पंच परमेष्ठी

(1) णमो अरिहंताणं
दुग्ध-सा धवल
स्फटिक-सा निर्मल
पुंडरीक-सा श्वेत-शुभ्र
निष्कलंक चंद्र-सा उज्ज्वल-शीतल
सृष्टि के सब रंग लिये
उदित हुआ
एक दीप्तिमान सूर्य
मेरे हृदयाकाश में।
(2) णमो सिद्धाणं
सूर्य का उदित होना,
सरोवर में पद्म का खिलना,
सूर्य का अस्त होना,
क्षितिज का रक्ताभ होना,
इसके साथ ही
किंतु इससे बहुत परे
पंछी का घर लौटना!
अब अंधेरा होना
नितांत असंभव है।
(3) णमो आयरियाणं
पारस पत्थर पर
पिघले सोने से लिखा-
णमो आयरियाणं
मुग्ध हो पढ़ता रहा
पीले-चमकीले
स्वर्णिम अक्षरों में।
(4) णमो उवज्झायाणं
समुद्र की अथाह जलराशि,
अनंत ज्ञान,
निस्सीम नीलाकाश,
नीलकमल से ढंके सरोवर,
मानो सब के सब
घनीभूत हो
प्रकट हुए एक साथ
और मैं निमग्न!
(4) णमो लोए सव्व साहूण
कृष्ण कापोत नील लेश्याएँ
फेंक रहा हूँ
पलायन वेग से भी
तीव्रतर गति से,
सब की सब
कृष्ण विवर में जा समा
अदृश्य हो रही हैं।
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