कागज की नाव और बचपन

यह कहानी जुड़ी है बचपन की उन बेहतरीन यादों से जो दिलों में आज भी अपनी अलग जगह बनाए हुए हैं। कहानी शुरू होती है शिवा की नानी के घर से। देखें क्या हो रहा है वहां। बेटा शिवा, ओ बेटा शिवा, कहां है? कब तक खेलता रहेगा, बारिश आने वाली है, अब अंदर आजा। जी नानी मां, आया, बस थोड़ी देर और। इस लड़के की यह थोड़ी देर सारा दिन निकाल देती है। रुक जा, तेरी मां से शिकायत करती हूँ अभी। वीना, देख जरा अपने लाडले को, जरा भी नहीं सुनता, यह लड़का मेरी तो।
रहने दो मां, बरसात की छुट्टियों का आनंद लेने दो इसे और वैसे भी यह नानी के घर आकर मजे नहीं करेगा तो क्या शहर में रहकर करेगा? थोड़ी देर बाद शिवा कमरे में आया और अलमारी से पुराने कागज निकाल कर फिर से आंगन की ओर जाने लगा। जाते-जाते अपनी मां और नानी मां से कहा कि मैंने मिट्ठू के घर खाना खा लिया है, आप लोग भी खाकर सो जाइए।
यह सुनकर नानी मां को और भी गुस्सा आया तो वह बोलीं, इस लड़के को भी ना खाने की चिंता, ना नहाने की, सुबह से बाहर खेल रहा है। अब तो बारिश भी हो रही है, बीमार हो जाएगा, तू सुनता है क्या? मैं भी भला किसे बोले जा रही हूँ। यह लड़का नहीं सुधरने वाला। चलो, वीना हम खाना खा लें। बीते जमाने के कुछ मीठे एहसास होंठों पर आज भी प्यारी-सी मुस्कान ला देते हैं। खासकर बचपन से जुड़े वो सभी बेहतरीन किस्से जो आज भी भुलाए नहीं भूलते।
बेशक! आज हम बड़े हो गए हैं, लेकिन अपना बचपन भला कौन भुला पाता है? आजकल तो हम खुद के बच्चों में ही अपना बचपन खोजने लग जाते हैं। अब बच्चों के साथ हम भी ऐसी-ऐसी अठखेलियां करने को आतुर होने लगते हैं, मानो अभी बाहर से मां की आवाज़ आएगी- चुप करते हो या आऊं डंडा लेकर? खासकर जब नानी मां के घर जाएं तब तो मानो दोबारा से स्वर्ग में रहने आ गए हों।
नानी मां डांटेगी, यह कहकर कि आजा अब अंदर, बहुत हुआ तेरा खेल। वो लम्हे थे ही इतने हसीन कि आज भी वो हकीकत से प्रतीत होते हैं। वैसे भी बचपन होता ही इतना मधुर और रसीला है कि बिताए हुए पलों में हर जगह, हर सफर और हर मौसम से हमारे कोई ना कोई किस्से खुद ही हमारे भीतर उजागर होने लगते हैं। अब जैसे शिवा को ही देख लो, अभी तक बाहर खेले जा रहा है। नानी मां तो खाना खाकर सो भी गईं, लेकिन शिवा की मां उसका इंतजार करने में लगी हुई है।
थोड़ी देर बाद जब बूंदाबांदी फिर शुरू हुई तो शिवा की मां शिवा को लाने के लिए चल पड़ी। मां जैसे ही आंगन में पहुंची तो वहां का नजारा देखकर मां का हृदय ऐसा प्रफुलित हुआ, मानो उन्हें भी अपना बचपन याद आ गया हो। मां ने देखा कि शिवा, कन्नू, अंशू, सन्नू, मिट्ठू, दित्तु, कित्तु सब बच्चे बारिश में झूम रहे हैं और कागजों से बेहतरीन नाव बनाकर आंगन के पास एकत्रित हुए पानी में चला रहे हैं। यह दृश्य देखकर मां चाहकर भी शिवा को अंदर नहीं बुला पाई।
