नया उजाला

दरवाज़े पर दस्तक हुई तो भीतर जैसे हल्की-सी हलचल जाग उठी। आहट सुनकर एक बड़ी-बड़ी आँखों वाली युवती ने धीरे से दरवाज़ा खोला। सामने खड़े युवक ने विनम्र स्वर में कहा- ‘मैं मनीष हूँ, मुझे सोहन जी से मिलना है।’ संध्या ने एक क्षण उसे ध्यान से देखा, फिर सहज स्वर में बोली, ‘पापा तो अजमेर गए हैं।’ ‘अच्छा ! तो आप अपनी मम्मी को बुला दें।’ मनीष ने ‘मम्मी भी पापा के साथ गई हैं।’ उसने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया।
‘क्या किसी आयोजन में गए हैं?’ मनीष ने पूछा। संध्या ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘यहाँ कॉलेज नहीं है। मेरे दोनों भैया अजमेर में पढ़ते हैं। मम्मी-पापा उन्हें देखने गए हैं। रात की ट्रेन से लौटेंगे।’ मनीष ने चारों ओर नज़र दौड़ाई। एक छोटा-सा रोड साइड स्टेशन, गिने-चुने क्वार्टर और चारों ओर पसरा सन्नाटा।
‘तो घर में और कोई है?’ उसने पूछा। ‘नहीं,’ संध्या ने शांत स्वर में कहा, ‘मैं अकेली हूँ।’ mक्षण भर के लिए दोनों के बीच मौन उतर आया, जैसे समय भी थमकर उन्हें देख रहा हो। ‘आपका नाम ?’ मनीष ने बातचीत आगे बढ़ाई। ‘संध्या।’ ‘आप क्या करती हैं?’
‘मम्मी-पापा के साथ रहती हूँ और हायर सेकेंडरी में पढ़ रही हूँ।’ ‘लेकिन यहाँ तो कोई स्कूल नहीं होगा।’ मनीष ने आश्चर्य से कहा। ‘अगला स्टेशन दौसा है।’ संध्या बोली, ‘वहाँ बड़ा कस्बा है। वहीं पढ़ने जाती हूँ।’ ‘कैसे ?’ मनीष ने पूछा। ‘कभी ट्रेन से तो कभी साइकिल से,’ उसने सहजता से उत्तर दिया।
मनीष के चेहरे पर हल्की-सी प्रशंसा उभरी। ‘आपने यह तो बताया नहीं कि मैं पापा के पास क्यों आया हूँ?’ उसने मुस्कुराते हुए कहा। संध्या ने उत्सुकता से उसकी ओर देखा। मनीष ने जेब से एक चिट्ठी निकाली और उसकी ओर बढ़ा दी ‘आपके पापा और मेरे ताऊजी पुराने मित्र हैं। उन्होंने यह चिट्ठी दी है।’
चिट्ठी पहले से खुली थी। संध्या ने उसे पढ़ना शुरू किया-‘मैं मनीष को भेज रहा हूँ। चाहता हूँ कि लड़का-लड़की एक-दूसरे को देख लें, फिर रिश्ते की बात करेंगे।’शब्द पढ़ते ही उसके गालों पर लाली उतर आई। उसकी आँखें झुक गईं और चेहरे पर एक मधुर संकोच खिल उठा।
मनीष ने उस झिझक को पढ़ लिया। ‘अब मैं चलता हूँ।’ उसने धीमे स्वर में कहा। ‘आप कैसे आए हैं?’ संध्या ने पूछा। ‘रिक्शा खड़ा है बाहर।’ मनीष ने उत्तर दिया। कुछ क्षण चुप्पी रही। संध्या ने साहस जुटाकर धीमे से पूछा- ‘फिर पापा से मिलने कब आएँगे ?’ मनीष ने मुस्कुराकर कहा- ‘अब तो बारात लेकर ही आऊँगा।’
कहकर वह मुड़ गया। उसके कदम धीरे-धीरे दूर होते गए। संध्या दरवाज़े पर खड़ी उसे देखती रही, जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गया। सांझ उतर रही थी और उसके मन में एक नया उजाला जन्म ले चुका था। यह एक ऐसी दस्तक थी, जो अब जीवन भर उसके साथ रहने वाली थी।
-किशन लाल शर्मा
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