बढ़ती गर्मी से बेहाल होते वन्यजीव

बारिश के पैटर्न, जंगलों की कटाई और जंगली जीवों के प्रति इंसानों में बढ़ती संवेदनहीनता के कारण शुरुआती गर्मियां वन्यजीवों के लिए कुछ दशकों पहले के मुकाबले इन दिनों बहुत भारी पड़ रही हैं। इससे भारत जैसे जैव विविधता में समृद्ध देश के सामने वन्यजीव संकट गहरा गया है।
अप्रैल का महीना अभी तक आया भी नहीं और देश के कई हिस्सों में तापमान 40 से 41 डिग्री तक पहुंच गया है। यह चौंकाने वाला तापमान सिर्फ इंसानों को ही परेशान नहीं कर रहा है। इससे वन्यजीव भी बहुत परेशान हैं बल्कि उनके लिए यह कहीं ज्यादा चुनौती बन चुका है और यह अकेले इसी साल की बात नहीं है, पिछले कई सालों से लगातार मार्च और अप्रैल महीने के बीच तापमान औसत से कहीं ज्यादा बढ़ है, जिसका खामियाजा देश के जंगली जीवों को भी भुगतना पड़ रहा है।
भारत के मध्य और पश्चिमी हिस्सों जैसे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अप्रैल की शुरुआत में ही पारंपरिक जलस्रोत सूखने लगते हैं। एक जमाना था जब छोटे तालाब, नाले और झीलें मई से जून तक भरे रहते थे। लेकिन अब लगातार बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के कारण मार्च के अंत तक ही ये खाली हो जाते हैं, जिसका सीधा असर जंगली जानवरों के जीवन पर पड़ता है क्योंकि पानी इनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आधार है।
पानी की कमी से बढ़ रहा मानव-वन्यजीव संघर्ष
जब जंगल में पानी की कमी हो जाती है, तो जानवरों को अपने सुरक्षित स्थानों को छोड़कर, पानी के लिए बाहर निकलना पड़ता है। तेंदुए, भालू, जंगली सुअर और बाघ तक पानी की तलाश में गांवों और शहरों के आसपास पहुंच जाते हैं। यही कारण है कि पिछले एक दशक में हमारे यहां मार्च से मई महीने के बीच तक मानव-वन्यजीव संघर्षों में 15 से लेकर 40 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई है। यह मत समझिये ये मुठभेड़ या मानव-वन्यजीव संघर्ष केवल इंसानों के लिए ही खतरनाक होती है, जानवरों के लिए भी यह बहुत त्रासद होता है और वे भी इससे बचना चाहते हैं।
वन विभाग द्वारा इस समस्या को हल करने के लिए जो कृत्रिम जलस्रोत यानी वाटर होल बनाये जाते हैं, वो कागजों में तो पर्याप्त होते हैं लेकिन हकीकत में ये उतने नहीं होते, जिससे कि वन्यजीवों का इंसानों के साथ संघर्ष न हो। यही कारण है कि सब कुछ जानते, समझते हुए भी हर साल इंसान और वन्यजीवों के बीच न केवल संघर्ष की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं बल्कि इस मौसम में शाकाहारी जानवर, जैसे हिरण, नील गाय तथा दूसरे तमाम शाकाहारी जीव भी पानी और भोजन की कमी के कारण लगातार कमजोर हो रहे हैं और बहुतों की असमय मौत हो जाती है।
बढ़ती गर्मी और जंगलों की आग से वन्यजीवों पर गहरा संकट
इसके साथ ही बढ़ती गर्मी के कारण हाल के दस सालों में जंगलों में लगने वाली आग भी 20 से लेकर 60 फीसदी तक बढ़ी है। मार्च और अप्रैल में लगने वाली जंगल की आग हजारों छोटे-बड़े जीवों के जीवन को खत्म कर देती है। कई बार तो पक्षियों के घोसले और अंडे भी इस आग की चपेट में आ जाते हैं, जिससे न केवल चलते-फिरते वन्यजीव बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियां तक खत्म हो जाती हैं। इसलिए पिछले कुछ सालों से भारत में उतरते मार्च और चढ़ते अप्रैल का महीना वन्यजीवों और पक्षियों के लिए बेहद कठिन होते जा रहे हैं।