भला मां ने भी तो बचपन में अपने दोस्तों के संग ऐसी कई तरह की अठखेलियां की होंगी। शिवा तो अपनी नानी के घर आता भी साल में सिर्फ एक बार है, वो भी बरसात की छुट्टियों में। ऐसा कुछ सोचकर मां शिवा को बिना आवाज लगाए ही लौट आई और सो गई। शिवा रोज ऐसे ही करता है। शिवा की मां और नानी मां दोनों उसकी शरारतें देखती भी हैं और उसे डांटती भी हैं फिर ढेर सारा प्यार भी करतीं हैं।
ऐसे कई दिन बीत गए। एक दिन वो भी आया, जब शिवा की मां ने शिवा को बताया कि कल हम बापस शहर जा रहे हैं। आज रात को ही तैयारी कर लेनी है। यह सुनकर शिवा बहुत उदास हो गया। उस दिन वह खेलकर भी बहुत देर से आया और आकर चुपचाप एक किनारे बैठ गया। वह कभी आसमान की तरफ देखता तो कभी अपनी कागज की नाव की तरफ।
दोस्तों ने पूछा, शिवा क्या बात है? तुम उदास क्यों हो? किसका इंतज़ार कर रहे हो क्या? शिवा ने कहा, बारिश का इंतजार कर रहा हूँ। मुझे बारिश के साथ बहुत-सी बातें करनी हैं। कैसी बातें? दोस्तों ने पूछा। मुझे यही पूछना है कि जब हम बड़े हो जाएंगे, तब भी यह बारिश इसी महक के साथ बरसेगी और हम सबके साथ खेला करेगी या फिर वक़्त के साथ यह भी बदल जाएगी?
इस बारिश ने जैसी खुशी हमें बचपन में दी है, क्या वैसी ही खुशी हमें बड़े होकर भी देती रहेगी? क्या यह बारिश हमारी इन कागज की नावों को कहीं बहाकर हमसे दूर ले जाएगी? शिवा के ऐसे सवाल सुनकर सभी दोस्त सोचने लगे कि आज शिवा यह कैसी बातें कर रहा है? दोस्तों ने शिवा से पूछा, शिवा बात क्या है, हमें बताओ, यूं पहेलियां ना बुझाओ।
शिवा ने उन लोगों को बहुत गहरा जवाब दिया, छोड़ चला हूँ नाव यहीं पर, देख-भाल तुम करना। आऊँगा अगले साल ही अब, इंतजार सब करना। ऐसी बारिश नाव और प्यार, कहीं नहीं मुझे मिलना। बचपन का यह प्यारा पल, किताबों में है लिखना।
यही कुछ पंक्तियाँ कहता हुआ वह अपने दोस्तों और नानी मां को रुलाता हुआ, वापस शहर आ गया। यहाँ वह गांव की बारिश और कागज की नाव के साथ गाँव के दोस्तों को बहुत याद करने लगा। धीरे-धीरे समय के साथ बड़ा होता गया।

हालांकि वह हर साल नानी मां के घर जरूर जाया करता और अपने बचपन के दोस्तों संग वैसे ही मस्ती किया करता। आज भले ही शिवा बड़ा हो गया है। बचपन के लगभग सभी दोस्त भी नौकरी के लिए या अन्य कारणों से दूसरी जगहों पर रहने लगे, लेकिन बचपन की वो बारिश और काग़ज़ की नाव आज भी शिवा और उसके बचपन के दोस्तों को, इकठ्ठे गांव आने से रोक नहीं पाती। और मज़े की बात तो यह है कि अब शिवा और उसके दोस्त नहीं बल्कि उनके छोटे बच्चे भी बारिश में भीगने और कागज की नाव चलाने का आनंद लेते हैं। शिवा की नानी मां भी बहुत बूढ़ी हो चुकी हैं। वह शिवा को बहुत कम डांटती हैं।,
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