हिन्दी सिनेमा में दोस्ती का चित्रण
दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो खून के रिश्तों से परे होता है, पर जीवन में उसका महत्व किसी परिवार से कम नहीं होता। भारतीय संस्कृति में दोस्ती को अत्यंत पवित्र और मूल्यवान माना गया है, और यही भावना हिन्दी सिनेमा में भी समय-समय पर बेहद खूबसूरती से दर्शाई गई है। हिंदी फिल्मों ने न सिर्फ दोस्ती को दिखाया है, बल्कि इसे समाज के दिलों में रचाने-बसाने का काम भी किया है।
शुरुआत के दौर में दोस्ती

1950 और 60 के दशक में दोस्ती को अधिकतर सपोर्टिंग रोल्स या साइड स्टोरी की तरह दिखाया गया। यह वह दौर था जब सिनेमा में पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों को प्राथमिकता दी जाती थी, लेकिन फिर भी कुछ फिल्मों में दोस्ती की भावनात्मक गहराई दिखाई देने लगी। राज कपूर और राजेन्द्र कुमार की फिल्म ‘संगम’ (1964) इसका एक सशक्त उदाहरण है, जिसमें दो दोस्तों के बीच प्रेम, त्याग और ईर्ष्या के जटिल रिश्ते को दिखाया गया।
70 और 80 का दशक : दोस्ती के रिश्ते की ऊँचाई

1970 और 80 का दशक हिन्दी सिनेमा में दोस्ती की फिल्मों के लिए स्वर्ण युग कहा जा सकता है। इस दौर में दोस्ती को केंद्र में रखकर अनेक यादगार फिल्में बनीं। ‘शोले’ (1975) को कौन भूल सकता है, जिसमें जय और वीरू की जोड़ी भारतीय जनमानस में अमर हो गई। धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन की इस जोड़ी ने दोस्ती की परिभाषा ही बदल दी।
इसी तरह ‘याराना’ (1981) में अमिताभ बच्चन और अमजद ख़ान की दोस्ती पर आधारित कहानी ने यह दिखाया कि सच्चा दोस्त हर परिस्थिति में साथ निभाता है। वहीं ‘नमक हराम’ (1973) में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की दोस्ती के ज़रिए वर्ग-संघर्ष और विचारधारा की टकराहट को बेहद प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया।
90के दशक में बदलती परिभाषाएँ
90 का दशक आते-आते दोस्ती का रूप थोड़ा बदलने लगा। इस दौर की फिल्में दोस्ती के साथ-साथ प्रेम और पारिवारिक मूल्यों को जोड़कर एक नया नजरिया पेश करने लगीं। ‘दिल चाहता है’ (2001) भले ही 90 के आखिरी सालों की फिल्म ना हो, लेकिन यह एक ट्रांज़िशन मानी जाती है।

इससे पहले ‘जो जीता वही सिकंदर’ (1992), ‘कुछ कुछ होता है’ (1998) जैसी फिल्मों ने दोस्ती और प्यार के रिश्ते के बीच की जटिलताओं को पेश किया। ‘कुछ कुछ होता है’ में शाहरुख़ खान, काजोल और रानी मुखर्जी की त्रिकोणीय कहानी में दोस्ती की गहराई और उसकी सीमाओं को भावनात्मक रूप से दिखाया गया।
2000 के बाद का युग : आधुनिक दोस्ती का चेहरा

नई सहस्त्राब्दी के बाद आई फिल्मों में दोस्ती को और भी यथार्थवादी और बहुआयामी रूपों में दिखाया गया। ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ (2011), ‘रंग दे बसंती’ (2006), ‘छिछोरे’ (2019), ‘काई पो चे!’ (2013) जैसी फिल्मों ने दिखाया कि दोस्ती सिर्फ मस्ती और मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मीय जुड़ाव, विश्वास, संघर्ष और त्याग का नाम है।
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‘रंग दे बसंती’ में दोस्तों का देशप्रेम के लिए एक साथ खड़ा होना दर्शकों को रुला गया। वहीं ‘छिछोरे’ में दोस्ती को जीवन की चुनौतियों से लड़ने का एक मजबूत माध्यम बताया गया।

महिला मित्रता की कम परंतु प्रभावशाली उपस्थिति
जहाँ पुरुषों की दोस्ती पर असंख्य फिल्में बनी हैं, वहीं महिला मित्रता को लेकर बहुत कम फिल्में बनीं। फिर भी कुछ फिल्में जैसे आनंदी गोपाल, ‘वीरे दी वेडिंग’ (2018), ‘क्लब 60’ और ‘पिंजरा’ जैसी फिल्मों ने महिलाओं की दोस्ती को सम्मानजनक तरीके से पेश किया है।
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