श्रीकृष्ण के रथों और घोड़ों के नाम

द्वापर युग भगवान श्रीकृष्ण का माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण जगत के पालनहार श्रीहरि विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं। द्वापर युग के अंत में पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध श्रीकृष्ण की ही लीला मानी जाती है, जो उन्होंने धरती पर पुन: धर्म की स्थापना करने के लिए रची थी। महाभारत का ये धर्म युद्ध कुरुक्षेत्र की भूमि पर 18 दिनों तक लड़ा गया था, जिसमें असंख्य वीर यौद्धा वीरगति को प्राप्त हुए थे।

इस धर्म युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण पांडवों के साथ थे, क्योंकि धर्म पांडवों के साथ था। कुरुक्षेत्र के महायुद्ध से पहले अर्जुन ने श्रीकृष्ण से उनका साथ मांगा था। इस युद्ध में एक तरफ श्रीकृष्ण की नारायणी सेना थी तो दूसरी तरफ श्रीकृष्ण थे, वो भी निहत्थे। श्रीकृष्ण इस युद्ध में अर्जुन के सारथी बने। यहां श्रीकृष्ण के रथ और उनके घोड़ों के बारे में जानकारी दी जा रही है।

श्रीमद्भागवत के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के पास दो रथ थे, जो दैवीय शक्ति से युक्त थे। उनके एक रथ का नाम गरुड़ध्वज और दूसरा जैत्र था। जैत्र नामक भगवान का एक सेवक था। गरुड़ध्वज रथ में तीन अश्व लगाए जाते थे तो जैत्र रथ में चार। गरुड़ध्वज रथ के अश्वों के नाम निम्न थे- शैव्य, सुग्रीव, मेघ, पुष्प। इस रथ के सारथी दारुक थे।

गरुड़ध्वज वही रथ है, जिस पर भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया था। बताया जाता है कि इस रथ को रोक पाना किसी के लिये भी संभव नहीं था। इस रथ के तीनों अश्व आंधी के समान तेज दौड़ते थे। रुक्मिणी हरण के समय ये रथ क्षणभर में अदृश्य हो गया था। जैत्र रथ को विजयी रथ माना जाता था। इस रथ के चारों घोड़ों का नाम- शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक। इसे विश्वकर्मा ने बनाया था।

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