प्रभु के निकट जाने के लिए आवश्यक तपश्चर्या : पवन गुरु
हैदराबाद, मानव जीवन का पहला लक्ष्य तपश्चर्या कर अपने आप को परमात्मा से जोड़ना है, क्योंकि गोविन्द की तपश्चर्या से ही भक्त को भगवान के समीप जाने का मौका मिलता है। उक्त उद्गार श्री चिन्ना अनंतगिरी शिवालयम् में श्री खाटू श्याम परिवार अत्तापुर द्वारा आयोजित श्री श्याम बाबा की दिव्य कथा के तृतीय दिवस श्री श्याम कथा भूषण पवन गुरुजी ने दिये। उन्होंने कहा कि जब जीवन में उम्मीद की कोई किरण न दिखाई दे तो बाबा श्याम के चरणों में समर्पित हो जाएँ, क्योंकि वे कोई न कोई रास्ता निकालते हैं और कल्याण करते हैं।










जीवन में कथा को धारण करें तो बाबा हमेशा मन में विराजित रहेंगे। पवन गुरु ने बर्बरीक का जीवन प्रसंग सुनाते हुए कहा कि बर्बरीक का जन्म गोविन्द की कृपा से हुआ था। वह हमेशा अपने पिता घटोत्कच्छ से ऐसे प्रश्न करते थे, जिनका समाधान केवल ज्ञानी-ध्यानी ही दे सकते थे। घटोत्कच्छ ने बर्बरीक को द्वारकाधीश के पास ले जाने की बात कहते हुए कहा कि तुम्हारे सारे प्रश्नों व जिज्ञासा का केवल गोविन्द ही समाधान कर सकते हैं। घटोतकच्छ बर्बरीक को द्वारकाधीश के पास ले गये।
मूर्ति पूजा से भक्त में दिव्य शक्ति और भाग्य का विकास
गुरुजी ने कहा कि भक्ति में भगवान भक्त के पास खिंचे चले आते हैं इसलिए श्याम जी को भक्ति भाव से पुकारना चाहिए। मूर्ति पूजा करने वाले पर भी प्रभु की कृपा बरसती है। भगवान के श्रीविग्रह की पूजा करने से मूर्ति का तेज ब्राह्मण में आ जाता है इसलिए मंदिर के पंडित के चरणों को और मंदिर की दहलीज को स्पर्श करना चाहिए। इससे भाग्य की लकीरें बदल जाती है। कलयुग का दुर्भाग्य है कि लोग चरण स्पर्श करना भूल गये हैं। वे केवल घुटनों या कमर तक स्पर्श करते हैं।
जीवन में बड़ों की कृपा पाने के लिए कम से कम चरण स्पर्श करें। मंदिर में प्रभु के चरणों को स्पर्श करने से हमें वैकुंठ की प्राप्ति होती है। भगवान ने भक्त को तन, मन, धन तो दिया है पर जीवन में सुख और शांति भगवान के श्री चरणों को स्पर्श कर ही प्राप्त होती है। इसलिए भगवान के चरणों को स्पर्श करना चाहिए। पवन गुरु ने कहा कि बर्बरीक को बुलाने के लिए प्रभु ने माया रची थी।
घटोतकच्छ ने दंडवत प्रणाम कर कहा कि आपके कथन से यशस्वी पुत्र बर्बरीक प्राप्त हुआ है। गोविन्द को बर्बरीक को गले से लगाते ही आनंद आया क्योंकि वे पूर्व में गोविन्द के भक्त थे। इसलिए प्रभु ने बर्बरीक का दूसरा नाम सुहृदय रखा और घटोत्कच्छ से कहा कि तुम्हारे पुत्र सुहृदय का हृदय निर्मल होगा। यह अपने लिए नहीं, लोगों के लिए जियेगा। यह समस्त कष्टों का निवारण करेगा। बर्बरीक ने प्रभु से मानव देह मिलने का कारण और कर्म पूछा तो केशव ने कहा कि मानव जन्म 84 लाख योनि के बाद मिलता है। मानव जीवन में पग-पग पर समस्या होती है, समाधान नहीं मिलता है।
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तपश्चर्या से मानव जीवन का उद्देश्य और परमात्मा से जोड़ना
अच्छे कर्म के बाद भी भाग्य साथ नहीं देता है। मन में दुविधा होती है, लेकिन जो मानव तन, मन और बुद्धि से केवल मेरी सेवा करता है उसका जीवन सार्थक हो जाता है। तब बर्बरीक पूछते हैं कि मेरे जीवन का क्या उद्देश्य है और किस लक्ष्य के लिए जन्म हुआ है तो गोविन्द ने कहा कि बर्बरीक महिसागर तीर्थ जाओ। वहां भगवान भोलेनाथ माता सिद्धिम्बिका की पूजा कर कृपा पात्र बनकर आशीर्वाद प्राप्त करो। वहीं रहो। वहां लक्ष्य की प्राप्ति होगी। बर्बरीक ने प्रश्न किया कि मानव जीवन का उद्देश्य क्या है तो प्रभु ने कहा कि मानव जीवन का पहला उद्देश्य तपश्चर्या कर अपने आप को परमात्मा से जोड़ना है। कथा में बर्बरीक का शीश दान एवं कथा विश्राम के बाद फूलों की होली का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में भक्तों ने उत्साह के साथ भाग लिया।
अवसर पर सुरेश कुमार प्रीतेश कुमार मोदी, भागीरथ ब्रिज गोपाल सारडा, भीमराज पूनमचंद लद्दड़, हरकरण ओमप्रकाश कासलिया व्यास, दामोदरलाल वेणुगोपाल करवा, कन्हैयालाल रोहित कुमार इन्नाणी, बालमुकुन्द रामप्रकाश दरक, विष्णुदास नरसिंगदास सारडा, सत्यनारायण चन्द्रप्रकाश बंग, मोतीलाल अशोक कुमार पाराशर, गोवर्धन दास गोपाल दास जाजू, श्रीनिवास विनोद कुमार इन्नाणी, गेंदालाल राधेश्याम शर्मा, महावीर प्रसाद विनोद कुमार सारडा, पुरुषोत्तम प्रह्लाद सारडा, बंसीलाल अशोक कुमार राठी, मदनलाल मनोहर लाल काबरा, लक्ष्मीनारायण मनमोहन काबरा, हरिकिशन रामनिवास लाहोटी, मोहनलाल रामस्वरूप अग्रवाल, महावीर प्रसाद ललित कुमार अग्रवाल, रामेश्वरलाल श्रीकांत मित्तल, रामदेव पवन कुमार व्यास, बालकिशन रवि कुमार पचीसिया, पुसाराम जुगल किशोर कलंत्री, कमलकिशोर दिनेश शर्मा, त्रम्बक राव विट्ठलराव जाधव, बंकटलाल हनुमानदास हेडा, नरेश कुमार कमलकिशोर डोबा, आसाराम पन्नालाल शर्मा, पुरुषोत्तम विशाल जोशी, गिरधारीलाल ओमप्रकाश वेहवाल, विजय कुमार जतिन व्यास, बद्रीप्रसाद महेश कुमार अग्रवाल व अन्य ने सहयोग दिया।
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