निरंतर चलने वाला ध्यान है निदिध्यासन : रमेशजी

हैदराबाद, ध्यान और निदिध्यासन द्वारा भाग्य की रूपरेखा बदली जा सकती है। उक्त उद्गार सद्गुरु रमेशजी ने अवर पैलेस में आयोजित विशेष ज्ञान सत्संग में व्यक्त किए। ज्ञान के द्वारा सीमित स्थूल शरीर के माध्यम से विश्वव्यापी चेतन शरीर का अनुभव कराते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन के लक्ष्यों जैसे स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन, स्वस्थ भावना और स्वस्थ आध्यात्मिक जीवन हम सरलता से जी सकते हैं। इसमें दो बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं।

पहली बात है ध्यान हम सीमित समय के लिए ही करते हैं और ज्यादातर ध्यान के समय हम आँखें बंद रखते हैं। दूसरा बिंदु है कि जब हम ध्यान नहीं कर रहे हैं, तब उस सर्वव्यापी चेतना से हम किस प्रकार जुड़े रह सकते हैं? इसका समाधान है खुली आँखों से हमें जो भी दिखाई दे रहा है, उसमें उस चेतना का अनुभव करना, जो हमारे भीतर और बाहर है, क्योंकि सूक्ष्म रूप में सर्वव्यापी चेतना के भीतर ही सब कुछ घटित हो रहा है। इसलिए कुछ भी उससे अलग नहीं है।

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रमेशजी ने कहा कि हमारा स्थूल शरीर अस्थाई है, परंतु हमारा विराट रूप अर्थात सूक्ष्म सर्वव्यापी चेतना शाश्वत है। अपने स्थूल शरीर से अपने चेतन शरीर या विराट शरीर के योग का अनुभव करना निदिध्यासन है। इसका अर्थ यह हुआ कि निदिध्यासन निरंतर चलने वाला ध्यान है। इससे हमारा आंतरिक और बाहरी रूपांतरण तथा कल्याण सुनिश्चित है।

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