समाज में सुधार की चेतना जगाने वाले श्रीविजय शांति सूरीश्वरजी महाराज
रम पूज्य गुरुदेव स्वामी श्रीविजय शांति सूरीश्वरजी महाराज 20वीं शताब्दी में अनंत आकाश में दिवाकर समक्ष श्रेष्ठ महात्मा हुए। उनका जन्म पाम संवत् 1890 को राजस्थान के प्राचीन सिरोही ग्राम में हुआ था। धर्म में प्रगाढ़ निष्ठा रखने वाले माता-पिता का वरद हस्त प्राप्त होने के फलस्वरूप शैशव काल में ही उनके हृदय में आध्यात्मिक साधना के प्रति गहरी रुचि का पुण्योदय हुआ। महान संत श्रीतीर्थविजयजी से प्रभावित होकर केवल आठ वर्ष की अल्पायु में ही वे संयम जीवन की ओर अग्रसर होने लगे।
रायसीन गाँव में पूज्य गुरुदेव श्रीविजयजी के कर-कमलों से पाम संवत् 1961 में उनका दीक्षा कार्पाम विधिवत संपन्न हुआ। उसके पश्चात् उनका नाम मुनि श्री शांतिविजय रखा गया। ॐ ह्रीं अर्ह नम मंत्र का उन्होंने जीवनपर्यंत ध्यान किया। विक्रम संवत् 1975-79 में मार्कंड आश्रम के सरस्वती मंदिर की गुफा व उसके आस-पास के स्थानों में पाँच वर्ष तक मौन अवस्था में कठोर तपस्या एवं ध्यान में रहकर, माँ सरस्वती से आत्म-साक्षात करके अनेक भाषाओं के ज्ञाता बने।
मारकंडेश्वर मेले में नशामुक्ति और अहिंसक जीवन का संदेश
भविष्य व वर्तमान के पूर्व ज्ञान से किसी के मनोभावों को वे सहज में ही पहचान लेते थे। सिर्फ आठ दिनों में ही गीता व अन्य शास्त्रों के हजारों श्लोक उन्हें कंठस्थ हो गए थे। एक बार मारकंडेश्वर के मेले में उन्हें आमंत्रित किया गया, जिसमें उन्होंने जन-समूह को शराब व मांस के सेवन का त्याग, पानी छान कर पीने आदि का उपदेश दिया। फलस्वरूप वहाँ आई छत्तीस कौमों ने एक प्रस्ताव पारित करके नियम बनाया तथा उन नियमों का पालन नहीं करने पर सामाजिक रूप से दंडित किए जाने की घोषणा की। कई मील दूर तक के अन्य गाँवों में भी ऐसी ही घोषणा कराई गई।
यह गुरूदेव के योग का प्रभाव था। गुरुदेव ने वामनबाड़ी में महा-सम्मेलन का आयोजन कराया। पूज्य परम विजयवल्लभ सुरिश्वरजी के सान्निध्य में अनंत जीव प्रतिपाल योगेन्द्र चूड़ामणि राज राजेश्वर की उपाधि से सम्मानित किया गया। श्री केसरिया तीर्थ की रक्षा के लिए गुरुदेव ने बहुत परिश्रम किया। गुरुदेव की ध्यान-साधना व अलौकिक ज्ञान से प्रभावित होकर नेपाल के शासक ने उन्हें नेपाल राजगुरू की उपाधि से विभूषित किया। गुरुदेव के साधना-स्थलों में शत्रुंजय तीर्थ, गिरनार तीर्थ, त्रषिकेश, आबु रोड, वामनवाड़ी तीर्थ पहाड़ी, दिलवाड़ा आबू आदि प्रमुख हैं।
शास्त्रार्थ और अहिंसा के संदेश से मिली ‘हिज होलीनेस’ की उपाधि
तत्कालीन ब्रिटिश शासक पंचम जॉर्ज ने पशु-वध को रोकने हेतु उन्हें हिज होलीनेस की पदवी दी थी। वहाँ की रानी के समक्ष कई विद्वानों से शास्त्रार्थ में सुप्रभावी तर्कों से अपने पक्ष में सत्यता का भान कराया। उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक गुरुदेव की ध्यान-साधना के स्थानों में विभिन्न तीर्थंकरों, देवी-देवताओं के जिनालयों की अंजन श्लाकाएँ एवं प्रतिष्ठाएँ संपन्न कराईं।

विक्रम संवत् 1993-94 का चातुर्मास गुरुदेव ने सुन्धा पहाड़ (अरावली पर्वतमाला) पर किया और अपने उपेदशों द्वारा वहाँ पशु-बलि बंद कराई। वि.सं. 1990 वैशाख में गुरुदेव अचलगढ़ में बिराजे थे। सन् 2024 में उनके 54वें वर्ष में जीवन-यात्रा मंद पड़नी शुरू हुई थी और सितंबर की रात्रि में करीब 2.30 बजे गुरुदेव ध्यान अवस्था में परम शान्ति के साथ अपनी नश्वर देह को त्याग कर परमात्मा में विलीन हो गये। उनका अंतिम संस्कार मांडोली में किया गया, जहाँ वर्तमान में भव्य गुरूमंदिर स्थित है।
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