शाही परिधानों की विरासत है रॉयल फेबल्स

हैदराबाद में हाल में संपन्न हुए रॉयल फेबल्स के तीसरे संस्करण में भारत के शाही घरानों की बेमिसाल कलाकारी देखने को मिली। इसने कला के प्रति जुनून, डिज़ाइनर विरासत और भारत की धरोहर को भी एक मंच प्रदान किया। यह रॉयल फेबल्स का पंद्रहवाँ संस्करण है, लेकिन हैदराबाद में इसका तीसरा संस्करण है।

पंद्रह साल पहले अंशु खन्ना द्वारा शुरू किया गया ‘रॉयल फेबल्स’भारत के शाही-परिवारों के वस्त्र और डिज़ाइनिंग के काम को सफलतापूर्वक प्रदर्शित करता आ रहा है। यह बुनाई की विरासत को सहेजकर रखता है और शाही सदस्यों को अपनी छिपी हुई प्रतिभा को सामने लाने का अवसर प्रदान करता है। यहाँ प्रदर्शित साड़ियों और कपड़ों की विशाल श्रृंखला में सलवार-कमीज़ से लेकर कुर्तियाँ, आभूषण व एक्सेसरीज़ भी अपने आप में बेजोड़ थीं। रंग और प्रिंट भी शाही अंदाज वाले थे।

कुछ हस्तनिर्मित कृतियों में ऐसी बारीकी और विशिष्टता दिखाई दी, जो आपको अन्य मंचों पर शायद ही देखने को मिले।
इस साल के शो के मुख्य आकर्षण नवाब काज़िम अली खान थे, जबकि अंबिका राजे सांदुर, अवालगढ़ के भूपेंद्रपाल सिंह और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी यहाँ प्रमुखता से नज़र आए। श्रीमती के. कविता ने प्रदर्शनी का विशेष दौरा कर कलाकृतियों में दिलचस्पी दिखाई। उन्होंने बातचीत के दौरान कहा, रॉयल फेबल्स हैदराबाद में उस इतिहास को वापस ला रहा है, जो अब तक शाही-परिवारों में सहेजकर रखा गया था।

महिलाओं का फैशन: आराम, परंपरा और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति

इसके कारीगरों के काम में भी इतिहास नजर आता है। मैंने एक मुकुट अपने हाथ में लिया था, जो 200 साल पुराना था। हैदराबाद की भी अपनी निज़ामी परंपरा है। इसलिए यह कालातीत और उत्कृष्ट कलाकृतियों का एक बेहतरीन संगम है। उनसे पूछा गया कि उनके विचार से एक भारतीय महिला को आदर्श रूप से किस तरह के वस्त्र धारण करने चाहिए, तो उन्होंने कहा, हमारा पहनावा आराम, फैशन और इतिहास का मिला-जुला रूप होना चाहिए।

महिलाओं को वही पहनने की आज़ादी होनी चाहिए, जो वे स्वयं चुनती हैं। उन्हें अपनी पसंद के माध्यम से अपने व्यक्तित्व को दर्शाना चाहिए, न कि दूसरों की पसंद के अनुसार कपड़े पहनने चाहिए। उन्हें अपने काम और घर-परिवार के बीच उचित संतुलन बनाए रखना चाहिए। विभिन्न स्टॉलों पर भिन्न-भिन्न तरह की कलाकृतियाँ प्रदर्शित थीं।

पासबान की तान्या ने बताया कि वे किस तरह अपनी पुरानी परंपराओं और विभिन्न राज्यों, जैसे गुजरात, कांजीवरम और कश्मीर की एकतारा बुनाई की मिश्रित शैलियों को पुनर्जीवित करती हैं। यहाँ प्रदर्शित प्रत्येक कलाकृति को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ तैयार किया गया है, जिसमें लंबा समय लगा है। एक नई विषय-वस्तु के आधार पर इन्हें गढ़ा गया है। पासबान ने इस बार पिछवाई के लिए एक अलग माध्यम के तौर पर मिस्र से मंगाए लम्बा टिश्यू को भी शामिल किया है, जिसमें उन्होंने खूबसूरत हल्के हरे और मौव रंगों का इस्तेमाल किया है।

नवाबी ठाठ और पारंपरिक फैशन: शाही शैली की पुनर्क्रांति

एक और प्रदर्शक ने बताया कि वह साड़ियों पर डिजिटल प्रिंट, कांजीवरम और प्रिंटेड ज़री का भी इस्तेमाल कर रही हैं। त्रित्व केरल के एक ब्रांड ने भारत के अलग-अलग इलाकों के विभिन्न हथकरघा उत्पादों को प्रदर्शित किया। वे प्राकृतिक सामग्री, लिनन, रेशम, कपास और पूरी तरह से प्राकृतिक कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें शहतूत के रेशम और ऑर्गेंज़ा पर हाथों से तैयार किया जाता है।

