‘नो किंग्स’ रैलियां: ट्रंप नीतियों के खिलाफ वैश्विक विरोध
अमेरिका , अमेरिका और यूरोप के इलाकों में शनिवार को नो किंग्स रैलियों में बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लेकर ईरान युद्ध और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्रवाइयों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।
कम से कम 12 देशों में नो किंग्स रैलियां
85 लाख की आबादी वाले न्यूयॉर्क शहर से लेकर दो हजार से भी कम आबादी वाले ड्रिग्स कस्बे तक लोग सड़कों पर उतर आए। अमेरिका के अलावा, यूरोप, लातिन अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया समेत कम से कम 12 देशों में भी विरोध-प्रदर्शन हुए। इन आयोजनों का नेतृत्व कर रहे संगठन ‘इंडिविजिबल’ के सह-कार्यकारी निदेशक एज्रा लेविन के अनुसार, लोकतांत्रिक देशों में लोग इन प्रदर्शनों को “नो टायरंट्स” यानी “कोई तानाशाह नहीं” के नाम से जानते हैं।
रोम में सड़कों पर उतरे हजारों लोग
रोम में हजारों लोग सड़कों पर उतरे और उन्होंने प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के खिलाफ नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों ने इजराइल और अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के विरोध में बैनर भी लहराए।
हजारों लोगों ने ट्रंप की सख्त नीतियों के खिलाफ उठाई आवाज
अमेरिका का मिनेसोटा प्रांत इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बनकर उभरा, जहां हजारों लोगों ने एकजुटता दिखाते हुए ट्रंप की सख्त आव्रजन नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। सेंट पॉल में कैपिटल लॉन में आयोजित मुख्य रैली में प्रसिद्ध गायक ब्रूस स्प्रिंगस्टीन भी शामिल हुए। ब्रूस और अन्य वक्ताओं ने भीषण सर्दी के बावजूद सड़कों पर उतरकर अमेरिकी आव्रजन एजेंसी की कार्रवाई का विरोध करने के लिए प्रांत के लोगों की सराहना की।

ब्रूस स्प्रिंगस्टीन ने विरोध में प्रस्तुत किया अपना गीत
ब्रूस स्प्रिंगस्टीन ने संघीय एजेंटों की गोलीबारी में रिनी गुड और एलेक्स प्रेट्टी की मौत पर विरोध प्रकट करते हुए अपना गीत “स्ट्रीट्स ऑफ मिनियापोलिस” प्रस्तुत किया। इस गीत के माध्यम से उन्होंने गहरा शोक व्यक्त किया और कहा कि मिनेसोटा के लोगों द्वारा आव्रजन एजेंसी के खिलाफ किया गया प्रतिरोध पूरे देश के लिए आशा की किरण बन गया है।
“आपकी ताकत और प्रतिबद्धता ने हमें यह एहसास कराया कि यह अब भी वही देश है। और यह रूढ़ीवादी भयावह दौर तथा अमेरिकी शहरों में इस तरह की कार्रवाई अधिक समय तक नहीं चलेगी।”
50 राज्यों में 3,200 से अधिक जगह एकसाथ हुए प्रदर्शन
रॉयटर्स के अनुसार, न्यूयॉर्क, वाशिंगटन, लॉस एंजिल्स और डलास जैसे महानगरों के साथ-साथ इडाहो जैसे छोटे राज्यों में भी हजारों कार्यक्रम हुए। प्रदर्शनकारी मुख्य रूप से ईरान के साथ बढ़ते सैन्य संघर्ष, नागरिक स्वतंत्रता में कटौती और प्रवासियों के खिलाफ की जा रही सख्त कार्रवाई का विरोध कर रहे थे।
आयोजकों का दावा है कि जनवरी 2025 में ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से यह अब तक का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन है। ‘नो किंग्स’ आंदोलन अमेरिका में एक साल के भीतर तीसरा सबसे बड़ा प्रदर्शन रहा।
मिनेसोटा बना विरोध का मुख्य केंद्र
मिनेसोटा राज्य इस आंदोलन का सांकेतिक केंद्र बनकर उभरा, जहां सेंट पॉल में एक विशाल रैली हुई। मशहूर संगीतकार ब्रूस स्प्रिंगस्टीन ने ‘स्ट्रीट्स ऑफ मिनियापोलिस’ गाना गाया। यह गाना रेनी गुड और एलेक्स प्रेटी की याद में लिखा गया है, जिनकी इस साल की शुरुआत में आव्रजन एजेंटों की गोलीबारी में मौत हो गई थी।
इसके साथ ही सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने संवैधानिक मूल्यों को बचाने की अपील की, वहीं मिनेसोटा के गवर्नर टिम वाल्ज ने प्रदर्शनकारियों की लोकतांत्रिक भावना की सराहना की।

अधिकांश प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ जगहों पर तनाव देखा गया। लॉस एंजिल्स में एक डिटेंशन सेंटर के पास प्रदर्शनकारियों द्वारा पत्थरबाजी के बाद पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े। डलास में भी कुछ गिरफ्तारियां हुईं। रिपब्लिकन पार्टी और व्हाइट हाउस ने इन प्रदर्शनों को ‘राजनीति से प्रेरित’ बताते हुए इनकी आलोचना की है।
केवल युद्ध ही नहीं है विरोध का कारण
प्रदर्शनकारियों ने केवल ईरान युद्ध ही नहीं, बल्कि कई अन्य सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को भी उठाया। इस दौरान बढ़ती महंगाई और आर्थिक गैप के खिलाफ आवाज उठाई गई। सरकार की नई नीतियों के खिलाफ और ट्रांसजेंडर के अधिकारों को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने बैनर और पोस्टर लहराए। कई प्रदर्शनकारियों ने इस संघर्ष की तुलना अमेरिका के पुराने स्वतंत्रता आंदोलनों से की।
लंदन से पेरिस तक, वैश्विक स्तर पर दिखी गूंज
यह आंदोलन केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ट्रंप की नीतियों का विरोध हुआ। यूरोप के लंदन, पेरिस और रोम में हजारों लोगों ने ‘दक्षिणपंथी राजनीति’ और युद्ध के कारण बढ़ते सैन्य तनाव के खिलाफ रैलियां निकालीं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अमेरिका की युद्ध नीतियों और मानवाधिकारों के रिकॉर्ड को लेकर बढ़ती चिंता साफ दिखी।
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