नई कृषि नीति की ज़रूरत!

किसानों को बताना होगा कि जलवायु परिवर्तन क्या है और इसके खतरे और मायने उनके लिये क्या हैं? उन्हें क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर की ओर क्यों बढ़ना चाहिये। अधिक उत्पादन पाने, टिकाऊ खेती अपनाने, कम पानी वाली फसलों का व्यवहार वगैरह सिखाने के साथ क्षेत्रानुसार पोषक प्रबंधन करना होगा। सरकार बहुत कुछ कर रही है पर जमीन से जुड़े इस मामले से निबटने के लिये उसे जमीन पर उतरना होगा। एजेंसियों को किसानों को साथ लेना होगा।

बढ़ती गर्मी और उसके चलते जलवायु परिवर्तन के प्रकोप जिस कदर खेती किसानी पर असर डाल रहे हैं, कृषि योग्य जमीन बर्बाद हो रही है, फसलों का पैटर्न बदल रहा है, उत्पादन घट रहा है, उससे इस बात को बल मिलता है कि देश को अब एक ऐसी नई समग्र कृषि नीति की महती आवश्यकता है, जो इस आसन्न खतरे के निदानों पर केंद्रित हो।

जलवायु संकट से कृषि और आजीविका पर बड़ा खतरा

देश का 87 फीसदी हिस्सा भीषण गर्मी और लू से प्रभावित है। तन-मन को झुलसाता तापमान हमारे खेत, खलिहान को भी झुलसा रहा है। बढ़ता तापमान, उससे प्रसूत जलवायु परिवर्तन तथा उसकी पर्यावरणीय विद्रूपताएं वैश्विक हैं और इसके चलते सबकी खेती किसानी चौपट होने का अंदेशा है। 2050 तक दुनिया की आबादी 10 अरब होगी तो अनाजों की मांग बेतरह बढ़ेगी और उनकी खेती भी।

लेकिन तापमान की बढ़ोतरी से फसलों के प्रभावित होने के चलते इतनी आबादी का पेट भरना कठिन होगा। इसे लेकर हमको अपने बारे में बाकी दुनिया के मुकाबले कुछ ज्यादा ही चिंतित होने की जरूरत है। सच यही है कि सत्वर बढ़ती अर्थव्यवस्था के बावजूद अभी भी हम औद्योगिक नहीं कृषि प्रधान देश हैं। हमारे 60 फीसदी से अधिक लोगों की आजीविका कृषि पर आधारित है।

बहुतायत लोग पशुपालन, फलों और फूलों की खेती इत्यादि पर निर्भर हैं और इन सबको तापमान की बढ़ोतरी से खतरा है। आकलन कहता है कि 2039 तक जलवायु परिवर्तन के खतरों के चलते देश में कृषि उत्पादन लगभग 17 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। जब ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स भारत को जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित दस शीर्ष देशों में रखता है तो यह तथ्य और चिंतनीय हो जाता है।

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बढ़ती गर्मी से खाद्य सुरक्षा और राजनीति पर संकट

देश में रबी की फसल का रकबा पिछली साल की तुलना में तकरीबन चार लाख हेक्टेयर बढ गया है, अनुमान के अनुसार उम्मीद की जा रही है कि तिलहन छोड़ दलहन और गेहूं इत्यादि का उत्पादन पहले से ज्यादा होगा। पर यह बढ़त रकबे की बढ़त के अनुरूप नहीं है। जाहिर है, किसान जितना श्रम और लागत लगायेगा, उसे उसका प्रतिफल उतना नहीं मिलेगा। आगे यह संकट और गहरायेगा।

अगर 27 लाख की सब्सिडी पाने वाले अमेरिकी किसानों का गेहूं देश में आया तो मात्र 45 हजार तक अनुदान पाने वाले भारतीय किसानों का गेंहू मूल्य के मामले में नहीं टिक पायेगा, हालांकि ये बाज़ार की बात है, लेकिन इसमें भी किसान और किसानी शामिल ही है। खैर, घटते उत्पादन के बीच पेट भरने के लिए हमको दूसरों से ज्यादा खाद्यान्न चाहिये; क्योंकि डेढ अरब पहुंचती हमारी आबादी दूसरों के मुकाबले कहीं ज्यादा है।

विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की तरफ बढने और उसके तीव्र विकास के अलावा आर्थिक उन्नति के बहुतेरे दावों के बावजूद जमीनी सच यही है कि देश की अधिकांश आबादी जिसमें सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले अमीर राज्य के निवासी भी शामिल हैं, सरकार द्वारा बांटे गये सस्ते या मुफ्त खाद्यान्न पर निर्भर हैं। अपना दाना न रहा तो हम यह कैसे बांट पाएंगे।

इसका असर राजनीति पर भी प्रतिकूल पड़ेगा। बेशक खाद्यान्न वितरण के मामले में हम आत्मनिर्भर हैं पर जलवायु विज्ञानी कहते हैं कि तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाए तो गेहूं का उत्पादन 17 प्रतिशत तक कम और धान की बारी आने पर 2 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने का मतलब है उसके उत्पादन में तकरीबन एक टन प्रति हेक्टेयर की कमी होना। मतलब बढ़ती गर्मी आजीविका और खाद्य सुरक्षा दोनों को खतरे में डालने वाली है, साथ ही मुफ्त खाद्यानों के लाभार्थियों वाली राजनीति को भी।