रामपुर के नवाब काज़िम अली खान इस शो के मुख्य आकर्षण थे। उन्होंने ने अपने विचार साझा करते हुए कहा, मैं तीसरे सीज़न से रॉयल फेबल से जुड़ा हूँ। यह एक बहुत ही बेहतरीन संस्था है। यह भारत के उन शाही घरानों को आपस में जोड़ती है, जो कपड़ा, कला, आभूषण और अन्य क्षेत्रों से जुड़े हैं। यहाँ हर कोई अपनी कला की महारत का प्रदर्शन कर सकता है।

जब फैशन और स्टाइल की बात आती है, तो मेरी पीढ़ी के लोगों के लिए ये बहुत स्वाभाविक बात है। अगली पीढ़ी के विचार कुछ अलग हैं, जिसकी वजह से पुरानी शैली का प्रभाव अब कम होता जा रहा है। वे लोग व्यावहारिकता पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं। मैं हमेशा पारंपरिक कपड़े ही पहनता हूँ। राजनीति में रहते हुए भी हमेशा सलवार-कमीज़ ही पहनता था, क्योंकि हम पठान हैं। मेरा बेटा भी पारंपरिक कपड़े पहनता है। ऐसे परिधान पहनना गौरव की बात है।

नवाबी परंपराएँ और शाही आभूषणों में कला की अहमियत

नवाब काज़िम अली खान को आभूषणों की भी अच्छी परख है। रामपुर रियासत बसरा मोतियों की सबसे बड़ी संग्राहक थी। इस संबंध में उन्होंने कहा, हमारे आभूषणों में बसरा मोतियों का ही इस्तेमाल होता था, जो अब लगभग विलुप्त हो चुके हैं। वह इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि किसी महिला के लिए नथनी पहनने का सही तरीका यह है कि वह गाल की हड्डी को छूती हुई हो, अन्य जगहों पर पहनने का तरीका बिल्कुल अलग है।

नवाब काज़िम का मानना है कि ऐसी तीन चीज़ें हैं, जो हमें अच्छा महसूस कराती हैं- सूरज, बहता हुआ पानी और रंग। ये तीनों नकारात्मकता को दूर करने में सहायक होते हैं। वह आगे कहते हैं, हम भारत में बहुत खुशकिस्मत हैं कि यहाँ साल के लगभग ग्यारह महीने मौसम गर्म रहता है। बहता हुआ पानी सकारात्मकता के लिए बहुत ही अच्छा माना जाता है। कुछ खास रंगों को देखकर या पहनकर आपको बहुत अच्छा महसूस होता है। मुझे भारत के सभी रंग बहुत पसंद हैं। वहीं, भूरे और सलेटी रंग मुझे उदास कर देते हैं।

रॉयल फेबल्स की संस्थापक अंशु खन्ना ने कहा, शाही घरानों की सभी महिलाएं छोटे शहरों में रहती थीं। किसी एक जगह या
पुश्तैनी संपत्ति में रहते हुए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की ज़रूरतों को पूरा करना आसान नहीं था। यह संस्था हमने दस लोगों के साथ शुरु की थी। इसमें अब लगभग पचास लोग हैं। संरक्षक के तौर पर बड़ौदा की महारानी भी हमारे साथ हैं। हमें असली स्वदेश यानी हमारे वस्त्र, कपड़े और बाकी चीज़ों को बढ़ावा देना होगा।

स्वदेशी धरोहर और पारंपरिक वस्त्रों की पुनर्रचना

हम स़िर्फ कार्टियर नेकलेस, रोल्स रॉयस वगैरह की ही बातें क्यों करें! हमें अपनी चंदेरी साड़ियों, अपने स्थानीय कारीगरों और असली स्वदेशी कहानियों के बारे में बात करनी चाहिए। अंशु खन्ना पिछले पंद्रह सालों से शानदार काम कर रही हैं। रॉयल फेबल्स में आपको जो देखने को मिलेगा, वह कहीं और नहीं मिलेगा।

हमने अपने कारीगरों की मदद से पुराने डिज़ाइन और पैटर्न को सहेजकर रखा है। मैं हमेशा साड़ियाँ ही पहनती हूँ। पैठणी, जामदानी कोई भी साड़ी हो। यह सब मेरे निजी कलेक्शन का हिस्सा है। सांदूर की अंबिका राजे घोरपड़े ने कहा।

दिव्यता बी.

आवलगढ़ राजघराने के भुमेन्द्र पाल सिंह ने इस शो को तीसरी बार हैदराबाद लाने और यहाँ मिले ज़बरदस्त स्वागत को लेकर अपनी खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा, यह एक लाइफस्टाइल प्रदर्शनी है। गौरंग्स किचन में अच्छी-खासी भीड़ जुटने की उम्मीद कर रहे हैं। वाकई, यह एक शाही जलसा था, जिसमें हर कलाकृति भारतीयता की महानता की गाथा सुना रही थी और यह बता रही थी कि कैसे राजघराने अपनी स्थानीय विरासत को आज भी सहेजकर रखे हैं।

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