जीवन में दया, करुणा और सद्भाव का समावेश ही करता है जीवन को सार्थक : निर्मलाजी
हैदराबाद, मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है, किंतु केवल मनुष्य जन्म प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं। इस जन्म में मनुष्यता का जागरण होना और भी दुर्लभ है। जीवन तभी सार्थक बनता है, जब उसमें दया, करुणा और सद्भाव का समावेश हो। करुणा रहित हृदय, चाहे मनुष्य देह में ही क्यों न हो, श्रेषठता खो देता है।



उक्त उद्गार श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ग्रेटर हैदराबाद काचीगुड़ा के पूनमचंद गांधी जैन स्थानक में विराजित महासती निर्मलाजी म.सा. ने प्रवचन सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। म.सा. ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीवन अपनी प्रवृत्ति, लेश्या और कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियों में गमन करता है। मनुष्य भव में जन्म लेने के बाद भी सभी वृत्तियाँ समान नहीं होती।
शास्त्रां में मनुष्य में पाई जाने वाली चार प्रमुख प्रवृत्तियों का वर्णन मिलता है, जिनमें प्रथम है दानवी अथवा राक्षसी प्रवृत्ति। दानवी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति बाहर से तो मनुष्य प्रतीत होता है, परंतु उसके अंतर्मन में स्वार्थ, अहंकार और हिंसा की भावना प्रबल रहती है। उसका एकमात्र ध्येय होता है मेरा ही सब कुछ है और दूसरों का भी मेरा ही है। महाभारत में दुर्योधन का यह दृष्टांत इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जिसने इसी मानसिकता के कारण धर्म और सबंधों की मर्यादा भंग की। ऐसे व्यक्ति की प्रवृत्ति आधिपत्य की होती है।
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सेवा और सह-अस्तित्व की कमी में स्वार्थ का वर्चस्व
वह हर वस्तु, हर व्यक्ति और परिस्थिति पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहता है। उसके विचारों में सेवा या सह असतित्व का स्थान नहीं होता, अपितु वह अपने हित के लिए उपकारी पर भी अपकार करने से नहीं चूकता। धन संग्रह, वर्चस्व और स्वार्थ सिद्धि ही उसका केंद्र बन जाते हैं। परिणामस्वरूप उसका जीवन अशांत और कर्मबंधन से युक्त होता चला जाता है।
इस प्रकार शास्त्र हमें सावधान करते हैं कि मनुष्य भव का उद्देश्य राक्षसी वृत्ति को पोषित करना नहीं, बल्कि दया, संयम और करुणा से युक्त दिव्य प्रवृत्ति का विकास करना है। जब तक हृदय में करुणा का संचार नहीं होता, तब तक मुष्यत्व की पूर्णता संभव नहीं।
महामंत्री पवन कटारिया ने बताया कि मंगलवार, 3 मार्च को संघ के तत्वावधान में भव्य रूप से होली चातुर्मास तप, त्याग, धर्म आराधना के रूप में दो-दो सामायिक दिवस के रूप में मनाया जाएगा। सभी ज्यादा से ज्यादा धर्म आराधना से जुड़ने का लक्ष्य रखें। प्रवचन के पश्चात संघ अध्यक्ष अन्नराज बाफना के नेतृत्व में पदाधिकारियों की बैठक की गयी, जिसमें होली चातुर्मास की रूप रेखा पर विचार-विमर्श किया गया। बुधवार, 4 मार्च को जालना में विराजित आचार्य ज्ञानचंदजी म.सा. के चरणों में वर्ष 2026 के चातुर्मास की विनती हेतु संघ के पदाधिकारी एवं कार्यकारिणि सदस्य प्रस्थान करेंगे।
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