जलवायु के प्रभावों से निपटने को समग्र कृषि नीति

मौसम में बदलाव, गर्मी के दिन ज्यादा और सर्दी के दिन कम कर रहा है, जिससे पूरा फसल चक्र गड़बड़ा जा रहा है। किसान पुराने ढर्रे पर चलकर बुआई, कटाई कर नुकसान उठा रहे हैं और नए को अपना नहीं पा रहे। अनिश्चितता और असमंजस की इस नई स्थिति में उनका पुराना अनुभव काम नहीं आ रहा और कभी उन्हें मात्रा के तौरपर बेहतर उपज नहीं मिल रही तो कभी दाने पुष्ट नहीं, कमजोर, गुणवत्ता हीन पैदावार।

भले सरकार अपनी खरीद के मूल्य बढ़ा दे पर ऐसी आफत में किसान की आमदनी दोगुना तो होने से रही। तीव्र तापमान से प्रदूषण, भू-क्षरण, जमीन की नमी कम होने और सूखा पड़ने के कारण फसलों की ही नहीं जमीन की गुणवत्ता भी गिरती है। भीषण तापमान, तिस पर बेहद कम वर्षा तथा जल स्रोतों, जलाशयों, का तेजी से सिकुड़ना। ऐसे में जहां दो तिहाई कृषि क्षेत्र खेती के लिये वर्षा जल पर निर्भर हों, फसलों की परंपरागत सिंचाई में भारी बाधा पैदा होगी।

गर्मी खेतों में कीट-पतंगों की प्रजनन क्षमता बढ़ाकर उनका प्रकोप लाएगा तो अधिक कीटनाशी के इस्तेमाल से मुसीबतें पैदा होंगी। यह कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता को तापमान प्रभावित करेगा। गेंहू, सरसों, जौ और आलू ,मक्का, ज्वार और धान ही नहीं चाय, सेब जैसे कई फलों का उत्पादन भी घटेगा। दूसरे तमाम देशों ने अपनी परिस्थिति और प्राथमिकता के अनुरूप उपाय आरंभ कर दिये हैं, अपना देश भी 2008 से ही इस मामले में कई सरकारी योजनाएं क्रियान्वित कर रहा है।

जलवायु संकट से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी

तब अनुकूलन पर आधारित राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन शुरू किया गया था। निस्संदेह मौजूदा सरकार भी इस ओर ध्यान दे रही है, क्योंकि उसकी प्राथमिकता में किसान सदैव ऊपर रहे हैं लेकिन फिलहाल अभी भी इस ओर किए जाने वाले सभी प्रयास फुटकर योजनाओं तक सीमित हैं जबकि कृषि प्रधान देश होने के नाते हमें तत्काल कुछ नए उपाय करने होंगे।

इन उपायों के लिये एक सुविचारित नीति की आवश्यकता है बल्कि एक नई समग्र कृषि नीति की, जो जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी, उसके दुप्रभावों और आसन्न खतरों एवं उसके निदानों को केंद्र में रखकर बनी हो।

सरकार को वाटर शेड प्रबंधन के माध्यम से वर्षा जल का प्रबंधन और माइाढा इरीगेशन का कार्पाम जिसमें जल के साथ जमीन का भी संरक्षण शामिल हो, कैसे जोर पकड़े इसे अपनी देख-रेख में पंचायत स्तर पर चलवाना चाहिये। जैविक और मिश्रित खेती को बढ़ावा देने से कीटनाशी का इस्तेमाल कम होगा तो मृदा की उत्पादकता क्षरण रोकने तथा रासायनिक खादों का इस्तेमाल घटाने में मदद मिलेगी। हमें फसलों के पैटर्न तथा बुवाई के समय में भी क्षेत्रवार बदलाव लाना होगा।

जलवायु संकट सबकी साझी चिंता और जिम्मेदारी

बीजों की ऐसी किस्मों का विकास करना होगा जो अधिक तापमान, सूखे तथा बाढ़ जैसी संकटमय परिस्थितियों के लिये सहनशील हों। पारंपरिक ज्ञान तथा नई तकनीकों के समन्वयन और समावेशन द्वारा इंटरॉपिंग करने के गुर सहित किसानों को जलवायु अनुकूलन तकनीकों को अपनाने के लिए भी जागरूक करना होगा।

जिनका वास्ता सीधे कृषि से नहीं है अथवा जिनकी आजीविका का स्रोत कृषि या उससे संबद्ध क्षेत्र नहीं है वे यह सोच सकते हैं कि वे किसान नहीं हैं न अनाज के आढती, व्यापारी सो वे इस खतरे से दूर हैं पर महंगाई और किल्लत तथा गुणवत्ताहीन खाद्य पदार्थों एवं बेस्वाद फलों के जरिये वे भी इससे परोक्षत प्रभावित होंगे।

बढता तापमान जलवायु परिवर्तन का जनक है, जो मानव जीवन को हर तरह से कष्टकारी बनाने वाली पर्यावरणीय स्थितियों का निर्माण कर रहा है। इसलिये यह सरकार के साथ-साथ सारी जनता की साझी चिंता होनी चाहिये क्योंकि अब जलवायु परिवर्तनशीलता मात्र आंकड़ों की बातें या सैद्धांतिक बहसों का विषय न रहकर सामने दिखने वाली वास्तविकता बन चुकी है।

संजय श्रीवास्तव

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