आमलकी एकादशी व्रत करें दिव्य आंवले के पेड़ की पूजा
तिथि मुहूर्त
विक्रम पंचांग गणना के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 27 फरवरी, शुक्रवार की दोपहर 12 बजकर 33 मिनट से शुरू हो रही है, जो रात 10 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर आमलकी एकादशी का व्रत 27 फरवरी, शुक्रवार को ही रखा जाएगा।
व्रत का पारण
28 फरवरी, शनिवार की सुबह 6 बजकर 47 मिनट से 9 बजकर 6 मिनट तक रहेगा।
फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी कहा जाता है, जो आध्यात्मिक उन्नति और पुण्य फल देने वाली मानी गई है। यह तिथि भगवान विष्णु की आराधना और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस तिथि पर आंवले के वृक्ष की पूजा करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और पापों का क्षय होता है। कहा जाता है कि श्रद्धा-भाव से रखा गया यह व्रत जीवन में सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और अधूरे कार्यों की सिद्धि का मार्ग खोलता है। इसलिए भक्त इस तिथि को विधि-विधान से पूजा करके पारण करते हैं।
धार्मिक महत्व
आमलकी एकादशी प्रकृति और भक्ति के संगम का पर्व है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास माना गया है। इसलिए इस दिन वृक्ष की पूजा करने का विशेष महत्व है।
पूजा विधि
सूर्योदय के समय तांबे के लोटे से सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करें। भगवान विष्णु के व्रत का संकल्प लें। संभव हो तो आंवले के वृक्ष के नीचे पूजा करें। घर में श्रीहरि की मूर्ति को गंगाजल से शुद्ध करें। भगवान विष्णु को फल, फूल, तुलसी दल और विशेष रूप से आंवले का भोग अर्पित करें। विष्णु सहस्त्रनाम या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें।
पितृ दोष से मुक्ति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष हो तो उसे जीवन में कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। शास्त्रों में बताया गया है कि एकादशी व्रत करके भगवान विष्णु का नाम जपने और आंवले के वृक्ष की पूजा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
स्कंद पुराण में उल्लेख मिलता है कि आमलकी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और उसके कुल के पितरों को भी तृप्ति प्राप्त होती है। हालांकि, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पितृ दोष की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म भी आवश्यक माने गए हैं। इसलिए केवल एक व्रत ही नहीं, बल्कि नियमित धार्मिक कर्म और सत्कर्म भी जरूरी हैं।
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