मुक्ति पर सेवा को प्राथमिकता
जीवन में अच्छे कार्यों, जन सेवा एवं समाज के लिए समर्पित होकर काम करने वालों के लिए लोग मोक्ष और मुक्ति की कामना करते हैं, लेकिन हिन्दी मिलाप के संस्थापक एवं स्वतंत्रता सेनानी युद्धवीर जी इस बारे में कुछ अलग राय रखते थे। एक बार की घटना है कि वे भारतीय विद्या भवन में टोकरशी भाई के अमृत महोत्सव भाग ले रहे थे। टोकरशी भाई के बारे में बात करते हुए आचार्य श्री राजयश सूरीश्वरजी ने कहा था कि टोकरश भाई जैसे सेवाव्रती व्यक्ति ही मुक्ति अथवा मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी हैं।
युद्धवीर जी ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि क्षमा करें, आचार्य जी हमारे पूजनीय हैं, उनके प्रति मेरे मन में पूरी श्रद्धा है, पर उन्होंने मोक्ष प्राप्ति का जो आशीर्वाद टोकरशी भाई को प्रदान किया है, मैं उससे सहमत नहीं हूँ। मैं तो चाहता हूँ कि टोकरशी भाई जैसे सेवा व्रती व्यक्ति कभी मुक्त न हों और वे मरकर बार-बार इस धरती पर जन्म लें और हम जैसे पापियों को सदैव उनकी सेवाएँ प्राप्त होती रहें। अन्यथा हमारा उद्धार कैसे होगा? दीन दुखियों की सेवा फिर कौन करेगा?
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युद्धवीर जी के इस उद्गार से सारा सभागृह काफी प्रभावित रहा, बल्कि कई लेखकों ने बाद में अपने संस्मरणों में इस बात का उल्लेख किया। युद्धवीर जी की पत्रकारिता भी कुछ इसी तरह की थी। वे जिनसे भी मिलते लेखन, समाज सेवा तथा समाज और देश विरोधी तत्वों के खिलाफ संघर्ष की बात ज़रूर करते। अपने लेखन में भी उन्होंने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। मिलाप ने उनके आदर्शों के प्रचार प्रसार के लिए बाद में युद्धवीर फाउंडेशन स्थापित किया, जिसके माध्यम से जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अथक सेवा करने वालों को सम्मानित करने का सिलसिला जारी है।
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