उर्दू की प्रख्यात कथाकार जीलानी बानो का निधन
हैदराबाद, उर्दू की प्रख्यात कथाकार जीलानी बानो नहीं रहीं। उन्होंने भाषिक सीमाओं से पार हिन्दी सहित विभिन्न भाषाओं में लोकप्रियता अर्जित की थी। रविवार को लंबी बीमारी के बाद 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। पुत्र अशहर फरहान सहित भरापूरा परिवार शोकाकुल छोड़ गयीं।
जीलानी बानो का नाम उर्दू साहित्य के दिग्गज कथाकारों में शामिल किया जाता है। वंचित वर्गों की मुखर पक्षधर जीलानी बानो अपने पीछे एक ऐसी साहित्यिक विरासत छोड़ गई हैं, जो उनके प्रिय शहर हैदराबाद की सीमाओं से कहीं आगे तक फैली हुई है। परिवार के सूत्रों के अनुसार, वे एक सामाजिक शिल्पकार थीं, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य किया। वर्ष 1954 में अपनी पहली लघुकथा से शुरू हुआ उनका साहित्यिक सफर सात दशकों तक निरंतर सृजनशीलता से परिपूर्ण रहा। पद्मश्री सम्मान और डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि से सम्मानित बानो का योगदान बहुआयामी और दीर्घकालिक रहा।
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ऐवान-ए-ग़ज़ल और बारिश-ए-संग से वैश्विक साहित्यिक प्रतिष्ठा
जीलानी बानो का प्रभाव वैश्विक स्तर पर रहा। दक्कन की मिट्टी से गहराई से जुड़ी उनकी कहानियों ने मॉस्को से लेकर मैडिसन तक पाठकों के दिलों में स्थान बनाया। उपन्यास, नाटक और पटकथाओं सहित 22 पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की। उनकी प्रमुख कृतियाँ जैसे ऐवान-ए-ग़ज़ल और बारिश-ए-संग का रूसी, जर्मन, नॉर्वेजियन तथा लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। उनकी कहानियाँ सिनेमा तक भी पहुँचीं। विशेष रूप से श्याम बेनेगल की चर्चित फिल्म वेल डन अब्बा उनकी कहानी पर आधारित थी। अस्मिता जैसे गैर-सरकारी संगठनों की अध्यक्षा के रूप में उन्होंने महिला सशक्तिकरण और मानवाधिकारों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हैदराबाद की सांस्कृतिक आत्मा को संरक्षित करना भी उनका एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने आम लोगों द्वारा बोली जाने वाली दकनी उर्दू की 13 ऑडियो कैसेट रिकॉर्ड कर उसकी विशिष्ट लय और विरासत को सुरक्षित किया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उससे परिचित रह सकें। उज़्बेकिस्तान से लेकर दिल्ली तक के विद्वानों ने उनके साहित्य और व्यक्तित्व पर गहन अध्ययन किया। आम पाठकों के लिए वे ऐसी लेखिका थीं जो उनकी रोजमर्रा की कहानियों को समझती थीं। वे अपने पीछे संवेदनाओं से भरा एक समृद्ध साहित्यिक भंडार छोड़ गई हैं। उल्लेखनीय है कि हैदराबाद का पहला मुक्त सांस्कृतिक केंद्र लामकान उनके परिवार की ही पहल है।
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