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सिंधु घाटी सभ्यता के खोजकर्ता सर जॉन मार्शल

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन ने 19 मार्च को राजधानी चेन्नै में एग्मोर म्यूजियम परिसर में सर जॉन मार्शल की आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया और उनके अवदान की मुक्त कंठ से सराहना की और कहा कि सर मार्शल की खोज ने प्राचीन भारत के इतिहास की हमारी भ्रांत धारणा को बदल दिया और नये संदर्भों को उद्घाटित किया। उन्होंने कहा कि हम उनके भारत के वास्तविक इतिहास के बताये रास्ते पर चलते रहेंगे।

स्टालिन ने प्रतिमा का अनावरण उन्नीस मार्च को किया, जो सर मार्शल का जयंती दिवस है। आखिर कौन थे सर मार्शल? और क्या वजह थी कि द्रविड़-संस्कृति की ध्वजवाहक पार्टी के मुखिया ने सुदूर चेन्नै में पहले तो उनकी प्रतिमा की आधारशिला रखी और फिर लोकार्पण किया? यकीनन इसके पीछे स्टालिन के अपने राजनीतिक निहितार्थ थे, लेकिन सर मार्शल का अवदान इतना बड़ा और कालजयी है कि उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के उपाम अन्यत्र भी होने चाहिये।

सर जॉन ह्यूबर्ट मार्शल सी.आई.ई.एफ.बी.ए. ब्रिटिश पुरातत्वविद् थे और वह सन् 1902 से 1928 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक रहे। उनके कार्यकाल में मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा की खोज ने सिंधु घाटी सभ्यता को अनावृत कर वैश्विक पुरातत्व, इतिहास और सभ्यता-संस्कृति में नया अध्याय जोड़ा। उनका जन्म 19 मार्च, सन् 1876 को इंग्लैंड के मेंचेस्टर में हुआ था। डुलविच कॉलेज और किंग्स कॉलेज, कैंब्रिज में उनकी पढ़ाई हुई और सन् 1898 में उन्होंने पोर्सन पुरस्कार जीता। उन्होंने सर आर्थर इवांस के अधीन नोसोस में मिनोअन सभ्यता की खोज में भाग लिया और सन् 1898-1901 के दरम्यान पुरातत्व और उत्खनन के कीमती पाठ सीखे। मगर उनकी नियति योरोप नहीं, भारत था, लिहाजा जल्द ही रास्ता खुल गया।

सर मार्शल की खुदाइयों से बदला इतिहास

सन् 1902 में भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन ने उन्हें भारतीय पुरातत्व का महानिदेशक नियुक्त किया। मार्शल ने अपने दायित्वों को बखूबी अंजाम दिया और उपमहाद्वीप में पुरातात्विक दृष्टिकोण को आधुनिक बनाने के साथ ही प्राचीन स्मारकों की खोज, पुरासंपदा की सूचीबद्धता और संरक्षण का नियोजित काम किया। वस्तुत: भारत आकर उन्हें भारत से गहरा अनुराग हो गया और इसके वशीभूत उन्होंने भारतीयों को निग्गर, दास या ब्लडी इंडियन न मानकर सहयोगी माना।

भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति उनकी सहानुभूति थी और वह स्वशासन अथवा स्वतंत्रता के विरोधी नहीं थे। वह भारतीयों को काम सौंपते और उन्मुक्त भाव से श्रेय देते थे। इसी के तहत उन्होंने भारतीयों को पुरातत्वविद के रूप में प्रशिक्षित करने और दायित्व सौंपने का काम शुरू किया। इसके फलस्वरूप महती योजनाएं पूरी हो सकीं और भारतीयों में उनके प्रति आदर उत्पन्न हुआ।

