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आध्यात्मिकता है आनंद का स्रोत

संसार में मानव रूप में जन्म लेने के बाद हम सुख, खुशी, प्रसन्नता और आनंद पाने के प्रयास में अपना जीवन व्यतीत करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग ही स्थायी आनंद पाते हैं। कभी हम सुख पाने के लिए कर्मेंद्रियों को आधार बनाते हैं तो कभी ज्ञानेंद्रियों को या बुद्धि को और कभी मन को, लेकिन सब स्थितियों में मन व अहंकार शामिल रहता है। जीवन में प्रतिदिन सुख-दुःख की अनुभूतियों के लिए कभी हम स्वयं को दोष देते हैं, कभी प्रारब्ध कर्मों को तो कभी दूसरों को।

किसी भी गुरु या संत अथवा ज्ञानी की शरण में जाने से हमें यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे जीवन में आने वाली हर घटना हमने ही जाने-अनजाने में रची है। इन घटनाओं में इतनी शक्ति नहीं होती कि वे हमें सुखी या दुःखी कर सकें। किसी भी घटना या स्थिति में सुखी या दुःखी होना हमारी स्वतंत्र इच्छा पर निर्भर करता है।

सांसारिक वस्तुएं, व्यक्ति और परिस्थितियां हमें अपनी इच्छानुसार प्राप्त होने पर सुख प्रदान करती हैं, जैसे- धन-दौलत, मान-सम्मान, मकान-दुकान, गाड़ी, ऐश-ओ-आराम आदि। जैसे हमारा मानव शरीर नश्वर है, उसी प्रकार संसार की हर वस्तु और परिस्थिति भी नश्वर है। कुछ भी स्थायी नहीं है। इसी कारण इन चीजों से प्राप्त होने वाले सुख भी स्थायी नहीं होते और जो सुख स्थायी नहीं होता, उसके बाद दुःख आने की संभावना है।

बाहरी सुख बनाम आंतरिक आनंद

इसका अर्थ है कि जब तक हम संसार में सुखों के पीछे भागते रहेंगे, तब तक हमें दुःखों का सामना करना पड़ेगा। ये सब बाहरी चीजों से संबंधित होने के कारण चीजों के बदलने पर दुःख में कब परिवर्तित हो जाते हैं, इसका पता भी नहीं चल पाता। बाहरी सुख सदा नहीं रहता, लेकिन आंतरिक सुख (आनंद) हमेशा हमारे भीतर है, जो सदा हमारे साथ ही रहता है। उसकी अनुभूति के लिए हमें किसी बाहरी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति की आवश्यकता नहीं है। संपूर्ण जगत को ब्रह्म का बदला हुआ रूप जानकर ही हम आनंद में रह सकते हैं।

हर व्यक्ति, वस्तु और परिस्थिति परमात्मा की अभिव्यक्ति है, लेकिन उसका माध्यम अलग-अलग है। जब इस भाव और दृष्टिकोण से हम संसार को देखते हैं और समझते हैं तथा उससे सीखते हैं कि इसमें चेतना हमें क्या शिक्षा देना चाहती है तभी हम हर प्रकार के आचार-व्यवहार से स्वयं को सुखी-दुःखी ना करते हुए, आनंदित रह सकते हैं।

सद्गुरु रमेश

आनंद अंतर्मन और हृदय का भाव है, जबकि सुख इंद्रिय जनित है। इसका अर्थ यह हुआ कि हमेशा आनंद में रहने के लिए हमें क्षणिक सुखों के पीछे भागना छोड़ देना है और जो जैसा है, उसमें ही ब्रह्म की अनुभूति करते हुए, बस हृदय में आनंदित रहना है। आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हुए जब हम आध्यात्मिक ज्ञान को अपने आचार-व्यवहार व मन में उतारते हैं तो हम हर पल आनंद में रहते हैं। यहां ध्यान देना है कि सुख के विपरीत दुःख आता है, लेकिन आनंद स्वयं में परिपूर्ण है और अखंड-अचल आनंद में मुक्ति और मानव जीवन की सार्थकता है।


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