नेमीचंद्रसागरजी एवं नमीचंद्रसागरजी ने अद्भुत कला से किया आश्चर्यचकित
हैदराबाद, जैन इंटरनेशनल विद्यापीठ (जीआईवी) द्वारा युवाओं को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से नगर में पहली बार आयोजित महशतावधान में जुड़वा महात्मा नेमीचंद्रसागरजी एवं नमीचंद्रसागरजी ने अद्भुत कला से सभी को आश्चर्यचकित किया। महाराज ने 200 प्रश्नों को सीधे और उल्टे क्रम में व रैंडम बताकर तथा बिना देखे बोर्ड पर लिखे वाक्य को केवल नाद संगीत से सुनकर बताया।

















आरटीसी चौराहा स्थित टीएसआरटीसी कल्याण मंडपम् में अभिनंदनचंद्रसागरजी म.सा. की निश्रा में जैन इंटरनेशनल विद्यापीठ हैदराबाद-सिकंदराबाद द्वारा आयोजित महाशतावधान कार्यक्रम में नेमीचंद्रसागरजी एवं नमीचंद्रसागरजी ने 1 से 200 तक सुवाक्य-कहावत, सर्वतोभद्र यंत्र, देशों के नाम, संतो के नाम, तीर्थ स्थलों के नाम, दर्शन अवधान, योगासन के नाम, संयुक्त दर्शन अवधान (प्रसिद्ध स्थल), त्यौहारों के नाम, शीघ्र श्रवण, संयुक्त अवधान, दो विदेशी शब्द, संयुक्त दर्शन अवधान, वैज्ञानिक तथा स्वतंत्रता सेनानी माइंड रीडिंग अवधान, सूत्र के नाम, जैन गीत के नाम, व्यस्ताक्षरी, गाणितिक अवधान, ब्लाइंड अवधान, आगम पाठ, नाद अवधान, राजा महाराजाओं के नाम, धर्म ग्रंथों के नाम, चक्रवेद अवधान आदि के प्रश्नों को क्रम में एवं उल्टे क्रम में प्रस्तुत किया, जिसका सभी ने अभिवादन किया।
जैन इंटरनेशनल विद्यापीठ करेगा बच्चों में संस्कारों का पोषण
इसके अतिरिक्त म.सा. ने प, फ, ब, भ, म शब्द के बिना उपयोग किए प्रवचन दिया। इसके अतिरिक्त नेत्रों को देखकर मन में क्या चल रहा है, इसको सभी के समक्ष उजागर कर भीतर की शक्ति को प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के पश्चात तारक मेहता का उल्टा चश्मा के कलाकार समय शाह (गोगी) व गोली ने म.सा. को उठाकर हर्ष व्यक्त किया। महाशतावधानी अभिनंदनसागरजी म.सा. ने बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं का अभिवादन करते हुए कहा कि बच्चो में संस्कार का पोषण करने के लिए हैदराबाद व सिकंदराबाद में जैन इंटरनेशनल विद्यापीठ का शुभारंभ किया गया।
इसी प्रकार के स्कूलों की स्थापना अन्य क्षेत्रों में भी होनी चाहिए, ताकि जैन समाज के बच्चे आधुनिक शिक्षा के साथ जैनत्व के संस्कार का अनुसरण कर परिवार व जैन कुल का नाम रौशन कर सकें। म.सा. ने स्कूल में सहयोग प्रदान करने वाले लाभार्थी परिवारों का आभार प्रकट करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में अधिक से अधिक लोगों को योगदान देकर जैन स्कूलों की स्थापना में सहयोग प्रदान करने की प्रेरणा दी।
म.सा. ने कहा कि जब नेमीचंद्रसागरजी एवं नमीचंद्रसागरजी बहुत छोटे थे, तो एक पाठ याद नहीं कर पाते थे, लेकिन दोनों ने भीतर कला शक्ति को जागृत कर आज इसे प्रस्तुत कर नगर में इतिहास बनाया है। महाशतावधान का प्रयोग सर्वप्रथम किया गया। शतावधान कला भीतरी आत्मिक साधना एवं ध्यान के माध्यम से उजागर की गई तीव्र प्रज्ञा के बल से मानसिक शक्ति प्रबल बनती है। मस्तिष्क में एक विशेष प्रक्रिया होती है, जिससे मेमोरी और एकाग्रता बढ़ती है।
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हमारी आत्मा में है असंख्य शक्तियों का भंडार : म.सा.
साधक जो एक बार सुनता है, उसकी स्मृति में अंकित हो जाता है। एक बार श्रवण की गई, देखी हुई वस्तुओं को याद रखने को कहते हैं शतावधान। सौ-सौ वस्तुओं को याद रखकर उसे क्रम में यानी 1 से 100 के क्रम में बताना, उल्टे क्रम में यानी 100 से 1 तक अवधान करने की सिद्धि हासिल होती है, उसे कहा जाता है महाशतावधान। म.सा. ने कहा कि आत्मा में असंख्य शक्तियों का भंडार है। प्राचीन काल से हमारे ऋषि-मुनियों ने साधना से अनेक अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त की हैं।
आहार संयम, इन्द्रिय संयम एवं जप साधना के जरिए आत्मिक शक्ति के जरिए शतावधान की सिद्धि प्राप्त करते हैं। कार्यक्रम का संचालन प्रधान संयोजक कैलाश भंडारी ने किया। उन्होंने जैन इंटरनेशनल विद्यापीठ की विस्तार से जानकारी देते हुए इसमें सहयोग प्रदान करने वाले लाभार्थी ट्रस्टियों का आभार जताया। संस्था का उद्देश्य युवाओं को शिक्षा से जोड़ना, संस्कार से जोड़ना, प्राचीन विरासत रूपी शक्तियों से परिचित कराना है। उन्होंने सभी से बच्चों में आधुनिक शिक्षा एवं जैन संस्कार को पोषित करने में योगदान देने का आग्रह किया।
अवसर पर सीआईएसएफ के डिप्टी कमांडेंट आशीष जैन, हरियाणा के पूर्व राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय, जैन इंटरनेशनल विद्यापीठ के लाभार्थियों, ट्रस्टियों एवं ट्विन महाराज के सांसारिक माता-पिता सोनल बेन और पीयूष भाई का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में जैन समाज की विभिन्न संस्थाओं के प्रधान, महामंत्री सदस्य सहित गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। कार्यक्रम में प्रधान संयोजक इंदरचंद चोरड़िया, योगेश खरगांधी, कैलाश भंडारी, संयोजक विक्रम श्रीश्रीमाल, दिलीप श्रीश्रीमाल, अमित बजावत, अविनाश भंडारी सहित विभिन्न मंडलों ने सहयोग प्रदान किया।
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