्थिति जहाँ लोग बिना डर के काम पर, स्कूलों में और बाजारों में आ-जा सकें। पिछले 2 सालों में मणिपुर एक ऐसा राज्य बनकर रह गया है जहाँ हाईवे समुदाय-आधारित गुटों द्वारा अवरुद्ध कर दिए जाते हैं तथा घाटी और पहाड़ियों के बीच यात्रा जोखिम भरी हो गई है। ऐसे में वहाँ निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करना छोटा लक्ष्य नहीं है।

यह केवल आवागमन की सुविधा मुहैया कराना भर नहीं, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक खाई को पाटने की कोशिश है जो हिंसा और अविश्वास के चलते राज्य के निवासी समुदायों के बीच गहरी हो गई है।दरअसल, इस कदम का उद्देश्य दोहरा है। पहला, केंद्र में मोदी 3.0 के विधिवत स्थापित हो जाने के बाद अब केंद्र सरकार मणिपुर में स्थिरता का संदेश देना चाहती है।

कहना न होगा कि जब तक अराजकता की जगह सामान्य जीवन नहीं लौटेगा, तब तक सरकार के प्रति लोगों का भरोसा मजबूत नहीं होगा। दूसरा, यह पहल उन सशस्त्र समूहों और कट्टरपंथी संगठनों के प्रभाव को कम करने का प्रयास भी है, जिन्होंने राज्य के अलग-अलग इलाकों पर कब्ज़ा कर रखा है। हाल ही में अराबाई टेंगगोल जैसे मैतेई संगठनों द्वारा हथियार लौटाने और अवैध बंकरों को नष्ट करने जैसे कदम इस दिशा में शुरूआती विश्वास बहाली के संकेत हैं।

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क्या शांति प्रक्रिया सभी समुदायों के लिए निष्पक्ष है?

बेशक, सरकार की इस पहल के नतीजे बहुत संवेदनशील हो सकते हैं। नस्ली समूहों की हथियार डालने की घोषणाएँ दीर्घकालिक शांति के बजाय तात्कालिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकती हैं। वहीं, कुकी समुदाय की सुरक्षा, स्वायत्तता और न्याय की माँग अभी सुलझी नहीं हैं।

डर है कि अगर आवाजाही बहाली केवल प्रतीकात्मक कदम बनकर रह गई और गहरे मुद्दों को नज़रअंदाज किया गया, तो इससे असंतोष और बढ़ेगा ही। यह भी गैरतलब है कि गृह मंत्री की इस पहल को कुछ मैतेई संगठनों का समर्थन मिला है, जो उम्मीद और चिंता दोनों का कारण है।

घाटी में प्रशासनिक अमल आसान हो सकता है, लेकिन इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या शांति प्रािढया निष्पक्ष और संतुलित है? मणिपुर में स्थायी समाधान केवल घाटी तक सीमित न होकर, पहाड़ी क्षेत्रों में कुकी समुदाय की भागीदारी और सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना संभव नहीं है।

संतुलन और विश्वास बहाली की दिशा में अगला कदम

फिर भी, हालिया घटपाम एक अवसर का संकेत देते हैं। यदि आवाजाही बहाली केवल यातायात नियंत्रण की क़वायद न होकर, वास्तव में बिखरी हुई सामाजिक एकता को जोड़ने की प्रािढया बने, तो इससे दीर्घकालिक राजनीतिक संवाद का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

केंद्र सरकार को अब सावधानीपूर्वक संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा। कानून व्यवस्था के साथ-साथ सामुदायिक मेलजोल और विश्वास कायम करने पर भी पूरा ध्यान देना होगा। कुल मिलाकर, मणिपुर आज एक अहम मोड़ पर खड़ा है।

गृह मंत्री का निर्देश एक रास्ता दिखाता है, लेकिन सफलता तभी मिलेगी जब यह सभी समुदायों की आशंकाओं, अधिकारों और आकांक्षाओं को शामिल करते हुए आगे बढ़े। केवल आवाजाही ही शांति नहीं है, लेकिन इसके बिना शांति संभव भी नहीं है!

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