तमिलनाडु में राष्ट्रगान विवाद!

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और राज्यपाल आर.एन. रवि के बीच राष्ट्रगान को लेकर हालिया टकराव केवल औपचारिक प्रक्रियाओं का मुद्दा नहीं है। यह भारत में संघीयता और संवैधानिक मर्यादा के मूलभूत सिद्धांतों को भी छूता है।
ग़ौरतलब है कि 7 जनवरी, 2025 को तमिलनाडु विधानसभा के उद्घाटन सत्र के दौरान, राज्यपाल आर.एन. रवि ने अचानक सभा छोड़ दी। उन्हें सत्र के आरंभ में राष्ट्रगान न बजाए जाने पर आपत्ति थी क्योंकि यह प्रोटोकॉल का उल्लंघन था। तथ्य यह भी है कि परंपरागत रूप से, तमिलनाडु विधानसभा राज्य के आधिकारिक गीत से शुरू होती है और अंत में राष्ट्रगान बजता है। इसे बदलने की राज्यपाल की माँग को सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) सरकार ने हस्तक्षेप के रूप में देखा। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने राज्यपाल के इस कदम को बचकाना कहा, जिसके बाद राजभवन ने स्टालिन की टिप्पणी को अहंकारी और संविधान के प्रति असम्मानजनक करार दिया।
सयाने ध्यान दिला रहे हैं कि यह कोई पहला विवाद नहीं है। तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच ऐसी खींचतान कई साल से चलती आई है। अक्टूबर 2024 में, द्रविड़ शब्द को लेकर बवाल उठा था। तब द्रमुक ने आरोप लगाया था कि राज्यपाल द्रविड़ीय पहचान को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।
कहना न होगा कि राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच बार-बार होने वाले ऐसे विवाद संघीय ढाँचे में राज्यपाल की भूमिका पर महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं। माना कि राज्यपाल का पद संवैधानिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन आदर्श स्थिति यह मानी जाती है कि राज्यपाल को राजनीतिक रूप से तटस्थ और सहयोगी होना चाहिए। इसकी अनुपस्थिति में राज्य के संवैधानिक तंत्र का सुचारु संचालन संभव नहीं। राज्यपाल का कार्यालय ही यदि राजनीतिक विवाद का केंद्र बन जाए, तो शासन बाधित तो होगा ही न! इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं में सार्वजनिक विश्वास के कमजोर होने का खतरा पैदा हो सकता है।
बेशक, राष्ट्रगान और राज्यगान के क्रम जैसे प्रक्रियात्मक बदलावों पर ज़ोर देना मामूली लग सकता है, लेकिन इसका प्रतीकात्मक महत्व है। ख़ासकर तमिलनाडु जैसे राज्य में, जहाँ क्षेत्रीय पहचान के प्रति आग्रह कुछ ज़्यादा ही मजबूत है! द्रमुक की द्रविड़ीय विचारधारा राज्य की स्वायत्तता और सांस्कृतिक गर्व को महत्व देती है। बहुत बार तो उसकी राजनीति केंद्र सरकार के किसी भी कथित हस्तक्षेप के विरोध पर ही चलती प्रतीत होती है! इसलिए, वहाँ राज्यपाल के कार्यों को केवल प्रोटोकॉल लागू करने के प्रयास के रूप में नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक और राजनीतिक स्वायत्तता के लिए चुनौती के रूप में बढ़ा-चढ़ाकर देखा-दिखाया जाता है।
इस प्रवृत्ति के मद्देनजर, राज्य सरकार और राज्यपाल के कार्यालय, दोनों से संयम की उम्मीद की जाती है। बेशक, संवैधानिक प्रावधानों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए, ताकि औपचारिक भूमिकाओं का राजनीतिकरण न हो। मतभेदों को तनाव बढ़ाए बिना हल करने के लिए संवाद और आपसी सम्मान के दरवाज़े खुले रखने ज़रूरी हैं। केंद्र सरकार की भी यह ज़िम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि राज्यपालों की नियुक्तियाँ राज्य की राजनीति में टकराव का स्रोत न बनें।
भला यह कैसे भुलाया जा सकता है कि राष्ट्रगान देश भर में सम्मानित है। वह एकता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। उसे किसी राजनीतिक लाभ के लिए विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। राष्ट्रगान और राज्यगान के बीच टकराव जैसी अप्रिय स्थिति पैदा न हो, क्या राज्य सरकार को इसका ध्यान नहीं रखना चाहिए? विविध सांस्कृतिक पहचानों के बीच समावेशिता और आपसी सम्मान ही तो आखिर भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना है न!
अंतत यह और कि तमिलनाडु में राष्ट्रगान-विवाद राज्य और केंद्र के बीच शक्ति संतुलन, संवैधानिक अधिकारियों की भूमिका और भारतीय संघ में क्षेत्रीय पहचान के सम्मान से जुड़े गहरे मुद्दों का प्रतीक है। इसके समाधान के लिए ज़िद नहीं, सद्बुद्धि की ज़्यादा ज़रूरत है!
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