छोटे जीवों विशेषकर कीड़े-मकोड़ों सरीसृपों की जिंदगी भी इस अचानक बढ़ी गर्मी का बुरी तरह से शिकार होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ सामान्य ऋतु परिवर्तन ही नहीं बल्कि यह क्लाइमेट चेंज या जलवायु परिवर्तन का असर है, इसलिए औसत तापमान में अगर दिखावट के तौरपर ज्यादा वृद्धि नहीं होती, तो भी इसके असर में काफी ज्यादा बढ़त देखी जाती है। मगर सवाल है इसके लिए किया जाए तो क्या? वास्तव में सिर्फ सरकार के भरोसे रहने से या सरकार की तरफ देखने से ही जल जीवन और जंगल नहीं बचते।
गर्मियों में जलस्रोत और संरक्षण से ही बचेंगे पक्षी व वन्यजीव
इसके लिए हम इंसानों को भी अपनी अनिवार्य भूमिका अदा करनी पड़ती है। सबसे पहले तो जो सरकार कर सकती है, वह यह है कि जहां उन जीवों की बड़ी संख्या है, वहां उतने ही ज्यादा कृत्रिम जलस्रोत बनाये जाएं और खुद आम आदमी पक्षियों व छोटे जीव-जंतुओं के लिए दया और परोपकार के भाव से गर्मियों में उनके पीने वाले पानी उपलब्ध करवाएं। इसके अलावा हर साल इस मौसम में जंगलों में जो आग लगती है, उसके लिए भी पहले से सावधान रहा जाए और हर उस परिस्थिति को टाला जाए, जिससे जंगलों में आग भड़क जाती है।
शहरी क्षेत्रों में पक्षियों के लिए पानी और छाया की व्यवस्था नगरपालिकाओं और नगर निगमों के साथ आम लोगों को भी आगे बढ़कर लेनी चाहिए। तभी पर्यावरण का संरक्षण भी हो सकेगा और इंसान तथा जानवरों के बीच लगातार बढ़ने वाली मुठभेड़ भी रूक सकेंगी।
गर्मी और वन्यजीव लगातार चौंकाते तथ्य
-हाल के कुछ सालों में देखा गया है कि अप्रैल के पहले सप्ताह तक ही देश के कई हिस्सों में तापमान 45 डिग्री तक पहुंच जाता है क्योंकि इतने तापमान पहुंचने से 60 प्रतिशत प्राकृतिक जलस्रोत सूख जाते हैं।
- प्राकृतिक जलस्रोत सूखने के कारण इन दिनों पानी की तलाश में 20 से 25 फीसदी तक वन्यजीव गांवों और शहरों के किनारों तक का सफर करते हैं।
- -यही नहीं पिछले एक दशक में हर साल इस मौसम में हजारों हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आये हैं, जिससे बड़े पैमाने पर पक्षियों और छोटे-मोटे कीड़े मकोड़ों की मौत हुई हैं।
- -इन्हीं गर्मियों में पिछले कई सालों से शहरों में हजारों पक्षियों के मरने की घटनाएं हुई हैं और देश के सभी महानगरों में कमोबेश इस मौसम में शहरी क्षेत्र में रहने वाले पक्षियों की हालत काफी ज्यादा खराब हो जाती है।
- -अगर आम लोग थोड़ी संवेदनशीलता से इस मौसम का मुकाबला करने के लिए वन्यजीवों के प्रति हमदर्दी दिखाएं तो घर व छतों पर पक्षियों के पीने के लिए पानी रख सकते हैं। शहरों की हर उस जमीन पर बड़ी मात्रा में पेड़-पौधे लगाये जा सकते हैं, जो इनसे रहित हैं और अपनी जीवनशैली से हम जितना प्लास्टिक का रोजमर्रा का उपयोग कम कर सकते हैं, उसका भी इस सबमें फायदा मिलता है।
के.पी.सिंह
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