बदलते मौसम में गले के इंफेक्शन से रहें सावधान

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आजकल सुबह-शाम को ठंड और दोपहर में गर्मी पड़ रही है जिससे लोग लापरवाही बरतने लगते हैं। ऐसे में लोग कई प्रकार के पांमण व बीमारी से परेशान हो जाते हैं। गले में खराश, खांसी और दर्द रहना आम समस्या है। मौसम में बदलाव का समय विषाणुओं की उत्पत्ति के अनुकूल होता है।

अधिक भीड़-भाड़ व प्रदूषण के बीच रहने से भी गले का पांमण तेजी से फैलता है। अक्सर लोग खुद ही एंटीबायोटिक दवाएं लेना शुरू कर देते हैं जो वायरस पर बेअसर साबित होती हैं।

गले का पांमण के साथ कुछ अन्य समस्याएं भी आती हैं, जैसे- नाक बंद होना या बहना, छींकें आना, सांस लेने में कठिनाई होना, खांसी आना, गहरी सांस लेने में मुश्किल होना आदि। गले के पांमण को दो आधारों पर बांटा जा सकता है।

पहला आधार

पांमण के कारण गले का कौन-सा हिस्सा प्रभावित है। इस आधार पर तीन तरह के पांमण होते हैं, फैरिंजाइटिस, टान्सिलाइटिस और लैरिंजाइटिस। फैरिंजाइटिस में पूरे गले पर असर पड़ता है। गले में दर्द के साथ खाना निगलने में भी दिक्कत होती है।

टान्सिलाइटिस में टान्सिल्स में सूजन होने के साथ गले और जबड़ों के आसपास के हिस्से में दर्द होता है। लैरिंजाइटिस में वॉयस बॉक्स लैरिंक्स प्रभावित होता है जिससे आवाज भारी हो जाती है, गला बैठ जाता है या फिर दर्द के साथ खांसी होती है। लंबे समय तक उपेक्षा करने से आवाज प्रभावित होने लगती है।

दूसरा आधार

पांमण के दूसरे प्रमुख कारण हैं- वायरस, बैक्टीरिया और एलर्जी।

एलर्जी – इसमें एलर्जी करने वाले तत्वों के संपर्क में आने पर ही गला खराब हो जाता है। अगर एलर्जी किसी विशेष खाद्य पदार्थ या परफ्यूम से है तो परहेज करना आसान होता है, पर धूल, प्रदूषण, धुएं या मौसम के बदलाव के कारण होने वाले पांमण से बचना मुश्किल होता है।

आपको किससे एलर्जी है, यह जानने के लिए अपनी गतिविधियों को नोट करना जरूरी है। अपने खान-पान और कपड़ों के फेब्रिक आदि बातों पर भी ध्यान दें। इससे पांमण से बचना आसान हो जाएगा। कई बार इसकी वजह आनुवंशिक भी होती है।

एसिड रिफ्लक्स

बार-बार होने वाले एसिड रिफ्लक्स (खाना खाने के बाद फूड पाइप के जरिये उसका मुंह की तरफ वापस आना) से भी गले में पांमण हो सकता है। इसके लिए खान-पान में बदलाव करना जरूरी है। थोड़े-थोड़े अंतराल पर कम-कम खाना, मसालेदार और तला-भुना खाने से बचना, नियमित व्यायाम करना, रात में खाने और सोने के बीच कम से कम दो से तीन घंटे का अंतर रखना और बेड पर सिरहाना ऊंचा करके सोना फायदेमंद साबित होता है।

आवाज पर असर

गले के पांमण के कारण यदि आवाज पर असर पड़ रहा है तो सावधान हो जाएं और किसी अच्छे चिकित्सक से संपर्क करें। खूब सारा पानी पीने के अलावा गले को आराम देना जरूरी है। अधिक चिल्लाने, गाने, लगातार बात करने और धीरे-धीरे बोलने से बचना चाहिए। गले के पांमण में थ्रोट पैक भी फायदा पहुंचाता है। इसके तहत गले को गर्म पानी में भीगे कपड़े का सेंक दिया जाता है।

अनियमित जीवनशैली की वजह से जो रोग खतरनाक रूप ले रहे हैं, उनमें गले का पांमण भी एक है। एक ओर लंबे समय तक अनियमित दिनचर्या के कारण दवाओं का असर जल्दी नहीं होता, साथ ही साल भर जुकाम, बंद नाक, खांसी और गले में कफ जमने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। इन पर विराम लगाने के लिए खान-पान पर नियंत्रण रखना जरूरी है।

कफ बनाने वाले खाद्य पदार्थ, जैसे दूध व दूध से बने उत्पाद, चीनी, तली हुई चीजें, केला, चावल, आलू आदि से परहेज करना चाहिए। होमियोपैथी में गले के पांमण का अच्छा व स्थायी उपचार है। इस चिकित्सा पद्धति के तहत मरीज को लक्षणों के आधार पर दवाएं दी जाती हैं।

आम धारणा यह है कि होमियोपैथिक दवाएं देर में असर करती हैं जबकि ऐसा नहीं है। शुरुआती दौर में ही उपचार प्रारंभ करवाने पर यह समस्या शीघ्र ठीक हो जाती है। थोड़ा समय देने पर गंभीर हो चुकी समस्या को भी ठीक किया जा सकता है। गले के पांमण पर भी यही बात लागू होती है।

इनका रखें ध्यान

भीगी हुए 4-6 दाने किशमिश खाएं, लहसुन खाएं, अधिक मसालेदार खाने से बचें। गर्म पानी की भाप लें। गरम नींबू पानी या नींबू की चाय से दिन की शुरुआत करें। टहलने की आदत डालें और टहलते समय गहरी सांस लें, पांमण होने पर गले को आराम दें, चिल्लाने और लगातार बात करने से बचें। दिन में 3-4 बार गुनगुने पानी से गरारे करें। इससे रक्त संचार में सुधार होता है और कफ बाहर निकलता है।

  • उबली सब्जियां, सूप, रसम आदि गर्म चीजें लें।
  • किसी भी प्रकार का नशा करने से बचें।

डॉ. रूप कुमार बनर्जी

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