करें हाथ जोड़ कर नमस्कार

यस, मैं हाथनहीं मिलाता। नहीं मिलाता तो नहीं मिलाता। बस, नहीं मिलाता। किसी से भी नहीं मिलाता। न सीनियर से, न जूनियर से। न दोस्तों से, न रिश्तेदारों से बल्कि मेरी तरफ हाथ बढ़ाने वालों को मैं असभ्य समझता हूँ और हिकारत की नजरों से देखता हूँ। वस्तुत हाथ मिलाने से मुझे हद दर्जे की चिढ़ है मगर इसका मतलब यह कदापि नहीं कि मैं छूआछूत की बीमारी से ग्रस्त हूँ।
सनातनी सभ्यता में एक दूसरे से मिलते या बिछड़ते समय शिष्टाचार स्वरुप हाथ जोड़कर अभिवादन करने की व्यवस्था दी गई थी जो पूर्णत वैज्ञानिक व्यवस्था थी और इसको बाकायदा एक नाम दिया गया था नमस्कार मुद्रा। नमस्कार शब्द नम धातु से बना है जिसका अर्थ है अभिवादन करना। नमस्कार मुद्रा वह मुद्रा है जिसमें हम सामने वाले के शरीर के किसी हिस्से को छुए बिना उसका अभिवादन करते हैं। हाथ की सभी उंगलियाँ चिपकी हुईं, दोनों हथेलियाँ एक दूसरे से चिपकी हुईं, दोनों अंगूठे हृदय गुहा से सटे हुए, दोनों कुहनियां जमीन के समानांतर।
वैसे तो नमस्कार मुद्रा के बहुत से आध्यात्मिक पहलू बताए गए हैं मगर वह सब आम इंसान की समझ से परे हैं। आम इंसान के लिए इतना ही काफी है कि उसे समझ में आ जाए कि हाथ मिलकर अभिवादन करने की सनक के कारण वह अनजाने में ही बहुत से घातक बैक्टीरिया का आदान प्रदान कर डालते हैं। नोरोवायरस व साल्मोनेल्ला, जो डायरिया और वोमिटिंग का कारण बनता है, हाथ मिलाने से ही फैलते हैं। इसके अलावा हाथ मिलाने से राइनोवायरस के संक्रमण का खतरा रहता है जिसकी वजह से जुकाम हो सकता है।
मैं नहीं चाहता कि मुझे डायरिया, टाइफाइड बुखार, मैनिंजाइटिस, ह्यूमेन पैपिलोमा वायरस का इन्फेक्शन, जेनाईटल हर्पीज या हेपेटाइटिस ए हो। साथ ही साथ इन्फ्लूएंजा और चिकन पाक्स वायरस भी हाथ मिलाने से ही फैलते हैं और जो सबसे बदमाश किस्म के बैक्टीरिया होते हैं, जैसे स्टेफायलोकोक्कस और क्लोस्ट्रीडियम, वह भी आपकी इस गर्मजोशी की वजह से ही फैलते हैं। और हाँ दफ्तरों में कंजंक्टिवाइटिस भी इसी की वजह से फैलता है। इसलिए खुद का भला चाहते हो तो जाग जाओ। लौट आओ अपनी जड़ों की ओर। कहीं देर न हो जाए।
-डॉ. संजीव कुमार वर्मा
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