हैदराबाद, संसार के झगड़े मोह, ममता, राग-द्वेष और आसक्ति के कारण हो रहे हैं। हम जीवन पर्यंत तेरा-मेरा के झंझट में पड़े हुए हैं। वास्तविकता तो यह है कि न मोह अपना है, ना ही ममता अपनी है। जिसे हम अपनी संतान, बेटा-बेटी मानते हैं, वह भी अपने नहीं हैं। बेटा कुंवारा रहने तक अपना रहता है, जैसे ही विवाह होता है, वह पत्नी को हो जाता है। ठीक इसी प्रकार बेटी अपनी नहीं, बल्कि जवाई की अमानत होती है।
चिंतन करें कि यह शरीर भी अपना नहीं, बल्कि श्मशान की अमानत है और इसे एक ना एक दिन श्मशान जाना ही है। जब इस संसार में कुछ भी अपना नहीं है, तो हम किसके लिए झगड़ रहे हैं। संसार की कोई वस्तु हमारी नहीं है, कोई किसी का नहीं है, सब कुछ मोह-माया, ममता और स्वार्थ के साथ जुड़े हुए हैं। यदि संसार के सच्चे व परम सुख को प्राप्त करना है, तो हमें बाहर की यात्रा नहीं, बल्कि भीतर की अर्थात अंतरात्मा की यात्रा करनी होगी।
तीर्थंकर बनने की साधना और आत्मचिंतन का मार्ग
साथ ही इस बात का चिंतन करना होगा कि हम कौन हैं, हम क्या कर रहे हैं और हमें क्या करना चाहिए। हम बाहर की यात्रा करते हुए सांसारिक सुखों को ही परम सुख मानकर चल रहे हैं। उक्त उद्गार श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ग्रेटर हैदराबाद के तत्वावधान में काचीगुड़ा स्थित श्री पूनमचंद गांधी जैन स्थानक में चातुर्मासिक धर्म सभा को संबोधित करते हुए साध्वी जयश्रीजी म.सा. आदि ठाणा-3 ने व्यक्त किये। चातुर्मास संयोजक ब्रिजेश कोचेटा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, साध्वीश्री ने कहा कि प्रभु महावीर तीर्थ की स्थापना कर चले गये।
हम भी तीर्थंकर बन सकते हैं, लेकिन इसके लिए महा पुण्य का कोष संचित होना पड़ता है, हमारे भीतर अनंत-अनंत गुणों का भंडार होना चाहिए और कठोर तप व साधना के जरिए अपने कर्मों का क्षय करना होता है, यह कोई आसान कार्य नहीं है। म.सा. ने कहा की संसार के सुख और मोक्ष के सुख में भेद को हम बता नहीं सकते, मोक्ष के परम सुख की कल्पना नहीं कर सकते।
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मोक्ष मार्ग की कठिन तपस्या और परम सुख की अनुभूति
म.सा. ने कहा कि यदि हम भयंकर सिर दर्द से परेशान हैं और हमारे दोस्त आकर हमारा ध्यान दर्द से भटकाना चाहते हैं, लेकिन हमारा ध्यान दर्द से नहीं भटकता है और हम चाहते हैं कि किसी भी तरह से इस दर्द को कम किया जाए। किसी सिद्ध संत के सिर पर हाथ रखने से हमारा दर्द गायब हो जाता है, तो हमें ऐसा लगता है कि हमने परम सुख प्राप्त कर लिया। सोचें कि संसार के एक दुःख व दर्द से राहत मिलने पर हमें परम सुख महसूस हो रहा है, तब मोक्ष रूपी परम सुख किस प्रकार का होगा, जो हमें इस भव भ्रमण से मुक्त कर देता है। मोक्ष वन वे है, जहाँ सिर्फ जाना है और आना नहीं।
मोक्ष में सभी जाना चाहते हैं, लेकिन जाता कोई और है। मोक्ष की कामना करना तो आसान है, लेकिन इसे प्राप्त करने के रास्ते पर बढ़ना काफी कठिन होता है। इसके लिए संयम जीवन अंगीकार कर तप व साधना से इंद्रियों-आसक्ति से मुक्त होते हुए कर्मों की निर्जरा करनी पड़ती है। संघ के महामंत्री पवन कटारिया ने धर्म सभा का संचालन करते हुए कहा कि धार्मिक क्रिकेट मैच के लाभार्थी परिवार माणकचंद शांतिलाल गौतमचंद हीराचंद राहुल कुलदीप चोरड़िया हैं। तेले तप की आराधना में आज राखी धारीवाल का बेला है। आज का आयम्बिल सुदर्शणा बरमेचा का है। नवकार महामंत्र जाप के आज के लाभार्थी विमला देवी संतोष कविता मुणोत परिवार हैं।
