अंतरिक्ष में तैरते हैं कचरे के पहाड़!

हाल ही में भूस्थिर कक्षा में इंटेलसैट 33ई उपग्रह के टूटने से अंतरिक्ष मलबे के बढ़ते खतरे के बारे में चर्चा फिर से शुरू हो गई है। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने एक बार फिर याद दिलाया है कि उपग्रह-कचरे के प्रबंधन की बेहतर रणनीतियाँ बनाने और लागू के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की तत्काल ज़रूरत अपरिहार्य है।
ग़ौरतलब है कि यह संचार उपग्रह 19 अक्टूबर, 2024 को अचानक बम की तरह फूट गया। टुकड़े-टुकड़े होकर उसका मलबा अंतरिक्ष में बिखर गया। आम तौर से एक संचार उपग्रह की उम्र 15-20 वर्ष मानी जाती है, लेकिन यह केवल 7 वर्ष में ही ध्वस्त हो गया! समझा जाता है कि विस्फोट के फलस्वरूप इसके कम से कम 500 मलबे के टुकड़े अंतरिक्ष में बिखर गए, जिनके वहाँ तैरते अनेक उपग्रहों में से किसी से भी टकरा जाने के बारे में कोई भी पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता। यानी, यह घटना अंतरिक्ष समुदाय के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। ऐसे युग में, जहाँ उपग्रह इंटरनेट सेवाओं से लेकर मौसम की भविष्यवाणी तक हर चीज़ के लिए महत्वपूर्ण हैं, अंतरिक्ष में तैरते कचरे के ये पहाड़ न केवल परिचालन उपग्रहों के लिए बल्कि मानव मिशन और अंतरिक्ष अन्वेषण प्रयासों के लिए भी बेहद खतरनाक हो सकते हैं।
वैसे, अंतरिक्ष मलबे का मुद्दा बिल्कुल भी नया नहीं है। सयानों की मानें तो, वर्तमान में 4,300 टन से अधिक मलबा पृथ्वी की परामा कर रहा है, जिसमें निपिय उपग्रह, खर्च किए गए रॉकेट चरण और पिछले टकरावों के टुकड़े शामिल हैं। अंतरिक्ष मलबे की बढ़ती आबादी टकराव की संभावना को बढ़ाती है। ऐसे किसी भी टकराव से और भी अधिक मलबा पैदा होता है। इंटेलसैट 33ई का टूटना इस पा का उदाहरण है, क्योंकि इसके अवशेष अब भूस्थिर कक्षा में अन्य परिचालन उपग्रहों के लिए खतरा बन रहे हैं, जहाँ सीमित स्थान उपलब्ध होने के कारण टकराव का जोखिम पहले से ही अधिक है।
अंतरिक्ष की विशालता को देखते हुए दो वस्तुओं के टकराने की संभावना भले ही कम लगती हो, लेकिन जैसे-जैसे अधिक उपग्रह लॉन्च होते हैं, टकराव की संभावना बढ़ती जाती है। ध्यान रहे कि उपग्रहों पर उनके मालिकों का नियंत्रण होता है, लेकिन मलबे का न तो कोई मालिक होता है और न ही नियंत्रक। मानो कि अंतरिक्ष में बहुत सारे पागल कुत्ते, हाथी और घोड़े तैर रहे हों! इन्हें साधने के लिए जल्दी से कोई कारगर उपाय न किया गया, तो जाने कब धू-धू कर सुलगते उल्का पिंड धरती पर बरसने लगें!
तकनीकी दृष्टिकोण से, उपग्रह संचालकों पर ऐसे विस्फोटों का प्रभाव तत्काल पड़ता है। मलबे का बादल परिचालन उपग्रहों में बाधा उत्पन्न कर सकता है, जिससे टकराव से बचने की पैंतरेबाज़ी बेहद मुश्किल होती है। वैसे भी, मलबे के प्रक्षेप पथ को ट्रैक करना और उसके बारे में सटीक भविष्यवाणी करना बेहद जटिल कार्य है। यह जटिलता परिचालन लागत को बढ़ाती है और उपग्रह प्रौद्योगिकी पर निर्भर कंपनियों के लिए रसद संबंधी चुनौतियाँ भी खड़ी करती है।
सरकारों और अंतरिक्ष एजेंसियों को यह समझना चाहिए कि अंतरिक्ष मलबे की समस्या एक सामूहिक चुनौती है, जो राष्ट्रीय सीमाओं से परे है। इस दिशा में ऐसे बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौतों की तत्काल आवश्यकता है, जिनमें न केवल नए मलबे के निर्माण को सीमित करने बल्कि निपिय उपग्रहों को कक्षा से बाहर निकालने के लिए भी प्रोटोकॉल स्थापित किया जाए।
अंतत, इस समस्या का एक संभावित समाधान यह भी है कि ऐसे कचरे/मलबे को तुरत-फुरत हटाने की व्यवस्था की जाए। इसमें अंतरिक्ष मलबे को पकड़ने और सुरक्षित रूप से कक्षा से बाहर निकालने के लिए रोबोटिक आर्म्स या जाल का उपयोग करना शामिल हो सकता है। क्लियरस्पेस और एस्ट्रोस्केल जैसी कंपनियाँ पहले से ही ऐसी परियोजनाओं पर काम कर रही हैं, लेकिन अभी इन विचारों को वास्तविकता में बदलने के लिए पर्याप्त निवेश और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की अविलंब ज़रूरत है। कहीं देर न हो जाए!
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