सावन में मंगला गौरी व्रत से पाएँ अखंड सौभाग्य

माह व्रत

हिन्दू मान्यतानुसार, हर पूजा का अपना महत्व है। गौरी व्रत व मंगला गौरी व्रत दोनों जुलाई के महीने में आते हैं। मंगला व्रत उत्तर व मध्य भारत में रखा जाता है। यह बहुत ही प्रभावशाली व्रत है। हिन्दू पुराणों के अनुसार विवाह में बाधा आ रही हो या वैवाहिक जीवन में खुशहाली, संतान प्राप्ति, पति/पुत्र की लंबी आयु व अन्य सुखों के लिए, कोई भी कुवारी कन्या या सौभाग्यशाली सुहागिन स्त्रा द्वारा इस व्रत को किया जाता है। माँ गौरा अर्थात् माता पार्वती के लिए यह व्रत किया जाता है। पुराणों के अनुसार, भगवान शिव-पार्वती को श्रावण माह अति प्रिय है। इसलिए यह व्रत श्रावण माह के मंगलवार को किया जाता है, इसलिए इसे मंगला गौरी भी कहा जाता है।

आवश्यक सामग्री

चौकी, सफेद व लाल कपड़ा, कलश, गेहूँ व चावल, चौमुखी दीपक, अगरबत्ती, धूपबत्ती, कपूर, माचिस, 16-16 तार की चार बत्ती, साफ व पवित्र मिट्टी माता गौरा की प्रतिमा बनाने के लिए, अभिषेक के लिए साफ जल, दूध, पंचामफत (दूध, दही, शहद, घी, शक्कर का मिश्रण), माता गौरा के लिए वस्त्र, मौली, रोली, चावल, अबीर, गुलाल, हल्दी, मेहंदी, काजल, सिंदूर, फूल, माला, पत्ते, आटे के लड्डू, फल, 5 तरह के मेवे, 7 तरह के अनाज, 16 पान, सुपारी, लौंग, 1 सुहाग पिटारी
(जिसमें सिंदूर, टीकी, नथ, काजल, मेहंदी, हल्दी, कंघा, तेल, शीशा, 16 चूड़ीयाँ, बिछिया, पायल, खिलौना आदि।

पूजा विधि

यह व्रत श्रावण के प्रथम मंगलवार से शुरू होता है, जो पूरे श्रावण माह को किया जाता है। पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। चौकी पर आधे में सफेद कपड़ा बिछाकर चावल की नौ छोटी-छोटी ढेरियाँ बनाएँ। उसी चौकी पर आधे में लाल कपड़ा बिछाकर गेहूँ की सोलह ढेरियां बनाएँ। चौकी पर थोड़े से चावल अलग से रखकर, पान के पत्ते पर सतिया बनाकर उस पर गणेशजी की प्रतिमा रखें।

गेहूँ की अलग से ढेरी पर कलश रखें। चौमुखी दीपक में 16 तार की बत्ती लगाकर प्रज्वलित करें।
प्रथम पूज्य गणेशजी की विधि-विधान से पूजा करके भोग लगाएँ। उसी तरह रोली-चावल से कलश और दीपक की पूजा करें। चावल की ढेरियों पर नवग्रह स्वरूप तथा गेहूँ की सोलह ढेरियों पर माता का स्वरूप बनाकर पूजा करें। एक थाली में पवित्र तथा साफ मिट्टी लेकर, माँ गौरा की प्रतिमा बनाकर पूरी श्रद्धा से प्रतिमा को चौकी पर रखें। प्रतिमा को जल, दूध एवं पंचामफत से स्नानादि कराकर अभिषेक करें एवं वस्त्र धारण करें।

माँ गौरा की रोली व चावल से पूजा करके सोलह श्रंगार की वस्तु चढ़ाएँ। सोलह तरह की चीजें (फूल, माला, फल, पत्ते, आटे के लड्डू, पान, सुपारी, लौंग, इलायची आदि रखें। कथा करके मंत्र का जाप करें और आरती करें। हर मंगलवार को पूजा के बाद अगले दिन, माँ गौरा की प्रतिमा को किसी तालाब या नदी में पूरी श्रद्धा से विसर्जित करें। मन्नत के अनुसार यह व्रत पूर्ण कर उद्दयापन करें।

कथा

एक समय में कुरु देश में श्रुति कीर्ति प्रसिद्ध राजा था, जो अनेक कलाओं तथा विशेष रूप से धनुष विद्या में निपूर्ण था। संपूर्ण सुखों के बाद भी राजा बहुत दुःखी और परेशान था, क्योंकि उसके कोई पुत्र नहीं था। उसने कई जप-तप, ध्यान और अनुष्ठान करके देवी की भक्तिभाव से तपस्या करता था। देवी प्रसन्न होकर कहने लगी, हे राजन! मांगो क्या मांगना चाहते हो।
राजा ने कहा, माँ मैं सर्वसुख व धन-धान्य से समर्थ हूँ।

मुझे वंश चलाने के लिए वरदान के रूप में एक पुत्र चाहिए। देवी माँ ने कहा, राजन, यह बहुत ही दुर्लभ वरदान है, पर तुम्हारे तप से प्रसन्न होकर मैं यह वरदान देती हूँ, परतु तुम्हारा पुत्र सोलह वर्ष तक ही जीवित रहेगा। यह बात सुनकर राजा और उनकी पत्नी बहुत चिंतित हुए। सभी बातों को जानते हुए भी राजा-रानी ने यह वरदान माँगा। देवी माँ के आशीर्वाद से रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम चिरायु रखा गया।

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साल बीतते गये, राजा को पुत्र की अकाल मृत्यु की चिंता सताने लगी। राजन ने सोलह वर्ष से पूर्व पुत्र का विवाह ऐसी कन्या से कराया, जो मंगला गौरी का व्रत करती थी। उस कन्या को व्रत के फलस्वरूप सर्वगुण संपन्न वर तथा सर्व सुहागन का वरदान प्राप्त था। विवाह के उपरान्त राजा के पुत्र की अकाल मत्यु का दोष स्वत: ही समाप्त हो गया। राजा का पुत्र अपने नाम के अनुसार चिरायु हुआ। इस तरह जो भी स्त्रा या कुवारी कन्या भक्तिभाव से मंगला गौरी का व्रत करती है, तो उसे सर्वसुखों की प्राप्ति होती है।

पूजा मंत्र

सर्वमंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके।

शरणनेताम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।


उद्यापन विधि

मंगला गौरी के व्रत पूर्ण करते आखरी मंगलवार को किसी पंडित या पुरोहित के सान्निध्य में सोलह सुहागन स्त्रियों को भोजन कराकर इस व्रत की समाप्ति करनी चाहिए।

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