नवाचारों का संरक्षण ग्रामीण अर्थव्यवस्था को करेगा मजबूत : डॉ. राजी रेड्डी

हैदराबाद, श्री कोंडा लक्ष्मण तेलंगाना बागवानी विश्वविद्यालय(एसकेएलटीएचयू) में आज तेलंगाना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद और बौद्धिक संपदा अधिकार प्रकोष्ठ मुलुगु द्वारा संयुक्त रूप से बागवानी में नवाचारों की सुरक्षा : बौद्धिक संपदा अधिकार जागरूकता विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।

विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.डी. राजी रेड्डी ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेते हुए कहा कि नवाचारों का संरक्षण ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और मजबूत करेगा तथा किसानों को सशक्त बनाएगा। यहाँ जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, डॉ.डी. राजी रेड्डी ने अपने संबोधन में बालनगर कस्टर्ड एपल और आर्मूर हल्दी जैसे किस्मों के विकास व जीआई पंजीकरण पहलों में एसकेएलटीएचयू के नेतृत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बागवानी की प्रगति को नैतिक संरक्षण के साथ जोड़ा जाना चाहिए।

राजी रेड्डी ने विज्ञान, कानून और सामुदायिक ज्ञान के बीच सेतु निर्माण के लिए अंतविषय सहयोग को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय अपने शोधकर्ताओं और छात्रों द्वारा विकसित पेटेंट योग्य नवाचारों को वित्तीय सहायता प्रदान करेगा। डॉ. राजी रेड्डी ने बौद्धिक संपदा अधिकार ढाँचों के माध्यम से किसान संचालित और संस्थान संचालित नवाचारों की सुरक्षा की तत्काल आवश्यकता पर भी बल दिया।

एसकेएलटीएचयू में आईपीआर-जीआई जागरूकता का आह्वान

राजी रेड्डी ने एसकेएलटीएचयू के संकाय और छात्रों से आह्वान किया कि विश्वविद्यालय प्रतिमाह कम से कम एक पेटेंट दाखिल करने का लक्ष्य रखे। रेसोल्यूट फॉर आईपी के कानूनी तथा आईपीआर प्रमुख सुभाजीत साहा ने अवसर पर पेटेंट आईपीआर और भौगोलिक संकेत तथा बागवानी में उनके लाभों पर विचार रखे। उन्होंने देशभर में जीआई पंजीकरण की सफल केस स्टडीज साझा करते हुए बताया कि किस प्रकार ऐसे संरक्षण तंत्र ग्रामीण आर्थिक उत्थान, जैव विविधता संरक्षण और पारंपरिक फसलों की ब्रांड पहचान में योगदान प्रदान करते हैं।

राजी रेड्डी ने जीआई दस्तावेजों के लिए भौतिक-रासायनिक लक्षणों और सांस्कृतिक आख्यानों को संकलित करने के एसकेएलटीएचयू के दृष्टिकोण कीसराहना करते हुए अनुकरणीय मॉडल बताया। उन्होंने बताया कि जीआई टैग वाले उत्पादों को उनके असुरक्षित उत्पादों की तुलना में 10 से 15 प्रतिशत अधिक मूल्य प्राप्त हुए हैं।

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बागवानी संकायाध्यक्ष डॉ. जे. चीना ने कार्यशाला में वैज्ञानिक अनुसंधान को बौद्धिक संपदा में परिवर्तित करने के लिए प्रतिवर्ष एक वैज्ञानिक-एक पेटेंट के सिद्धांत पर बल दिया, जिसका सामाजिक स्तर पर ठोस प्रभाव हो। आयोजन सचिव डॉ. पी. सैदय्या ने तेलंगाना की बागवानी विरासत और पारंपरिक कृषि पद्धतियों को कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त जीआई अनुप्रयोगों में संकलित करने की विश्वविद्यालय की पहल पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शीघ्र ही हम तेलंगाना में सभी किसानों की किस्मों और अनूठी बागवानी पद्धतियों को उपयुक्त बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) ढाँचे के तहत संरक्षित करेंगे। धन्यवाद ज्ञापन बागवानी महाविद्यालय के असोसिएट डीन डॉ.पी. प्रशांत ने दिया।

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