रेवंत रेड्डी के खिलाफ 2016 में दर्ज दायर याचिका खारिज
हैदराबाद, उच्चतम न्यायालय ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील को सोमवार को खारिज कर दिया, जिसमें मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और आईपीसी की धाराओं के तहत 2016 में दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया गया था। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों पर बारीकी से विचार किया और पाया कि प्रतिवादी संख्या 2 (रेवंत रेड्डी) के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है।
पीठ ने कहा कि वह मुख्यमंत्री को क्लीन चिट नहीं दे रही है, लेकिन उच्च न्यायालय के विचार, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में पूरी तरह से सही और अधिक तर्कसंगत प्रतीत होते हैं। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि राजनीतिक लड़ाइयाँ अदालतों में नहीं लड़ी जानी चाहिए। मुख्यमंत्री की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने याचिकाकर्ता एन. पेद्दी राजू को एक दुस्साहसी वादी करार दिया और कहा कि उन्होंने पहले भी इस मामले में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ आरोप लगाए थे। पिछले साल 17 जुलाई को उच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया था।
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2016 में गाचीबौली थाने में दर्ज हुआ मामला
वर्ष 2016 में गाच्चीबावली पुलिस थाने में दर्ज किए गए इस मामले में रेड्डी को आरोपी नंबर 3 के रूप में नामित किया गया था। एससी म्यूचुअली एडेड को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड से जुड़े शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि रेवंत रेड्डी के उकसावे पर, उनके भाई केंडल रेड्डी और अन्य लोगों ने गोपनपल्ली गांव में सोसाइटी की जमीन पर अतिक्रमण किया और जमीन पर कब्जा करने के इरादे से एक अर्थ-मूविंग मशीन का उपयोग करके दो कमरों को ध्वस्त कर दिया।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने उनके खिलाफ जातिवादी टिप्पणियाँ कीं। मुख्यमंत्री रेड्डी ने बाद में 2020 में इस मामले को रद्द करने के लिए उच्च न्यायालय का रुख किया। उनके वकील ने दलील दी कि रेड्डी अपराध स्थल पर मौजूद ही नहीं थे। उच्च न्यायालय ने इस आधार पर आपराधिक मामला रद्द कर दिया कि अभियोजन पक्ष आरोपी को घटना से जोड़ने वाला कोई सबूत पेश करने में विफल रहा था।
हालांकि, पीठ ने याचिकाकर्ता एन पेद्दी राजू और दो वकीलों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही बंद कर दी थी, जिन्हें चेतावनी दी गई थी कि इस तरह का आचरण न्यायिक प्रणाली की अखंडता को कमजोर करता है और इसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए। तेलंगाना उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा वादी और उसके दो वकीलों द्वारा दी गई माफी को स्वीकार करने के बाद मामला बंद हो गया था।
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