ट्रंप को युद्ध का नोबेल !

अमेरिका-इजराइल का ईरान से युद्ध पेट्रोल की आग की तरह फैलता जा रहा है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप इस संघर्ष के सहारे सारी धरती को विश्वयुद्ध में झोंकने के लिए बयान-दर-बयान दिए जा रहे हैं। शायद वे तब तक न तो खुद चैन से बैठेंगे, न दुनिया को चैन से जीने देंगे, जब तक उन्हें युद्ध का नोबेल नहीं मिल जाता! जी हाँ, अगर आज हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ शांति किसी पुराने फैशन की तरह लगती है – केवल संग्रहालयों के लायक; तो इसका बड़ा श्रेय डोनल्ड ट्रंप को जाता है। बेशक वे युद्ध के नोबेल के प्रबलतम ह़कदार हैं।

आइए, एक नज़र ट्रंप की विदेश नीति पर डालें। उन्होंने ईरान परमाणु समझौते को सबसे खराब डील कहकर फाड़ दिया। क्या शांति का मतलब है देशों को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है? नहीं, ट्रंप के अनुसार, शांति का मतलब है तनाव बढ़ाना ताकि हर कोई हमेशा युद्ध के कगार पर रहे। ईरान के साथ उनका रुख इतना आक्रामक था कि मध्य पूर्व में शांति की उम्मीदें एक ट्रंप ट्वीट की तरह वाष्पित हो गईं। अगर नोबेल समिति युद्ध को बढ़ावा देने के लिए पुरस्कार दे, तो ट्रंप पहले नंबर पर होंगे – चूँकि उन्होंने मध्य पूर्व को शांतिपूर्ण अशांति का ऐसा उपहार दिया है जिसका कोई सानी नहीं। क्या उनसे बेहतर युद्ध-प्रचारक कोई और हो सकता है?

किम जोंग उन को ‘रॉकेट मैन’ कहकर बढ़ा तनाव

फिर आते हैं उत्तर कोरिया के साथ उनके प्यार भरे रिश्ते पर। किम जोंग उन को रॉकेट मैन कहकर ट्रंप ने क्या किया? शांति वार्ता? नहीं, उन्होंने ट्विटर पर युद्ध की धमकियाँ दीं, जिनसे दुनिया की सांसें थम गईं। हाँ, वे मिले। हाथ मिलाया। लेकिन क्या शांति हुई? बिल्कुल नहीं! उत्तर कोरिया अभी भी मिसाइलें दाग रहा है। और ट्रंप का योगदान? उन्होंने दिखाया कि युद्ध की धमकी से आप एक तानाशाह को दोस्त बना सकते हैं – लेकिन केवल इतना कि वह और ज्यादा मिसाइलें बनाए।

यानी वे युद्ध के नोबेल के ह़कदार है, चूँकि उन्होंने साबित किया कि शांति वार्ताएँ सिर्फ फोटो-ऑप हैं, जबकि असली मजा युद्ध की तैयारी में है। यूक्रेन की शांति वार्ताओं में वे यही तो करते रहे हैं न? इसीलिए तो नेतन्याहू उन्हें प्रियतम हैं? ट्रंप की घरेलू नीतियाँ भी विलक्षण रूप से युद्ध-उन्मुख हैं। उन्होंने ट्रेड वॉर को एक अंतरराष्ट्रीय खेल बना दिया। चीन के साथ व्यापार युद्ध शुरू करके उन्होंने दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला दिया। क्या शांति का मतलब है कि देश एक-दूसरे के साथ व्यापार करें? ट्रंप कहते हैं, नहीं! टैरिफ लगाओ, कंपनियों को बर्बाद करो और देखो कैसे दुनिया के बाजार युद्धक्षेत्र बन जाते हैं।

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ट्रेड वॉर से अमेरिकी किसानों और चीनी कंपनियों पर असर

अमेरिकी किसान दुखी, चीनी कंपनियाँ घाटे में, लेकिन ट्रंप खुश – अमेरिका फर्स्ट के नाम पर वैश्विक युद्ध जो छेड़ दिया! अगर नोबेल समिति अर्थव्यवस्था को युद्ध का मैदान मानती, तो ट्रंप को स्वर्ण पदक मिलता। और हाँ, विश्वमहामारी कोरोना के दौर में उन्होंने चाइना वायरस कहकर नस्लीय युद्ध भी यो छेड़ा था न!

ट्रंप की सैन्य नीतियाँ तो और भी शानदार हैं। उन्होंने अमेरिकी सेना को फिर से महान बनाने के लिए अरबों डॉलर खर्च किए। ड्रोन हमले बढ़ाए। सीरिया में बम गिराए। वेनेजुएला के राष्ट्रपति का रातोंरात अपहरण कर लिया। युद्धजीवी पाकिस्तान को गोदी में बिठा लिया। ईरान को लीर-लीर कर दिया। क्या यह शांति है? नहीं, यह युद्ध की मास्टरी है! ट्रंप ने दिखाया कि अमेरिका जैसी महाशक्ति के राष्ट्रपति बनकर आप दुनिया को अपना निजी युद्धक्षेत्र बना सकते हैं। उन्होंने साबित किया है कि शांति सिर्फ कमजोरों के लिए है, जबकि मजबूत लोग तो युद्ध से खेलते हैं!

अंततः, ट्रंप ने दुनिया को सिखाया है कि शांति उबाऊ है, जबकि युद्ध रोमांचक! इसलिए, नोबेल समिति को शांति का नोबेल को भूलकर, तुरंत डोनल्ड ट्रंप को सम्मानित करने हेतु युद्ध का नोबेल शुरू करना चाहिए! वरना वे धरती को नरक बनाकर ही छोड़ेंगे।

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