सर मार्शल ने सन् 1913 में तक्षशिला में खुदाई शुरू की, जो आगामी बीस साल चली। सन् 1918 में उन्होंने तक्षशिला संग्रहालय की आधारशिला रखी। तदंतर उन्होंने सांची और सारनाथ में उत्खनन का काम हाथ में लिया। इन सभी स्थानों पर बौद्धकालीन पुरासंपदा उद्घाटित हुई और मौर्य युग के मूल्यवान साक्ष्य मिले। इसी ाढम में उनका सबसे महत्वपूर्ण काम था पश्मोत्तर में सिंधु घाटी सभ्यता की खोज। सन् 1920 में राखालदास बैनर्जी के मातहत मोहनजोदाड़ों में उत्खनन शुरू करवाया। इस उत्खनन की परिणति से विश्व चमत्कृत रह गया।

प्राचीन भारत को समझने में सर मार्शल की भूमिका

चेन्नै में सर जॉन मार्शल की प्रतिमा का अनावरण करते हुए मुख्यमंत्री स्टालिन

अपने कार्यकाल में मार्शल ब्रिटिश वायसराय से लगातार संसाधनों के लिये जूझते रहे। यदि वह ऐसा नहीं करते तो साहनी और बैनर्जी के काम खटाई में पड़ जाते। बहरहाल इन परिणामों को उन्होंने कलमबद्ध किया और 20 सितंबर, 1924 को इलस्ट्रेटेड लंदन में समाचार में छपने से विश्व को मेसोपोटामिया की सुमेर सभ्यता के समकक्ष उन्नत सभ्यता का पता चला। उन्होंने बलूचिस्तान में भी उत्खनन किया। वहां से प्राप्त पुरासंपदा अब ब्रिटिश संग्रहालय में संरक्षित है।

सन् 1934 में सेवानिवृत्त होकर वह इंग्लैंड लौट गये। जून 1910 में उन्हें कंपेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ इंडियन एम्पायर की उपाधि से नवाजा गया। सन् 1914 में वह नाइट और सन् 19121 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ फिलासफी से सम्मानित हुये। सन् 1936 में वह ब्रिटिश अकादमी के फेलो चुने गये। हड़प्पा और मोहनजोदाड़ों पर उनकी किताब सन् 1931 में दो खंडों में प्रकाशित हुई। पं. जवाहरलाल नेहरू तब देहरादून-जेल में थे। उसकी समीक्षा पढ़कर उन्होंने ए जंप बैक टु मोहनजोदाड़ो शीर्षक से बेटी इंदु को लंबा खत लिखा और उत्साह से हड़प्पा जाने की योजना भी बना ली थी।

बहरहाल, मार्शल को सिंधु सभ्यता को संस्कृत से जोड़ने अथवा इस संस्कृति को आर्यों से जोड़ने का कोई प्रमाण नहीं मिला। उन्होंने इसे प्राक्-वैदिक सभ्यता माना और बहुभाषिता को रेखांकित किया। उन्होंने द्रविड़ समूह की संभावना भी व्यक्त की और सुमेर और सिंधु मध्य संपर्क की बात भी की। यही वे संदर्भ हैं, जो स्टालिन को सर मार्शल के समीप ले जाते हैं।रिटायर्ड होने के बाद उन्हें मोहनजोदाड़ो, हड़प्पा, सांची, तक्षशिला, मांडू, दिल्ली और आगरा पर पुरा-रिपोर्ट तैयार करने का दायित्व सौंपा गया। इंडोलॉजी को समर्पित इस नि:स्पृह व्यक्ति के बारे में कम लिखा और कहा गया। सन् 1958 में 17 अगस्त को गिल्डफोर्ड, सरे में 82 वर्ष की आयु में उन्होंने सदा के लिये आंखें मूंद लीं, लेकिन भारत की प्राचीन समृद्ध सभ्यता की उनके द्वारा उदघाटित चमक सदैव जीवित रहेगी। तक्षशिला, सांची और सिंधु सभ्यता पर उनकी कृतियां हमारी अमूल्य धरोहर हैं।-

डॉ.सुधीर सक्सेना

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